इन अफसरों  ने लालू को पहुंचाया सलाखों के पीछे

पटना /रांची /  दिल्ली /ब्यूरो रिपोर्ट /देश की बागडोर असल मायने में अफसरों के हाथ में होती है. यदि नौकरशाही दुरुस्त हो तो कानून-व्यवस्था चाकचौबंद रहती है. जिस तरह से भ्रष्टाचार का दीमक नौकरशाही को खोखला किए जा रहा है, लोगों का उससे विश्वास उठता जा रहा है. लेकिन कुछ ऐसे भी IAS और IPS अफसर हैं, जो अपनी साख बचाए हुए हैं.  21 साल पहले हुआ चारा घोटाला, स्वतन्त्र भारत के बिहार प्रान्त का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार घोटाला था जिसमें पशुओं को खिलाए जाने वाले चारे के नाम पर 950 करोड़ रुपए सरकारी खजाने से फर्जीवाड़ा करके निकाल लिए गए थे. आज इसी मामले पर बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद और 15 अन्य को चारा घोटालेके मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद इस मामले की जाँच से जुड़े अफसरों पर एक नजर

तत्कालीन उपायुक्त आईएएस अमित खरे

चारा घोटाला देश की जनता के सामने 1996 में आया। लेकिन इस खुलासे की पृष्ठभूमि 1993-94 से बननी शुरू हो गई थी। लालू यादव को तीसरी बार मुख्यमंत्री बने करीब 8 महीने से ज्यादा का वक्त हो गया था. इस दौरान बिहार में पैसे की गड़बड़ी की आशंका सामने आई. उस वक्त के फाइनेंस कमिश्नर रहे एस विजय राघवन ने बिहार के सभी डीएम से कहा कि जिले के सरकारी खजाने से जो भी पैसा निकाला जा रहा है, उसकी पूरी जानकारी उन्हें दी जाए. उस वक्त बिहार के चाइबासा जिले में जिला कमिश्नर थे अमित खरे. वो 1985 बैच के आईएएस अधिकारी थे.  बताया कि जब उन्हें पश्चिमी सिंहभूम जिले का डीसी बनाया गया, तो उसके कुछ ही समय बाद बिहार के वित्त विभाग की तरफ से एक अलर्ट आया. इसमें पशुपालन और मत्स्य विभाग की तरफ से हर राज्य में की जाने वाली धननिकासी पर नजर रखने को कहा गया. 27 जनवरी 1996 को खरे ने उनके जिले में पड़ने वाले चाईबासा पशुपालन केंद्र की संदिग्ध आर्थिक गतिविधियों पर जवाब मांगा तो हड़कंप मच गया.

बकौल खरे नवंबर और दिसंबर के महीने में विभाग की तरफ से इस केंद्र के लिए 10 और 9 करोड़ रुपये की निकासी दिखाई गई थी.मैंने सोचा कि मैं पशुपालन अधिकारी को फोन कर इस बारे में ताकीद करूं. मगर जैसे ही फोन किया गया, मुझे पता चला कि विभाग के सारे अधिकारी दफ्तर छोड़कर भाग खड़े हुए हैं.

अमित खरे ने बताया कि जब हमने विभाग के दफ्तर का दौरा किया, तो देखा कि वहां फर्जी बिलों का ढेर लगा है. कुछ लाख कैश इधर उधर बिखरा पड़ा है और एक भी अधिकारी दफ्तर में मौजूद नहीं है.जब पुलिस अलर्ट भेजा गया, तो पता चला कि विभाग के दूसरे दफ्तरों का भी यही हाल हो रखा है. नतीजतन, सभी दफ्तर सील कर दिए गए और औपचारिक शिकायत दर्ज कर ली गई.खरे ने राज्य सरकार को इस बारे में सूचित किया, मगर लालू प्रसाद यादव की सरकार इस पर आंख मूंदे रही.

चाइबासा के सरकारी खजाने की जांच के दौरान उन्हें पता चला कि जिला पशुपालन विभाग ने एक बार 10 करोड़ रुपये और एक बार 9 करोड़ रुपये निकाले हैं और उसकी डिटेल नहीं दी है. जब उन्होंने विभाग से डिटेल मांगी, तो भी उन्हें कोई डिटेल नहीं दी गई. उस समय झारखंड बिहार का हिस्सा था। पश्चिम सिंहभूम जिले के तत्कालीन उपायुक्त अमित खरे ने सबसे पहले चाईबासा से 34 करोड़ रूपए से अधिक की निकासी  से जुड़े मामले का खुलासा किया था और इसकी एक एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया था। अमित खरे जनवरी 1996 में पशुपालन विभाग के दफ्तर पहुंचे. जांच-पड़ताल के दौरान उन्हें लगा कि ऑफिस में जल्दबाजी में कुछ फाइलें जला दी गई हैं और कुछ को नष्ट कर दिया गया है. कई ऐसे फर्जी बिल हैं, जिनमें 10 लाख रुपये से कम का भुगतान दिखाया गया है. 10 लाख रुपये से ज्यादा के भुगतान पर कई जरूरी दस्तावेज दिखाने होते थे, इसलिए बिल 10 लाख रुपये से कम के थे. ये भुगतान उन कंपनियों के नाम पर किए गए थे, जो थी ही नहीं. उन्हें ये लगा कि ऐसा पिछले कई साल से हो रहा है. इस पूरे हेरफेर में तकरीबन 37 करोड़ रुपये का हेर-फेर सामने आया. इसके अगले ही दिन रांची के कमिश्नर ने भी पाया कि रांची में भी ऐसी ही हेर-फेर हुई है. इसके बाद तो गुमला, रांची, पटना, डोरंडा और लोहरदगा जिले के सरकारी खजाने से भी फर्ज़ी बिलों के ज़रिए करोड़ों रुपए निकाले जाने की बात सामने आने लगी. मामला बिहार पुलिस के पास पहुंचा तो पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया. रातों-रात सरकारी खजाने की देखभाल करने वाले और पशुपालन विभाग के करीब 100 से ज्यादा अधिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया. इसके अलावा कई ठेकेदार और सप्लायरों को भी हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू हुई. 8 महीने पहले ही चुनाव में हार झेल चुकी समता पार्टी, बीजेपी और कांग्रेस को लालू यादव के खिलाफ बैठे-बिठाए बड़ा मुद्दा मिल गया. पूरा विपक्ष एकजुट होकर सीबीआई जांच की मांग करने लगा. इसके लिए पटना हाई कोर्ट की शरण ली गई. 11 मार्च 1996 को पटना हाई कोर्ट ने मामले की सीबीआई जांच के आदेश दे दिए. बिहार सरकार ने इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की और कहा कि बिहार पुलिस घोटाले का पर्दाफाश करने में सक्षम है. सुप्रीम कोर्ट नहीं माना और उसने सीबीआई जांच के आदेश दे दिए.

27 मार्च 1996 को सीबीआई ने चाईबासा के सरकारी खजाने से पैसे निकालने के मामले में केस दर्ज कर लिया. करीब एक साल बाद 10 मई 1997 में सीबीआई ने बिहार के मुख्यमंत्री लालू यादव के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए राज्यपाल की मंजूरी मांगी. राज्यपाल ने मुकदमा चलाने की मंजूरी दे दी, जिसके बाद सीबीआई की ओर से पूरे मामले की जांच का जिम्मा सीबीआई के संयुक्त निदेशक यूएन विश्वास को सौंप दिया गया. सीबीआई ने 17 जून 1997 को बिहार सरकार के पांच बड़े अधिकारियों को हिरासत में ले लिया. इनमें महेश प्रसाद, के अरुमुगन, बेग जुलियस, मूलचंद, और राम राज शामिल थे. इनसे पूछताछ करने के बाद सीबीआई ने 23 जून 1997 को अपना पहला आरोप पत्र दायर किया. इसमें लालू समेत 55 लोगों को आरोपी बनाया गया और आईपीसी के सेक्शन 420 (धोखाधड़ी), 120बी (आपराधिक षडयंत्र) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13बी के तहत अलग-अलग 63 मुकदमे दर्ज किए गए.

इस मामले में एक जनहित याचिका दायर की गई, जिसमें पूरे मामले की जांच सीबीआई से कराने की मांग की गई। कोर्ट में जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा गया कि तत्कालीन पशुपालन मंत्री रामजीवन सिंह ने संचिका पर मामले की जांच सीबीआई से कराने की अनुशंसा की है, लेकिन राज्य सरकार ऐसा न कर पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया।इस क्रम में याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि जब इस मामले में बड़े-बड़े राजनेता और अधिकारी आरोपी हैं, तो पुलिस जांच का क्या औचित्य है? कोर्ट ने सारे तथ्यों के विश्लेषण के बाद पूरे मामले की जांच का जिम्मा सीबीआई को सौंप दी थी।

जब नवंबर और दिसबंर 1995 में जब खरे ने 10 करोड़ और 9 करोड़ रूपए निकासी की खबर मिली तो उन्हें शक हुआ, उन्हें लगा कि शायद किसी ने अपने पुराने बिल का क्लियरेंस लिया होगा, लेकिन उन्होंने पशुअधिकारियों को बुलाया और पर जांच करने का फैसला किया।बाद में उन्हें पता चला कि पूरे चाईबासा के कोष से 37.7 करोड़ रूपए अवैध तरीके से निकाले जा चुके थे। बिहार सरकार को खरे का जांच करना रास नहीं आ रहा था तो उनका ट्रांसफऱ कर दिया गया।

फिर शुरू हुआ अमित खरे को सजा देने का दौर
चारा घोटाले का खुलासा करने के कुछ ही महीनों के भीतर उन्हें बीमारू हालत और बंदी की कगार पर पड़े बिहार स्टेट लेदर कॉरपोरेशन में डंप कर दिया गया. कॉरपोरेशन की हालत ये थी कि पिछले छह महीने से उसके कर्मचारियों को वेतन का भुगतान भी नहीं हो पाया था.फिर कुछ समय बाद खरे को बिहार कंबाइंड स्टेट एग्जामिनेशन बोर्ड का कंट्रोलर बनाकर भेज दिया गया. उस समय बोर्ड सिर्फ कागजों पर ही था.खरे ने इसे विधिवत स्थापित किया और अब यह सफलतापूर्वक चल रहा है.

खरे के लिए सबसे मुश्किल दौर आया 1997 में, जब उनके पिता जी बीमार चल रहे थे.खरे ने बताया कि मैंने पिता जी को अस्पताल में दिखवाने के लिए छुट्टी ली. मगर मेरे घर पहुंचते ही छुट्टी खारिज कर दी गई.मुझे वापस पटना तलब कर लिया गया.इसी बीच मेरे पिता जी का निधन हो गया.

खरे की मुश्किलें तब जाकर कुछ कम हुईं, जब अलग राज्य बनने के बाद वह झारखंड कैडर में चले गए. चारा घोटाले की जांच के दौरान उन पर लगातार दबाव पड़ा, मगर वह झुके नहीं.खरे कहते हैं कि अब मैं युवा आईएएस अधिकारियों से पूरी जिम्मेदारी से यह कह सकता हूं कि अपने कर्तव्य का निष्ठापूर्वक पालन करें और किसी भी गलत सत्ता के आगे न झुकें. इसी तंत्र में उनके बचाव के और सही काम के उपाय मौजूद हैं.

आखिर लालू को गंवानी पड़ी थी कुर्सी

इस मामले में हाईकोर्ट के आदेश पर निगरानी में जांच शुरू हुई थी। वर्ष 1996 में चारा घोटाला पूरी तरह सबके सामने आ गया और लालू प्रसाद की मुश्किलें बढ़ने लगीं। इस मामले में तत्कालीन मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद यादव को मुख्यमंत्री का पद छोड़ना पड़ा था और जेल जाना पड़ा था। जिसके बाद लालू यादव ने पत्नी राबड़ी देवी को राज्य की कमान सौंपी

अमित खरे फिलहाल राज्य में एडिशनल चीफ सेक्रेटरी रैंक के अधिकारी हैं। विकास आयुक्त के पद पर तैनात हैं। खरे लम्बे समय तक मानव संसाधन विभाग में सेन्ट्रल डेप्युटेशन पर भी रहे हैं। उनकी पत्नी निधि खरे भी सीनियर आईएएस ऑफिसर हैं और फिलहाल झारखण्ड में कार्मिक विभाग में प्रधान सचिव के पद पर तैनात हैं।   देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत कुमार डोभाल ने खरे की तारीफ की है। अपने ट्विटर अकाउंट से डोभाल ने ट्वीट कर बाकायदा खरे की पीठ ठोकी है। अपने ट्वीट में डोभाल ने लिखा है कि अमित खरे वही अधिकारी हैं जिन्होंने चारा घोटाले का रहस्योद्घाटन  किया था। साथ ही उन्होंने यह भी लिखा है कि जहां आज के दौर में आईएएस ऑफिसर नेताओं के तलवे चाट रहे हैं वहीं अमित खरे जैसे ईमानदार अधिकारी भी मौजूद हैं।  झारखंड सरकार के अपर मुख्य सचिव (वित्त) एवं विकास आयुक्त अमित खरे एक ईमानदार आईएएस अधिकारी है। अमित खरे की प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा डोरंडा स्थित सेन्ट्रल स्कूल में हुई।अमित खरे के पिता एसी खरे महालेखाकार कार्यालय डोरंडा में डीएजी. (प्रशासन) के पद से सेवा निवृत हुए थे।उनके बडे़ भाई अतुल खरे ने भी सेन्ट्रल स्कूल डोरंडा से पढाई की थी। वर्तमान में अतुल खरे भारतीय विदेश सेवा में कार्यरत हैं। दोनों ही भाई तेजस्वी विद्यार्थी के रूप में लोकप्रिय रहे। अतुल खरे एवं अमित खरे विलक्षण प्रतिभा वाले अधिकारी रहे हैं। सेन्ट्रल स्कूल के प्रचार्य दोनों भाइयों की भूरि-भूरि प्रशंसा करते थे।  एक बार तो रांची विश्वविद्यालय की बिगड़ती स्थिति को ठीक करने के लिए अमित खरे को रांची विश्वविद्यालय के कुलपति का कार्यभार भी दिया गया था और इस दायित्व को उन्होंने बखूबी निभाया। अमित खरे के बड़े भाई अतुल खरे ने ही तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के संयुक्त राष्ट्र संघ में दिए गए हिन्दी भाषण को तैयार किया था। अमित खरे के पिता एक अत्यंत सरल इंसान थे। अमित खरे के पिता एसीखरे वरीय डीएजी(प्रशासन) थे. इन दोनों भाइयों ने सेन्ट्रल स्कूल डोरंडा का गौरव बढाया। स्कूल के प्रचार्य के कमरे में लगे बोर्ड पर मेधावी छात्रों में इन दोनों भाइयोंे के नाम हैं। अपने आईएएस करियर में अमित खरे हमेशा विवादों से दूर रहे लेकिन कार्य के मामले में इनकी दक्षता बेमिसाल है।
झारखंड राज्य बनने के बाद इधर शिफ्ट
बिहार कैडर के 1985 बैच के आईएएस अमित खरे 2001 में अलग झारखंड राज्य बनने के बाद इधर शिफ्ट कर गये, उनकी पत्नी निधि खरे 1992 बैच की आईएएस अधिकारी हैं। 2014 में बीजेपी को बहुमत मिलने के बाद करीब आधा दर्जन आईएएस अधिकारियों को झारखंड बुलाया गया। खरे दंपत्ति इनमे शामिल थे इन्हें 2014 में झारखंड बुलाने की खास वजह थी। राज्य में फाइनेंसियल मामलों को एक जानकार की जरुरत थी। फाइनेंस डिपार्टमेंट में उनकी नियुक्ति के दौरान उन्होंने वैसे फाइल लौटाना शुरू कर दिया जिसमे कुछ भी गड़बड़ नजर आती थी। देश में डेमोनेटाईजेशन के दौरान करेंसी क्राइसिस को राज्य में बखूबी हैंडल करने वाले में भी खरे की बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। उन्ही की कोशिश के कारण रुपयों का बड़ा कन्साइनमेंट टकसाल से झारखंड आया और यहां के लोगों की परेशानी देश के अन्य हिस्सों की तुलना में काफी कम रही। यहां आने के बाद खरे को एडिशनल चीफ सेक्रेटरी के केटेगरी में प्रोमोट किया गया। दरअसल जैसे ही गौबा के सेंट्रल डेपुटेशन पर जाने की बात आई तब उनके उत्तराधिकारी के रूप में इन्हें देखा जाने लगा। लेकिन स्थितयां बदल गयी। राज्य में सबसे बड़े एडमिनिस्ट्रेटिव हेड किसी और को बना दिया गया

IPS अफसर राकेश अस्थाना

जाने – माने  IPS अफसर हैं राकेश अस्थाना जिन्हें बहुचर्चित चारा घोटाले की जांच की जिम्मेदारी दी गई थी. उन्होंने लालू प्रसाद यादव के खिलाफ 1996 में चार्जशीट दायर की थी. उसके बाद लालू यादव को गिरफ्तार किया गया था.

राकेश अस्थाना का जन्म 1961 में रांची में हुआ था. इनकी प्रारंभिक शिक्षा झारखंड स्थित नेतरहाट स्कूल से हुई है. इनके पिता एचआर अस्थाना नेतरहाट स्कूल में भौतिकी के शिक्षक थे.इसके बाद रांची के सेंट जेवियर्स कॉलेज से पढ़ाई की थी. 1978 में आईएससी करने के बाद आगरा स्थित अपने पैतृक घर चले गए.दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद रांची के सेंट जेवियर्स कॉलेज में इतिहास पढ़ाना शुरू किया. 1984 में उन्होंने अपने पहले ही प्रयास में यूपीएससी की परीक्षा पास कर ली और आईपीएस अधिकारी बन गए. उनको गुजरात कैडर मिला.

वह धनबाद में सीबीआई की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा के एसपी रह चुके हैं. रांची में वह डीआईजी के पद पर थे. राकेश अस्थाना का नाम कर्तव्यनिष्ठ और ईमानदार अधिकारियों की सूची में खास तौर से शामिल रहा है. 1994 में उन्होंने सनसनीखेज पुरुलिया आर्म्स ड्रॉप केस की फील्ड इंवेस्टिगेशन सुपरवाइज की थी.उन्हें बहुचर्चित चारा घोटाले की जांच की जिम्मेदारी दी गई. उन्होंने लालू प्रसाद यादव के खिलाफ 1996 में चार्जशीट दायर की थी. 1997 में उनके समय ही लालू पहली बार गिरफ्तार हुए. उस समय उनकी उम्र 35 वर्ष थी. वो तब सीबीआई एसपी के तौर पर तैनात थे.

अस्थाना को मूल रूप से लालू से पूछताछ के लिए ही जाना जाता है. 1997 को उन्होंने चारा घोटाले में लालू से 6 घंटे तक पूछताछ की थी. अस्थाना ने ही धनबाद में डीजीएमएस के महानिदेशक को घूस लेते पकड़ा था. उस समय तक पूरे देश में अपने तरीके का यह पहला मामला था, जब महानिदेशक स्तर के अधिकारी सीबीआई गिरफ्त में आये थे.

अस्थाना ने ही चर्चित गोधरा कांड की भी जांच की थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर आरके राघवन की अगुआई में गठित हुई एसआईटी ने भी सही माना था. अहमदाबाद में 26 जुलाई, 2008 को हुए बम ब्लास्ट की जांच का जिम्मा राकेश को ही दिया गया था. उन्होंने 22 दिनों में ही केस को सुलझा दिया था.

आसाराम बापू और उनके बेटे नारायण सांईं के मामले में भी अस्थाना ने जांच की थी. फरार चल रहे नारायण सांईं को हरियाणा-दिल्ली बॉर्डर पर पकड़ा था. वर्तमान समय में अस्थाना को सीबीआई का एडिशनल डायरेक्टर बनाया गया है. इस पद पर इनकी नियुक्ति 4 साल के लिए हुई है. चारा घोटाले के बाद अब लालू यादव पर रेलवे के दो होटलों टेंडर बांटने में फर्जीवाड़े का आरोप लगा है और इसकी जांच की जिम्मेदारी भी अब राकेश अस्थाना के पास ही है। इस नए मामले में  लालू के साथ ही उनके परिवार पर भी खतरे के बादल मंडराने लगे हैं।

सीबीआई के मुताबकि, रेलवे के होटलों के आवंटन के फर्जीवाड़े की प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि होटल आवंटन में गड़बड़ियां की गईं, जिसमें होटल लीज पर लेने के बदले में 65 लाख में 32 करोड़ की जमीन ली गई।

सीबीआई के पूर्व ज्वाइंट डायरेक्टर उपेंद्रनाथ बिस्वास

पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के चारा काण्ड की जब जब बात होगी तो सीबीआई के पूर्व ज्वाइंट डायरेक्टर रह चुके उपेंद्रनाथ बिस्वास का जिक्र जरूर होगा . उन्हें लोग उपेन बिस्वास के नाम से भी जानते हैं. उपेन बिस्वास से इस केस के बारे में बात की गई तब  बिस्वास ने बताया कि किस तरह लालू ने उनसे कई बार आग्रह किया कि पूछताछ की जगह बदली जाए. मामले से मीडिया दूर रहे और उनकी सार्वजनिक छवि भी न खराब हो. उनका आरोप है कि इस मामले को आगे बढ़ाने पर सीबीआई के तत्कालीन डायरेक्टर से भी उन्हें धमकी मिली थी.

साल 1999 की बात
बिस्वास मामले से जुड़ी जांच को याद करते हुए कहते हैं, ‘यह साल 1999 और 2000 की बात है, जब मैंने बिहार के मुख्य सचिव को फोन किया और मैसेज दिया कि सीबीआई चारा घोटाले  में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव से पूछताछ करना चाहती है. 5 मिनट के अंदर मुझे फोन आया. वह व्यक्ति मुख्य सचिव नहीं, बल्कि लालू प्रसाद यादव खुद थे.’ बिस्वास आगे कहते हैं, ‘लालू प्रसाद यादव ने बंगाली में बात शुरू की. ‘नमस्कार दा, आमी लालू यादव बोलची’ (नमस्कार दा, मैं लालू यादव बोल रहा हूं), अरे आप नहीं जानते हैं कि अपर कास्ट के लोग हमारे खिलाफ साजिश कर रहे हैं.’ मैंने लालू प्रसाद से कहा कि सबूतों के आधार पर सीबीआई टीम आपसे पूछताछ करेगी. इस पर लालू सहमत हो गए और कहा कि अधिकारियों को मुख्यमंत्री निवास स्थान 1 अण्णे मार्ग पर भेज दें. उन्होंने फिर फोन किया और मीडिया की आलोचना की. उन्होंने कहा कि मीडिया जासूसों की वजह से घर में बहुत परेशानी है. दफ्तर में पूछताछ कर लीजिए.’

लालू बड़े कलाकार
बिस्वास कहते हैं, ‘मैंने लालू का अनुरोध मान लिया और अधिकारियों को इस बारे में जानकारी दे दी. इसमें रंजित सिन्हा भी शामिल थे, जो उस समय सीबीआई के वरिष्ठ अधिकारी थे. लालू ने मुझे फिर कॉल किया और कहा कि पूछताछ दिल्ली में कर लें और मामले को गुप्त ही रखें. मैं सहमत हो गया, लेकिन उन्होंने फिर कॉल किया और कहा कि वहां इंटरनेशनल मीडिया होगी. आप मुझसे कोलकाता में पूछताछ कर लें. बार-बार अनुरोध बदलने से मैं परेशान हो गया था.’समन जारी होने के बाद लालू से किसी ने कहा कि बिस्वास के बंगाली होने की वजह से कोलकाता में परेशानी हो सकती है. मुझे नहीं पता कि किसने उन्हें इस तरह का फालतू आइडिया दिया. अंत में वह पटना से बाहर वाल्मिकी गेस्ट हाउस में पूछताछ के लिए तैयार हुए. मैंने कहा कि लालू बड़े कलाकार हैं और उनकी नौटंकी से किसी की तूलना नहीं हो सकती है.’
केस की शुरुआत में मुझपर राजनेताओं, ब्यूरोक्रेट्स और अपराधियों का दबाव था. इसने मुझे बौद्ध धर्म अपनाने के लिए प्रेरित किया. एक बार सीबीआई डायरेक्टर ने मुझसे लंच में नॉर्थ ब्लॉक आने को कहा. लेकिन उन्होंने सिर्फ धमकी दी. उन्होंने मुझसे कहा कि तुम तो फंसोगे. लोग तुम्हारे पीछे हैं. मैं उनके नाम का खुलासा नहीं कर सकता, लेकिन उन्हें मैंने सिर्फ इतना कहा कि मैं दबाव में नहीं आउंगा.

सुप्रीम कोर्ट पहुंचा
बिस्वास ने इसके बाद आर्मी की मदद से पटना से लालू की गिरफ्तारी की बात की. उन्होंने कहा, मेरे पास कोई ऑप्शन नहीं था. मेरे खिलाफ षडयंत्र रचा जा रहा था. दिल्ली के मेरे सीनियर फोन नहीं उठा रहे थे. इसके बाद एक सुझाव पर मैंने कानूनी रास्ता अपनाया. मैंने आर्मी से मदद मांगी, जिसे मना कर दिया गया. इसके अगले दिन मेरे सीनियर जो फोन नहीं उठा रहे थे, उन्होंने मेरे खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया. यह स्पष्ट था कि वह इस केस से मुझे दूर करना चाहते थे. अंत में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश जारी किया कि मैं इस केस का जांच अधिकारी रहूंगा, जिसने मुझे राहत दी.यह मेरे लिए चुनौती थी, क्योंकि इस केस में काफी प्रभावशाली लोग थे. इसमें लालू के खिलाफ जांच हो रही थी. देवगौड़ा और गुजराल की सरकार आरजेडी के सपोर्ट से चल रही थी. इस केस से लालू ही नहीं देवगौड़ा के लिए भी मुसीबत बढ़ी. बिस्वास कहते हैं, यह एक लंबी यात्रा थी. इसका फैसला मुझे ज्यादा उत्साहित नहीं कर रहा था. मैंने अपना काम एक अधिकारी के तौर पर किया और कानून ने अपनी तरह से काम किया. इसे मैंने व्यक्तिगत असंतोष के रूप में नहीं लिया.

पूर्व महानिदेशक सीएजी नन्दलाल

बिहार में पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के चारा घोटाले को उजागर करने वाले सीएजी के पूर्व महानिदेशक नन्दलाल .ने कोर्ट के फैसले को संतोषजनक बताया है।हिमाचल में धर्मशाला के घेराह निवासी नंद लाल ने बातचीत में कहा, पूरी टीम ने घोटाले के सबूतों का पुलिंदा तैयार करने के लिए कड़ी मेहनत की थी।इसका श्रेय किसी एक को नहीं, पूरी टीम को रहा। नंद लाल ने कहा, ‘हम दिन रात इस केस पर लगे रहे थे। तथ्यों में घोटाले को साबित करने के लिए दस्तावेजों का पुलिंदा तैयार किया गया। फैसले ने साबित कर दिया है कि जो गलत काम करेगा उसे सजा मिलना तय है।’ पैसों का पूरा खेल 1990 से 1996 के बीच का है. बिहार के सीएजी (मुख्य लेखा परीक्षक) ने इसकी जानकारी राज्य सरकार को समय-समय पर भेजी थी लेकिन सरकार ने ध्यान नहीं दिया. सीबीआई ने ये भी कहा कि विधानसभा में बजट का प्रावधान नहीं किया गया और लेखानुदान के जरिए पैसे निकाले जाते रहे. सीबीआई का कहना है कि उसके पास इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि मुख्यमंत्री रहे लालू यादव को मामले की जानकारी थी. कई साल तक वो खुद ही राज्य के वित्त मंत्री भी थे, तो उनकी मंजूरी पर ही इतनी बड़ी मात्रा में पैसे निकाले गए.
नंद लाल ने कहा, हाईप्रोफाइल मामले की जांच में जुटे अफसरों और मुलाजिमों की सुरक्षा का पहलू भी महत्वपूर्ण होता है। टीम की कड़ी मेहनत आखिरकार रंग लाई है। इस केस में सच सामने लाने और उसे साबित करने के लिए मीडिया की भूमिका भी सहयोगात्मक रही।बहुचर्चित चारा घोटाले की जांच शिमला की सरकारी परीक्षक प्रश्नास्पद प्रलेख (जीईक्यूडी) प्रयोगशाला में भी हो चुकी है। जीईक्यूडी से जुडे़ सूत्रों ने बताया कि इस प्रयोगशाला में इस घोटाले से जुडे़ हुए कुछ दस्तावेजों की छानबीन की जा चुकी है।इसमें आरोपियों के कई हस्ताक्षरों और लिखावटों का मिलान किया गया है। ऐसे दस्तावेजों ने ही इस मामले में सजा दिलवाने में काफी भूमिका निभाई है। इसी लैब में जेएमएम घूसखोरी मामले और हवाला केस की भी जांच की जा चुकी है।हवाला कांड का पर्दाफाश करने के लिए तो ये लैब पहले काफी चर्चित हो चुकी है। शिमला में ये प्रयोगशाला रेलवे बोर्ड बिल्डिंग में चल रही है। इसमें हाथ की लिखावटों और हस्ताक्षरों के नमूनों का मिलान किया जाता है।ये फोरेंसिक प्रयोगशाला केंद्र सरकार के नियंत्रण में है। यह प्रयोगशाला ब्रिटिशकाल से ही अस्तित्व में रही है। अंग्रेजों के शासनकाल में इसे वर्ष 1904 में खोला गया था। बाद में ये केंद्रीय फोरेंसिक प्रयोगशाला चंडीगढ़ के तहत लाई गई।

बेहतरीन खिलाडी और समाजसेवा में रमे

नंदलाल सेवानिवृत आई.ए.ए.एस. (भारतीय लेखा एवं लेखा परीक्षा यानी इंडियन ऑडिट एंड एकाउंटस सर्विस) हैं व कई अहम पदों पर महत्वपूर्ण जिम्मेवारियां निभा चुके हैं। वर्ष 2012 में महानिदेशक, कैग (कार्यालय, भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी सीएजी) के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। यह संस्था चारा घोटाला, कोयला घोटाला व 2 जी घोटाले को उजागर करने के चलते काफी चर्चा में रही है व नंदलाल के कार्यकाल में ही यह घोटाले एक के बाद एक जनता के सामने आए।हिमाचल के एक छोटे से गांव से उठकर उन्होंने अपनी मेहनत के बल पर कई उपलब्धियां हासिल कीं।  नन्दलाल यहाँ चण्डीगढ़ से सटे गाँव कंसल (मोहाली) में रहते हैं। खेल के साथ-साथ पढ़ाई में भी वह अव्वल रहे। वर्तमान में नंदलाल समाज सेवा कार्य में भी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं व सारथी नाम से एक एनजीओ के संचालक हैं। ये संस्था गरीब बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का इंतज़ाम करने के अलावा पर्यावरण सुरक्षा के कार्य में जुटी है। इसके अलावा वे आजकल लेखन कार्य में भी रमे हुए हैं। मूल रूप से हिमाचल के गांव घरोह (जिला कांगड़ा) के निवासी नंदलाल बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं व उन्हें बचपन से ही खेलकूद में काफी रूचि थी। उन्होंने शूटिंग के अलावा राष्ट्रीय स्तर पर फुटबाल खेला है व तैराकी, ट्रैकिंग एवं राफ्टिंग जैसे साहसिक खेलों में भी उन्होंने हाथ आजमाया है। इसके अलावा गोल्फ में भी वह सिंगल डिजिट हैंडीकैप के खिलाड़ी रह चुके हैं व कई प्रतिस्पर्धाएं जीत चुके हैं। वर्ष 2012 में दिल्ली में थ्री पोजिशन .22 राइफल शूटिंग प्रतियोगिता में वे पांचवां  स्थान प्राप्त कर चुके हैं।

सीबीआई पुलिस अधीक्षक वरूण सिंधु के. कौमुदी

यह मामला 21 साल पहले उजागर हुआ था. उस वक्त अपने गृह राज्य बिहार में प्रतिनियुक्ति पर तैनात वरूण सिंधु के. कौमुदी ने पशुपालन घोटाला इकाई, पटना के सीबीआई पुलिस अधीक्षक होने के नाते मामले की करीबी निगरानी की थी और मामले में आरोपपत्र भी दाखिल किया था. दोषी ठहराए जाने के बाद आंध्र प्रदेश कैडर के इस  पुलिस अधिकारी ने कहा कि मामला तार्किक निष्कर्ष तक पहुंच गया. यह संतोषजनक बात है दो दशक से भी पुराने मामले को याद करते हुए कौमुदी ने कहा कि पटना स्थित सीबीआई अदालत को ट्रक भर दस्तावेजों की प्रति सौंपी गई थी .उन्होंने बताया, ‘मुझे इससे जुड़े एक अन्य मामले में लालू प्रसाद को गिरफ्तार करने को कहा गया था, लेकिन उन्होंने अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया था.’ उन्होंने खुशी जताई कि मामला इतने साल बाद तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचा. वह फिलहाल नई दिल्ली में राष्ट्रीय जांच एजेंसी में अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक के पद पर तैनात हैं.

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