सेवाकाल खत्म होने के बाद एक बार फिर से यूनिफार्म में सज सकेंगे आईजी पाटणकर

**साक्षात्कार नागपुर से – नीरज ओमप्रकाश श्रीवास्तव**

भारतीय पुलिस सेवा के अंतर्गत महाराष्ट्र राज्य में आईजी पद पर सेवारत श्री प्रतापसिंह पाटणकर ३१ अगस्त २०१७ में अपनी गरिमामयी सेवाओं के साढे तैतीस बर्ष पूरे होने पर सेवानिवृत होने के बाद भी एक दिन के लिये एक बार फिर से यूनीफार्म पहन सकेंगे. इसी साल उन्हें गुणवत्तापूर्वक सेवाओं के लिये राष्ट्रपति पदक से नवाजा गया हैं और यह पदक उन्हें सेवानिवृति के बाद राज्य सरकार द्वारा आयोजित समारोह में अगले माह दिया जायेगा. यही कारण है कि वे सेवानिवृति के बाद जिस दिन समारोह होगा उस दिन वे अपने समूचे कैरियर के दौरान मिले पदकों को अपनी यूनिफार्म पर सजाकर अपना विशिष्ट सेवाओं के लिये मिलने वाले राष्ट्रपति पदक को ग्रहण करेंगे. सेवानिवृति के बाद फिर से अपनी अधिकारिक यूनिफार्म पहन सकना बहुत किस्मतवाले अधिकारियों के भाग्य में ही होता है.

       मराठा राजवंश से संबद्ध जागीरदार परिवार से आये पुलिस सेवा में

         जब बात भाग्य की निकली है तो यहां बताना गौरतलब है कि भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी के रूप में महाराष्ट्र राज्य में अपनी सुदीर्घ सेवा देने वाले आईजी प्रतापसिंह पाटणकर का जन्म मराठा राजघराने से संबद्ध जागीरदार परिवार में हुआ. संभाजी महाराज से सीधी संबद्धता रखने वाले छत्रपति शिवाजी महाराज के प्रमुख पाटण जागीरदार परिवार में जन्में भाग्यशाली श्री प्रतापसिंह पाटणकर के परिजनों के पास सन १६८५ में मराठा राजवंश से प्राप्त पत्र सुरक्षित हैं जो मराठा राजवंश से उनकी पारिवारिक संबद्धता का परिचायक हैं. इसीलिये महाराष्ट्र राज्य में पुलिस महकमें में उनके महत्वपूर्ण पद पर होने के बाबजूद उनके मृदुल व्यवहार का राजसी अंदाज उनसे मिलनें पहुंचे अधीनस्थ अधिकारियों-कर्मचारियों के अलावा सामान्य नागरिकों और आगंतुकों को सहज ही प्रभावित कर लेता रहा है.वे सचमुच इतने आत्मीयता से सबसे बात करते हैं कि अपनी समस्या शिकायतें लेकर पहुँचे भेंटकर्ता मन खोलकर अपनी बात कह पाते हैं और उन्हें विश्वास भी होता है कि उनकी समस्या का समाधान हो सकेगा.

 १९९९ में भारतीय पुलिस सेवा में शामिल..

श्री प्रताप सिंह पाटणकर की पारिवारिक पृष्ठभूमि में उनके पिता भी पुलिस विभाग में ही रहे. उनके परदादा सन् १८१८ में पेशवाई के अन्तर्गत बडौ.दा आर्मी में सेकंड इन कमान रहे. भाई विक्रमसिंह पाटणकर महाराष्ट्र राज्य की पूर्ववर्ती सरकार में लोकनिर्माण मंत्री और अपने अंचल क् लोकप्रिय राजनेता हैं. तीसरे भाई शिवाजी पाटणकर राज्य मंत्रालय में अवर सचिव के पर पर सेवारत हैं. बर्ष १९८४ में श्री प्रताप पाटणकर महाराष्ट्र राज्य पुलिस सेवा के अधिकारी के रूप में राज्य पुलिस बल में भर्ती हुए. अपनी पन्द्रह बर्ष की सेवाओं के बाद बर्ष १९९९ में वे भारतीय पुलिस सेवा के अंग बन गये. १९९९ में उन्हें आईपीएस अवार्ड हुआ.श्री प्रतापसिंह पाटणकर की राज्य पुलिस में सेवा के साढे तैतीस बर्ष एक पुलिस सेवा की गरिमा और उसके लोकोन्मुखी स्वरूप का परिचायक रहे हैं. जिला नंदुरवार के अलावा गढचिरौली जिले के अहेरी में उनकी सेवाओं को विस्मृत नहीं किया जा सकता. बर्षों पहले नक्सलवाद की कमर तोड.देने वाले अधिकारी को उस समय नक्सलियों नें हाथ से लिखे पोस्टर जगह जगह चिपका कर उन्हें जान से मारने की धमकियां तक दे डालीं. लेकिन अपने कर्तव्य के प्रति गहरी आस्था और निर्भय व्यक्तित्व के स्वामी श्री पाटणकर कभी डिगे नहीं. मुंबई के ठाणे में एसीपी के रूप में उनके कार्यकाल को नागरिक याद रखे हुए हैं जबकि कोंकण में उनका कार्यकाल बहुत अल्प रहा. वे एसीपी चिपलून रहे.अपने वे सौम्य किन्तु दृढ प्रतिज्ञ कानूनी व्यवहार के चलते स्थानीय नेताओं की आंख की किरकिरी बन गये और जल्दी ही चिपलून से उनकी रवानगी तय हो गई.

निजाम हैदराबाद और सीपी एंड बरार के पुलिसकर्मियों का नियमितीकरण बडी. उपलब्धि

बर्ष २००१ में सहायक पुलिस महानिरीक्षक ( योजना एवं समन्वय ) के पद पर कार्य करते हुए श्री पाटणकर की उपलब्धि ने महाराष्ट्र पोलिस सेवा से जुडे. ५१५९३ अधिकारियों कर्मचारियों की सेवा को पुलिसबल में स्थायीकरण का तोहफा दिया. दरअसल महाराष्ट्र पुलिसबल में राज्यभर में ८०,००० ऐसे अधिकारी और कर्मचारी थे जिनमें से बहुतेरे हैदराबाद निजाम के शासनकाल से अनियमित रूप से सेवा में थे. इसी प्रकार बडी. संख्या सी.पी.एंड बरार के अन्तर्गत कार्यरत पुलिस बल के कर्मचारियों की थी. इन अनियमित महाराष्ट्र राज्य के पुलिस अधिकारियों कर्मचारियों के नियमितिकरण का तीन से छह माह में पुर्ननियुक्ति का आदेश निकालना जरूरू होता था अन्यथा वित्त संबंधी अनुदान और उसके वेतन में उपयोग पर अंकेक्षण यानि आंडिट संबंधी दिक्कतें होती थीं. अनियमितता के कारण इन पुलिस अधिकारियों कर्मचारियों को हमेशा पुर्ननियुक्ति के आदेश और वेतन मिलने में बिलंब होता था. बर्ष २००१ में श्री लालकृष्ण आडवाणी के भारत गणराज्य के गृहमंत्री रहने के दौरान केंन्द्र सरकार से प्राप्त अनुदान और राज्य शासन के योगदान को मूर्तरूप से लागू करने के लिये राज्य पुलिस के आधुनिकीकरण योजना के चलते इक्यावन हजार पांच सौ तेरानवे पुलिस कर्मचारी नियमित हुए. श्री पाटणकर नें बताया कि राज्य पुलस के महानिदेशक श्री सुभाष मल्होत्रा और तत्कालीन आई जी श्री श्रीवास्तव की गंभीर रूचि के कारण एआईजी के रूप में पुलिस बल के स्थापना वायरलैस संचार और अधोसंरचनात्मक विकास को लेकर जो अनुशंसायें की गईं वे राज्य के पुलिसबल के विकास के लिये लागू की गईं वही उनके कार्यकाल का उपलब्धिपूर्ण समय रहा. राजधानी मुंबई में वे डीसीपी रहे जबकि चैंम्बूर में जोनल डीसीपी के रूप मे उनका काम उन्हें निजी संतोष का अनुभव कराता है. अपने सुदीर्ध पुलिस सेवाकाल में डीसीपी ट्रैफिक मुंबई ‍ अतिरिक्त पुलिस आयुक्त ठाणे तथा भिवंडी और पुणे रेल्वे में पुलिस अधीक्षक सहित पुलिस सेवा में गरिमामय रूप से बिताये बर्ष उन्हें बेदाग छवि का असरदार पुलिस अधिकारी की पहचान बनाने में सहायक सिद्ध हुआ.

पाटणकर ने उजागर कराया पुणे की श्रद्धा छाजेड. हत्याकांड का रहस्य ….. और गुंडातत्वों को सुरक्षा देने से किया इंकार.

पुणे की श्रद्धा छाजेड. हत्याकांड के पर्दाफाश में बहुत संवेदनशील अधिकारी के रूप में श्री पाटणकर की भूमिका को याद किया जाता है. कुछ बर्षों पूर्व श्री प्रताप सिंह पाटणकर ने जिला हिंगोली के अन्तर्गत मिली युवती की लाश को देखकर अंदाज लगाया कि यह एक मध्यमवर्गीय परिवार की युवती है किन्तु तमाम कोशिशों के बाबजूद उस युवती की पहचान का कोई सुराग नहीं मिला. उस दौरान गर्मी के समय में बहुत दिनों तक किसी लाश को ज्यादा दिनों तक सुरक्षित नहीं रखा जा सकता था और न ही सूचना संचार इतना तीव्र होता था कि किसी हादसे की सूचना व चित्र अन्य स्थानों पर भेजी जा सके. किन्त मामले मे संवेदनशील अधारी के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने अज्ञात यवती के शव को कई दिनों तक सुरक्षित रखकर आखिरकार पता लगा ही लिया कि अज्ञात युवती जिसका शव मिला है वह पुणे की श्रद्धा छाजेड. नामक एक कार्पोरेट में कार्य करने वाली युवती है. इस युवती का अपहरण उससे एकतरफा प्रेम करने वाले एक सिख यवक नें किया था. पुणे से अपहरण के बाद जिस- सड.क मार्ग से वह युवक श्रद्धा को कार से लेकर गया उस मार्ग पर कठिन तपास और परिश्रम से परिस्थतिकीय साक्ष्य जुटाकर उस युक को कानूनी रूप से सजा दिलाई. पुणे के चतुर्श्रँगी पोलिस स्टेशन में मे उस युवती के गुमशुदा होने की प्रथम सूचना पहले से ही दर्ज थी. आरोपी व्यक्ति ने अपनी सेंट्रे कार हिंगोली रेल्वे स्टेशन पर रखकर हैदराबाद की गाडी.पकड. ली. कार में मिले खून और विभिन्न साक्ष्यों को जुटाना बहुत चुनौतीपूर्ण अनुभव रहा. उनके मुंबई कार्यकाल में सत्ता में दखल रखने वाले एक गुंडातत्व किस्म के व्यक्ति को पुलिस सुरक्षा के लिये पुलिस बल उपलब्ध कराये जाने की सिफारिश निरस्त कर दी गई. इस सिफारिश पर मंत्री स्तर तक से उनपर दबाब बनाया गया. उनके द्वारा निरस्त किये गये आदेश को बाद में न्यायालय में भी चुनौती दी गई. लेकिन न्यायालय नें साक्ष्यों और पुलिस के आधारों को प्रशंसा करते हुए पीठ थपथपाई कि पुलिस की इसी प्रकार की संवेदनशीलता से उसके समाजोन्मुखी होने का प्रमाण मिलता है.

श्री प्रतापसिंह पाटणकर को इसी बर्ष अपने सुदीर्घ पुलिस सेवाओं के गुणवत्तापूर्वक निर्वहन के लिये राष्ट्रपति पदक से सम्मानित किया जाना है. बीते बर्षों में उन्हें बिशेष सेवा पदक आंतरिक सुरक्षा पदक तथा डीजीपी सम्मान चिन्ह से नवाजा जा चुका है. इसी माह के अंत में सेवानिवृति पाने के बाद वे अब समाज सेवा और पठन-पाठन की गतिविधियों में ही रहेंगे. उन्होंने कहा कि उपजीविका का समय समाप्त हुआ अब जीवन के परम उद्देश्य जीविका की ओर जीवन की गति होना है.वे इंडियन सायक्वालाँजी योग और शैक्षणिक गतिविधियों में ही अपना शेष जीवन समर्पित करना चाहते हैं.

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