भाजपा में गलाकाट खींचतान-80 टिकट काटने की खबरों ने नेताओं की नींद उड़ाई

भाजपा के अंदरखाने से आई 80 मौजूदा विधायकों-मंत्रियों के टिकट काटकर उनके स्थान पर फ्रेश चेहरों को मैदान में उतारने की पुख्ता खबरों ने पार्टी में गलाकाट प्रतिस्पर्धा का माहौल बना दिया है। रायशुमारी में एक-एक सीट से डेढ़-डेढ़ दर्जन तक उम्मीदवारों ने दावेदारी पेश करके पार्टी नेतृत्व की पेशानी पर ङ्क्षचता की लकीरें खींच दी हैं।


भोपाल //एंटी इनकम्बेंसी, एट्रोसिटी एक्ट और सवर्णों के आंदोलन के मद्देनजर उपजी राजनीतिक परिस्थितियों के बीच 80 मौजूदा विधायकों-मंत्रियों के टिकट काटने की अंदरखाने की खबरों ने अगर बहुतों की नींद उड़ा दी है तो दूसरी तरफ कईयों की उम्मीदें भी जगा दी हैं कि इस उलटफेर में अवसर तलाशा जा सकता है। कोई छप्पन लाख रुपए फीस चुका कर भाजपा ने प्रोफेशनल एजेंसी से जो सर्वे रिपोर्ट हासिल की है वह अलार्मिंग बताई जाती है। इस रिपोर्ट के मुताबिक भाजपा के लिए यह चुनाव जरा भी आसान नहीं है। भाजपा को मिले फीडबैक में बताया गया है कि कमलनाथ जिस तरह सामाजिक और धार्मिक संगठनों को अंदर ही अंदर साधने में लगे हैं, वह भाजपा को काफी नुकसान पहुंचाने वाला हो सकता है।

आरएसएस का आकलन है कि राज्य में नेतृत्व को लेकर कोई गुस्सा नहीं है लेकिन विधायकों के प्रति सुदूर ग्रामीण इलाकों में लोगों में जबरदस्त गुस्सा है। इस गुस्से से निपटने का एक ही कारगर तरीका है कि चेहरा बदल दिया जाए। टिकट कटने की खबरों का असर रायशुमारी में साफ नजर आता है। एक तो रायशुमारी में हर सीट में दावेदारों की फौज खड़ी कर दी है तो दूसरी तरफ इन दावेदारों की आपसी खींचतान से जबरजस्त विवाद के हालात बनने लगे हैं। रायशुमारी के बाद शायद ही ऐसी कोई बची होगी , जहां सिंगल दावेदारी होगी। मालवा के प्रमुख शहरों में तो एक-एक सीट के लिए डेढ़ दर्जन तक दावेदार सामने आ रहे हैं। मजा इस बात का है कि, कई उम्र दराज नेताओं ने तो स्वयं के साथ-साथ अपने बेटे-बेटियों के नाम भी आगे बढ़ा दिए हैं, ताकि  उनका नाम कट भी जाए तो परिवार वाले किसी सदस्य के लिए अड़ा जा सके।  लेकिन पूरे चुनाव पर पैनी नजर बनाए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, जिनकी एक सर्वे टीम पिछले कई महीनों से मध्यप्रदेश में डेरा डाले अपना फीड बैक उन्हें दे रही है, परिवार वाद को तरजीह देने की मनस्थिति में नहीं हैं।

दरअसल, पिछले पंद्रह सालों में पहली बार इन चुनावों में रुख बदला-बदला सा नजर आ रहा है। इन चुनावों में अगर सपा-बसपा से कांग्रेस को चुनौतियां मिल रही हैं तो भाजपा के लिए भी एट्रोसिटी एक्ट और आरक्षण से नाराज अगड़ी और पिछड़ी जातियों की लामबंदी ने संघर्ष की गहरी खाई खोद दी है। अगड़ी जातियों के गुस्से में उपजे सपाक्स ने जो कि अब राजनीतिक पार्टी का रूप ले चुकी है, इस चुनाव का रंग बदल कर रख दिया है। पिछले एक दशक तक संप्रदायों पर लड़े जाने वाले चुनाव में इस जातियों की जोर आजमाइश बढ़ी हुई नजर आ रही है। लेकिन, भाजपा नेताओं को भरोसा है कि सवर्ण और पिछड़ी जातियों के लिए भाजपा के अलावा कहीं और कोई ठिकाना नहीं हो सकता है। पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर मानते हैं कि अगड़ी जातियां सिर्फ भाजपा पर भरोसा करती हैं। उनके पास दूसरा कोई विकल्प ही नहीं है। भाजपा के एक और नेता राज्य सरकार के प्रवक्ता नरोत्तम मिश्रा सवर्णों को अपना कमिटेड वोटर मानते हैं लेकिन राज्य के 52 फीसदी ओबीसी व पिछड़ा वर्ग के वोटर किसके साथ  हैं? यह बड़ा सवाल है।

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