देशव्यापी आकलन करके आईएएस अधिकारियों की कमी का हो विश्लेषण

ए के भट्टाचार्य /दिल्ली/

केंद्र और राज्यों में भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के अधिकारियों की अधिकृत संख्या और उनकी वास्तविक संख्या में पिछले वर्ष तक अनुमानत: 1,470 का अंतर था। यानी कुल अधिकृत संख्या से करीब 23 फीसदी कम अधिकारी नियुक्त हैं। यह अंतर बहुत ज्यादा है। हालांकि पिछले कई वर्षों के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं इसलिए यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता है कि यह अंतर बढ़ रहा है अथवा नहीं। लेकिन यह अंतर अकेले ही यह बताने के लिए पर्याप्त है कि देश में आईएएस सेवा के ढांचे की स्थिति क्या है।

 उपरोक्त आंकड़ों पर अगर गौर किया जाए तो इससे दो प्रश्न उत्पन्न होते हैं? पहला प्रश्न यह है कि आखिर क्यों राज्यों और केंद्र की सरकार ने इस अंतर को लगातार बढऩे दिया और इसे पाटने के लिए आवश्यक इंतजाम नहीं किए? दूसरा, सरकारी व्यवस्था में ज्यादा लोग ऐसे नहीं हैं जो इस बात को लेकर खास परेशान हों। क्या प्रशासन और शासन की जरूरतों की प्राथमिकता इतनी कम है कि इस प्रकार की कमी की अनदेखी की जा सकी?
अधिकारियों की अधिकृत संख्या और वास्तविक नियुक्ति के बीच के इस बढ़ते अंतर से उत्पन्न दूसरा सवाल तो और अधिक चिंतित करने वाला है। अगर आईएएस अधिकारियों की नियुक्ति में 23 फीसदी की कमी के साथ भी भलीभांति प्रशासनिक कामकाज चल रहा है तो कहीं ऐसा तो नहीं कि ऐसे अधिकारियों की जरूरी संख्या का आकलन करने में किसी तरह की गड़बड़ी हो? बहुत संभव है कि विभिन्न क्षेत्रों में आईएएस अधिकारियों की आवश्यकता का जरूरत से अधिक आकलन किया गया हो। यह काम तो तथाकथित नियोजन के नाम पर भी हो सकता है जहां अचानक कर्मचारियों की कमी या आपातकालीन हालात को ध्यान में रखते हुए कदम उठाया जाए।
अगर ऐसी बात है तो फिर तात्कालिक आवश्यकता है एक देशव्यापी आकलन करके आईएएस अधिकारियों का एक अधिक वास्तविक आकलन किया जाना चाहिए। जिससे यह पता चल सके कि केंद्र और राज्यों में आखिर ऐसे कितने अधिकारियों की आवश्यकता है। यह सवाल तो किसी के भी दिमाग में आएगा ही कि अगर सरकार इन 23 फीसदी अधिकारियों के बिना काम चला सकती है तो उसे तत्काल इन रिक्तियों को समाप्त कर अपना आकार छोटा करने की कवायद शुरू कर देनी चाहिए। यह पहला चरण होना चाहिए। इसके बाद दूसरे चरण में इस बात का नए सिरे से आकलन किया जाना चाहिए कि हर राज्य और केंद्र में आईएएस के कितने पद होने चाहिए?
तीसरे चरण में हर पांच साल में राज्यों में आईएएस की जरूरत की समीक्षा की व्यवस्था समाप्त की जानी चाहिए। अब हर पांच साल पर होने वाली समीक्षा के बजाय इसे केंद्र या राज्य की वक्ती जरूरत के मुताबिक अंजाम दिया जाना चाहिए। राज्य स्तर पर आईएएस अधिकारियों की ऐसी समीक्षा उत्तर प्रदेश में दिसंबर 2014 में की गई। उस समीक्षा के बाद उत्तर प्रदेश के आईएएस अधिकारियों की संख्या पांच फीसदी बढ़ाकर 621 कर दी गई। राज्यों में आईएएस अधिकारियों की संख्या बढ़ाने संबंधी समीक्षा पर भविष्य में रोक लगाई जानी चाहिए। इसके बजाय अब अधिकारियों की वास्तविक आवश्यकता का नए सिरे से आकलन किया जाना चाहिए।
केंद्रीय कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय न अधिकारियों की कमी के बारे में यही कहता है कि उनकी सालाना भर्ती की संख्या बढ़ाई जा रही है। लेकिन 23 फीसदी की कमी की समस्या नई नहीं है। सरकार पिछले कई सालों से इस कमी और इस अंतर से जूझ रही है। इसलिए कहा जा सकता है कि यह समस्या केवल आपूर्ति के मोर्चे पर हल नहीं की जा सकती है। इसके बजाय जरूरत इस बात की है कि मांग के क्षेत्र में नए सिरे से आकलन कर हल तलाशने का प्रयास किया जाए।
यहां एक और मुद्दा है। आईएएस अधिकारियों की अधिकृत संख्या और वास्तविक तैनाती में सबसे बड़ा अंतर बिहार में 37 फीसदी का है जबकि सबसे कम अंतर राजस्थान में 14 फीसदी है। संभव है कि प्रशासन और आईएएस अधिकारियों की नियुक्ति में कमी को लेकर कोई सहसंबंध स्थापित किया जा सके।  एक आकलन जो ऐसे संबंध पर या इसकी कमी की ओर संकेत कर सकता है, उसकी मदद से यह पता लगाया जा सकता है कि आदर्श स्थिति में विभिन्न राज्यों में कितने आईएएस अधिकारियों की जरूरत होगी।
रोचक बात है कि छत्तीसगढ़ और पंजाब में यह कमी क्रमश: केवल 15 और 16 फीसदी है। जबकि मध्य प्रदेश, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, गोवा, मिजोरम और केंद्र शासित प्रदेशों में यह कमी 18-19 फीसदी के दायरे में बनी हुई है। इसके विपरीत बेहतर प्रशासित राज्यों में कमी बनी हुई है। इससे यह प्रश्न पैदा होता है कि वाकई अच्छे प्रशासन और अधिकारियों के आंकड़े में क्या संबंध है। महाराष्ट्र, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में से प्रत्येक में यह अंतर 22 फीसदी है, गुजरात और तमिलनाडु में 24 फीसदी, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल में 28 फीसदी और केरल में यह अंतर 32 फीसदी है।
यह दलील देना संभव है कि इनमें से कुछ राज्यों में अब प्रशासन पहले की तरह बेहतर नहीं रह गया है और आईएएस अधिकारियों की संख्या में कमी की वजह से ही यह अंतर देखने को मिल रहा है। लेकिन राज्यों में प्रतिशत का यह अंतर बताता है कि देश में आईएएस अधिकारियों की तादाद और उनकी आवश्यकता की नए सिरे से समीक्षा करने की आवश्यकता है। इसके बजाय लगातार बड़ी तादाद में आईएएस अधिकारियों की भर्ती की जा रही है ताकि उस कमी को दूर किया जाए।

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