22 साल में IAS बनी यह महिला अफसर जहां जाती है, उस शहर और जिले को चमका देती है

कुछ अफसर जहां सिर्फ सोशल मीडिया पर लाइक्स बटोरने के चक्कर में रहते हैं,वहीं यह महिला आईएएस जमीनी काम कर तारीफें बटोर रही है

नई दिल्लीः जब स्मिता सब्बरवाल की तैनाती 2011 में तेलंगाना के सबसे पिछड़े जिले करीमनगर में हुई तो चुनौतियों का पहाड़ सामने खड़ा था। हर मुमकिन शक्ल में कदम-कदम पर समस्याएं थी। चार्ज संभालते ही पहले स्मिता ने जिले के पिछड़ेपन का अध्ययन किया। पाया कि स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र में ठोस काम किए बगैर करीमनगर का भला नहीं हो सकता। पता चला कि सरकारी अस्पतालों में सिर्फ नौ प्रतिशत ही डिलीवरी ही होती है।

गरीब महिलाएं अगर प्राइवेट अस्पताल में जाती हैं तो उन्हें 35 से 50 हजार रुपये का भारी-भरकम खर्च उठाना पड़ता है।  जिस पर  स्मिता सब्बरवाल ने अम्मा लालना((mother’s nurture)स्कीम लांच की। गरीब महिलाओं के लिए मुफ्त जांच से लेकर पूरी देखभाल की सुविधा अस्पतालों में मिलने लगी। जनजागरूकता के खूब प्रोग्राम चले। अब प्राइवेट हास्पिटल्स में गरीबों का जाना बंद हो गया। क्योंकि गर्भकाल की सभी जांचों से लेकर डिलीवरी तक के इंतजाम सरकारी अस्पतालों में ही उपलब्ध होने लगे। जिस पर करीमनगर में 2001 बैच की आईएएस स्मिता को जनता का अफसर कहा जाने लगा।

 

प्रधानमंत्री ने किया सम्मानित

करीमनगर जैसे पिछड़े और गरीबी से जूझ रहे जिले में स्वास्थ्य, शिक्षा और विकास से जुड़े हर सेक्टर में मुहिम चलाकर आईएएस स्मिता सब्बरवाल ने बदलाव की बयार ला दी। नतीजा रहा कि कुछ ही समय के बाद उस करीमनगर को बेस्टटाउन का अवार्ड मिला। जो पहले बदहाल रहता था। जिसे सबसे गंदा टाउन कहा जाता था।करीमनगर में हाई रिस्क प्रग्नेंसी मैनेजमेंट प्रोग्राम चलाकर जच्चा-बच्चा मौत रोकने की दिशा में सफल कदम की सराहना केंद्र सरकार के स्तर पर भी हुई। इस अनूठी मुहिम के लिए स्मिता को प्रधानमंत्री एक्सीलेंसी अवार्ड भी मिल चुका है।

 

स्मिता को अस्पतालों में स्टाफ की गलत कार्यप्रणाली की लगातार शिकायतें मिल रहीं थीं। इस पर उन्होंने पहले करीमनगर के सभी अस्पतालों कों कंप्यूटर सेट और इंटरनेट से लैस किया। फिर स्काइप से उऩकी मानीटरिंग शुरू कर दी। स्मिता की सख्त मॉनीटरिंग के चलते धीरे-धीरे अस्पतालों की सेहत सुधर गई। इससे पहले स्मिता संयुक्त आंध्र प्रदेश( तेलंगाना से पहले) के वारंगल आदि जिलों में काम कर चुकीं। हर जगह उन्होंने लीक से हटकर काम कर अपनी पहचान बनाई।

वारंगल की तस्वीर बदल दी

शुरुआत में जब स्मिता सब्बरवाल को वारंगल का म्यूनिसिपल कमिश्नर बनाया गया तो उन्होंने शहर की सूरत ही बदल दी। फंड योर सिटी स्कीम लांच की। इस स्कीम से नागरियों को जोड़ कर उन्हें शहर के लिए तोहफे देने के लिए प्रेरित किया। सब्बरवाल की मुहिम रंग लाई और वारंगल के नागरिकों ने मिलकर शहर के लिए कई पार्क, फुटओवर ब्रिज जैसी तमाम सुविधाओं को विकसित कर दिया। पीपीपी मॉडल पर वारंगल के विकास की इस मुहिम को सरकार ने खूब सराहा।

और मुख्यमंत्री ने अपने ऑफिस में बनाया सेक्रेटरी

हर टॉस्क को समय से पूरा करने और काफी सख्त अफसर होने के कारण स्मिता की शोहरत बढ़ती गई। जब आंध्र प्रदेश से अलग होकर तेलंगाना राज्य बना तो स्मिता सब्बरवाल पहली महिला अफसर रहीं, जिन्हें मुख्यमंत्री केसीआर सब्बरवाल ने अपने कार्यालय में जगह दी।  2015 में उन्हें मुख्यमंत्री कार्यालय में एडिशनल सेक्रेटरी पद पर नियुक्ति मिली।। जब सब्बरवाल की तैनाती हुई थी तो आउटलुक मैग्जीन ने उनपर प्रकाशित स्टोरी में सेक्सी कमेंट किए थे।

सेक्सी कमेंट पर जब आउटलुक को मांगनी पड़ी माफी

स्मिता सब्बरवाल देखने में काफी खूबसूरत हैं। नई-नई डिजाइन की आकर्षक साड़ियां पहनना खूब पसंद करती हैं। जब उन्हें सीएम कार्यालय पर एडिशनल सेक्रेटरी बनाया गया  तब आउटलुक पत्रिका ने एक स्टोरी प्रकाशित की। जिसमें किए सेक्सी कमेंट्स पर विवाद खड़ा हो गया।   कहा गया कि सब्बरवाल को ये पोस्ट उनकी ड्रेसिंग सेंस, उनकी आकर्षक पर्सनैलिटी, उनकी ख़ूबसूरती और हर मीटिंग में सुंदर साड़ियों में उनकी मौजूदगी के कारण मिली। यही नहीं  पत्रिका ने भद्दे कैरिकेचर में सीएम को उनकी फोटो क्लिक करने के साथ अन्य नेताओं को चीयर करते पेश किया।  जिस पर स्मिता ने पत्रिका को लीगल नोटिस भेजते हुए  उनके द्वारा किए गए काम को नज़रअंदाज़ करने का आरोप लगाया। संपादक को लताड़ लगाते हुए लिका कि-हम पाषाण युग से काफी आगे आ गए हैं, मिस्टर एडिटर। बाद में संपादक को माफी मांगनी पड़ी।

 

बहुत प्रतिभावान रहीं हैं सब्बरवाल

 

स्मिता सब्बरवाल बहुत प्रतिभाशाली रहीं हैं। आइसीएसई की 12 वीं परीक्षा की आल इंडिया टॉपर रहीं हैं। 2001 में यूपीएससी की परीक्षा में जब चौथी रैंक से सफलता हासिल की तब स्मिता की उम्र महज 22 साल थी।

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