आर्थिक पूर्वानुमान जताना मजाक में इस्तेमाल होने लगा

*आर.जगन्नाथन – लेखक आर्थिक मामलों के वरिष्ठ पत्रकार,’डीएनए’ के एडिटर रह चुके हैं।

भारत में1960 के दशक में अमेरिका के राजदूत रहे जॉन केनेथ गैलब्रैथ ने एक बार कहा था, “आर्थिक पूर्वानुमान का सिर्फ एक काम है- ज्योतिषशास्त्र को सम्मानजनक बनाए रखना।’ लेकिन उनके इस कथन को आर्थिक पूर्वानुमान जताने वालों के खिलाफ मजाक के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है क्योंकि अर्थशास्त्रियों के पूर्वानुमान अक्सर गलत साबित हुए हैं। जरा गौर करें, 8 नवंबर को जब 500 और 1,000 रुपए के पुराने नोट बंद करने की घोषणा की गई थी। उस समय सरकार ने एक झटके में करीब 85 फीसदी मुद्रा चलन से बाहर कर दी थी। उस समय तमाम अर्थशास्त्रियों ने इसके काफी बुरे परिणाम दिखने की आशंका व्यक्त की थी। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि देश की विकास दर 2 फीसदी तक घट सकती है। एम्बिट कैपिटल ने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की रफ्तार में 3.3 फीसदी तक गिरावट आने की आशंका जताई थी। एक अर्थशास्त्री ने यहां तक कहा था कि सिर्फ एक व्यक्ति के लिए सबका खून चूसा जा रहा है। लेकिन हकीकत महज ‘एक रक्त दान शिविर’ के रूप में सामने आई। मध्यम रुख रखने वाले ज्यादातर अर्थशास्त्रियों ने विकास दर एक फीसदी तक घटने का अंदेशा जताया था-जो हकीकत के काफी करीब हो सकता है।
जीडीपी के अक्टूबर से दिसंबर तिमाही के आंकड़े, जिसमें दो महीने नोटबंदी के भी रहे, बताते हैं कि इस दौरान देश की जीडीपी 7 फीसदी की रफ्तार से बढ़ी है। इसी के साथ केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने पूरे वित्त वर्ष 2016-17 के जीडीपी का आंकड़ा 7.1 फीसदी रहने का पूर्वानुमान व्यक्त किया है। तीसरी तिमाही में कृषि क्षेत्र का प्रदर्शन बेहतर रहा है। आठ में से छह प्रमुख उद्योग क्षेत्रों ने पहले के मुकाबले अपने क्षेत्र में गतिविधियां बढ़ने की जानकारी दी है। सिर्फ कंस्ट्रक्शन और वित्तीय सेवा क्षेत्र इसके अपवाद रहे, जो अनपेक्षित नहीं है। मेन्युफैक्चरिंग क्षेत्र तीसरी तिमाही में 8.3% की रफ्तार से बढ़ा है जबकि अर्थशास्त्रियों ने मांग में तेज गिरावट और आर्डर में देरी की आशंका जताई थी। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि नोटबंदी का अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव नहीं पड़ा और संभव है इसका कुछ असर हमें चौथी तिमाही में दिखे। लेकिन अर्थशास्त्रियों की आशंकाएं गलत साबित हुई। नोटबंदी पर विभिन्न लोगों ने इस पर अलग-अलग प्रतिक्रिया दी। लेकिन सहजबुद्धि के आधार पर हम जिस तथ्य विश्वास करें, जरूरी नहीं कि वही शुद्ध परिणाम भी हो। मसलन, नोटबंदी के बाद नवंबर-दिसंबर के दौरान स्वाभाविक है कि लोगों ने टिकाऊ उपभोक्ता सामान नहीं खरीदे होंगे। इससे मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों और रिटेलर्स की बिक्री में तेज गिरावट दिखनी चाहिए। लेकिन संभव है उस दौरान लोगों ने पुराने नोटों के रूप में जमा कालेधन को निकालकर इससे खरीदारी की हो, जिससे हमें बिक्री अधिक दिख रही हो। संभव है निर्माताओं ने बने माल को रिटेलरों पर बिक्री अधिक होने की जानकारी दी हो और ये माल वास्तव में चौथी तिमाही में बिके। बिग बाजार जैसे बड़े रिटेलरों ने अच्छी बिक्री होने की जानकारी दी क्योंकि नाेटबंदी के बाद लोगों ने कैश के बजाय क्रेडिट कार्ड और ई-वॉलेट से ज्यादा खरीदारी की। पेट्रोलियम और बिजली कंपनियों को पुराने नोट स्वीकारने की अनुमति दी गई थी, उनकी बिक्री और बिल भुगतान में तेजी देखने को मिली। इस तरह नोटबंदी का सकारात्मक प्रभाव भी हुआ। लोग यह भी भूल जाते हैं कि जब एक बाजार गिर रहा हो कंपनियां दूसरा बाजार तलाशती हैं। नवंबर से जनवरी के दौरान एक्सपोर्ट अच्छा रहा। इस दौरान यह क्रमश: 2.2%, 4.2% और 5.7 फीसदी की रफ्तार से बढ़ा। यह बेहतर प्रदर्शन ऐसे समय दिखा जब निर्यात में लंबे समय से गिरावट का रुख था। इन तीन महीनों की ग्रोथ बताती है कि कंपनियों ने घरेलू बिक्री में हुए नुकसान की भरपाई निर्यात से की।
अर्थशास्त्रियों की आशंकाएं गलत साबित होने के पीछे एक वजह यह भी रही कि उन्होंने मौजूदा रुझान के आधार पर सीधा पूर्वानुमान व्यक्त किया। जब नवंबर-दिसंबर में कंपनियों को सुस्ती और बैंकों के बाहर लंबी कतारें लगी तो लगा कि आर्थिक गतिविधियों पर नकारात्मक असर होगा। कुछ अर्थशास्त्री अब भी यही कह रहे हैं कि नोटबंदी का बुरा असर चौथी तिमाही में देखने को मिलेगा। लेकिन जनवरी और फरवरी में कारों की बि्री बढ़ी है। इस बात के आसार अधिक हैं कि जिन लोगों ने नोटबंदी के महीनों में खर्च टाल दिए थे, हो सकता है उन्होंने अब अपनी योजना के मुताबिक फिर खरीदारी शुरू कर दी हो। यदि मांग सामान्य स्तर पर जाती है तो संभव है चौथी तिमाही में भी नोटबंदी का उतना प्रभाव दिखे जितने की अर्थशास्त्रियों ने आशंका व्यक्त की है।
वास्तविक परिदृश्य यह है कि नोटबंदी का विपरीत प्रभाव मार्च तक खत्म हो जाएगा और अप्रैल से हमें आर्थिक गतिविधियों में तेज रिकवरी देखने को मिलेगी। अर्थशास्त्रियों को कुछ विनम्रता विकसित करने की जरूरत है। साथ ही उन्हें यह दावा करने से बचना चाहिए कि नोटबंदी जैसे कदम के बाद लोग क्या करेंगे, वे इसकी भविष्यवाणी कर सकते हैं।

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