गरीबी से जूझकर आईपीएस बनी यूपी की ये यतीम बेटी इल्मा अफरोज

 आॅक्सफोर्ड की पढ़ाई छोड़ आईपीएस अफसर बनी किसान की बेटी इल्मा अफरोज
 नासिर हुसैन //
मुरादाबाद के कुंदरकी कस्बे में रहने वाली इल्मा अफरोज के पिता का इंतकाल उस वक्त हो गया था जब वो सिर्फ 14 साल की थी. पिता पेशे से एक किसान थे. उसके बाद इल्मा और उसके छोटे भाई की जिम्मेदारी संभाली उनकी मां ने. लेकिन पढ़ाई में कामयाबी हासिल करते हुए इल्मा ने भी कभी उन्हें मायूस नहीं किया.

कस्बे से पढ़ाई करने के बाद इल्मा ने दिल्ली और लंदन में भी पढ़ाई की. लेकिन हुब्बुल वतनी (देशभक्ति) इल्मा को लंदन, इंडोनेशिया और पेरिस से भी वापस ले आई और यहां आकर उन्होंने वो कर दिखाया जिसका सेहरा देश के चंद लोगों के सिर ही बंधता है. इतना ही नहीं इल्मा का भाई भी संस्कृत साहित्य विषय के साथ सिविल सर्विस की तैयारी कर रहा है. आइए इल्मा की ज़ुबान में जानते हैं उनकी कामयाबी की दांस्ता.

‘मिसाइल मैन डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की एक लाइन ‘सपने वो होते हैं जो तुम्हे सोने न दें’ अक्सर मुझे सोने नहीं देती थी. ये ही वजह थी कि मैं मुरादाबाद से 12वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद सेंट स्टीफेंस कॉलेज दिल्ली आ गई. जब तक कॉलेज की पढ़ाई पूरी होती मुझे आगे की पढ़ाई के लिए मौके मिलने शुरु हो गए. दिल्ली के बाद मुझे ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ने का मौका मिल गया.

पेरिस स्कूल ऑफ इंटरनेशनल में भी पढ़ी और इंडोनेशिया में भी पढ़ने का मौका मिला. इसी दौरान क्लिंटन फाउंडेशन के साथ काम करने का मौका भी मिला. लेकिन इस कामयाबी पर पहुंचने के बाद भी दिल को एक सुकून नहीं मिल रहा था. मन में एक ही ख्याल आता था कि मेरा काम और मेरी पढ़ाई किसके लिए. फिर एक दिन मैंने अपने मुल्क हिन्दुस्तान वापस लौटने का फैसला किया. और अच्छी बात ये है कि मेरे इस फैसले में मेरे छोटे भाई अरफात अफरोज और मेरी मां ने मेरा पूरा साथ दिया.32 बीघा ज़मीन (5 एकड़) पर खुद खेती करने वाले इल्मा अफ़रोज़ के पिता अफ़रोज़ 14 साल पहले उनके परिवार को बेसहारा छोड़कर चले गए तो घर बड़ी बेटी होने के नाते इल्मा ने परिवार संभाल लिया।इल्मा के घर में किचन एक तख्त के ऊपर चलता है। उसके ड्राइंग रूम की छत पर फूस का छप्पर है। उसका ड्रेसिंग टेबल उनकी अम्मी को दहेज़ में मिला था, जो गल चुका है।

इल्मा के घर के दो कमरों में कोई बेड नहीं है। चारपाई टूटी हुई है। कुर्सियां पड़ोस से मांगकर लाई गई है। इल्मा के पास बेहद सस्ता स्मार्ट फोन है, जिसकी स्क्रीन टूट चुकी है।

अब से पहले भले ही कोई इन्हें पूछने वाला न हो, मगर जबसे उनके आईपीएस बनने की आहट हुई है, अचानक से रिश्तेदारों की आमद बढ़ गई है, इसलिए कुछ दिन से घर में खाना अच्छा बन रहा है।

इल्मा की कहानी में इतना दर्द है कि आपका कलेजा बाहर उछाल मारने की यक़ीनन कोशिश करेगा। इल्मा पेरिस, लंदन, न्यूयॉर्क और जकार्ता तक में पढ़ाई कर चुकी हैं। इनकी पढ़ाई ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी तक में हुई है। यूएन और क्लिंटन फॉउंडेशन के लिए भी काम किया है। बावजूद इसके इल्मा बिल्कुल साधारण कपड़े पहनती हैं और साधारण तरीक़े से ही रहती हैं।

अद्भुत प्रतिभा की मालकिन इल्मा हिम्मत न हारने की मिसाल हैं। अपने जीवन के संघर्षों को बताते हुए बिल्कुल हिचकती नहीं हैं।

वो कहती हैं, 9वीं में सबकुछ ठीक था। उसके बाद अब्बू नहीं रहे। मैं तब 14 साल की थी। भाई 12 का था। अब्बू मेरे बाल में कंघी करते थे। मैंने बाल ही कटवा दिए। उनकी जगह खेती संभाल ली। अब सवाल पढ़ाई का था। पहले 12वीं तक पढ़ाई स्कॉलरशिप के आधार पर हुई। फिर दिल्ली स्टीफ़न कॉलेज में दाख़िला मिल गया। वहां भी स्कॉलरशिप से पढ़ी। इसके बाद पेरिस, न्यूयॉर्क, ऑक्सफोर्ड सब जगह स्कॉलरशिप मिलती रही और मैं पढ़ती रही।

वो आगे कहती हैं कि, स्कॉलरशिप से मेरी पढ़ाई तो हो रही थी। लेकिन खुद का खर्च चलाना मुश्किल काम था। इसके लिए मैंने लोगों के घरों में काम किया। बर्तन साफ़ किए। झाड़ू-पोछा किया। बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया।

इल्मा कहती हैं कि, पिछले साल अपने भाई के कहने पर मैंने सिविल सर्विस का एक्ज़ाम दिया। पहले मैं आईएएस बनना चाहती थी, मगर मुझे लगा कि मेरे लिए आईपीएस होना ज़्यादा ज़रूरी है।

बेहद प्रतिकूल परिस्थितियों में हौसलों की मिसाल लिखने वाली इल्मा खेत में पानी चलाने, गेंहू काटने, जानवरों का चारा बनाने जैसे काम भी करती रही हैं।इल्मा कहती हैं, लोग कहते थे लौंडिया है, क्या कर लेगी। अब कर दिया लौंडिया ने। मगर मेरी ज़िन्दगी में मुस्क़ान नाम की चीज़ अब आई है।इल्मा के आईपीएस बनने के बाद स्थानीय लड़कियों में ज़बरदस्त क्रेज पैदा हो गया है। वो इल्मा से मिलने आती हैं। पिछले 3 दिन से उन्हें लगातार स्कूल कॉलेज में बोलने के लिए बुलाया जा रहा है।

इल्मा बताती हैं, डिबेट तो मेरी ज़िन्दगी का अहम हिस्सा रही है। दिल्ली में डिबेट में प्राईज मनी के तौर पर जो पैसा मिलता था, उसी से मेरा ख़र्च चलता था। उस पैसे के लिए मुझे हर हाल में जीतना होता था। लेकिन अब बोलने के पैसे नहीं मिल रहे हैं, तसल्ली मिल रही है।कुंदरकी के नबील अहमद (45) इल्मा की कामयाबी को चमत्कार मानते हैं। वो हमसे कहते हैं, अब तक कुंदरकी को विश्वास ही नहीं हो रहा है, यह कैसे हो गया। जिस दिन इल्मा नीली बत्ती में वर्दी पहने गांव में आएगी, उस दिन कुंदरकी झूम उठेगी। इस लड़की ने वाक़ई कमाल कर दिया है।मगर इल्मा की मां सुहेला अफ़रोज़ अभी से झूम रही हैं। वो कहती हैं, मेरी बेटी ने बहुत तकलीफ़ झेली है, उसका रब खुश हो गया है।

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