एक्टर सौरभ शुक्ला बोले -एनएसडी से रिजेक्ट हुआ, जिद थी- कुछ बनना है, 2015 में उसी संस्थान ने चीफ गेस्ट इन्वाइट किया

रिपोर्टर | रायपु

रिपोर्टर | रायपुर

जिद और जुनून के दम पर हर मुश्किल से लड़ा जा सकता है। असफलताएं निराश करती हैं, लेकिन इससे लड़कर और जिद करके ही कामयाबी तक पहुंचा जाता है। ये साबित किया है बाॅलीवुड के कल्लू मामा यानी सौरभ शुक्ला ने। जॉली एलएलबी के जस्टिस सुंदरलाल त्रिपाठी हों या फिल्म पीके के तेजस्वी महाराज। हर कैरेक्टर में जान फंूकने वाले सौरभ की गिनती सफल कलाकारों में होती है। लेकिन इसके पीछे के संघर्ष से कम लोग ही वाकिफ होंगे। सौरभ रायपुर में 5 से 7 जनवरी तक शहर में पहली बार हो रहे ग्रेट इंडियन फिल्म एंड लिटरेचर फेस्टिवल (िजफलिफ) में शामिल होंगे। जिफलिफ में अपनी परफॉर्मेंस और रियल लाइफ एक्सपीरियंस के बारे में सौरभ ने चर्चा की। उन्होंने अपने शुरुअाती दिनों के बारे में बताते हुए कहा- मैं थिएटर करना चाहता था। पैरेंट्स का कहना था अगर इस फील्ड में जाना है तो इसकी डिग्री लो। एनएसडी में अप्लाई किया, लेकिन उसी साल यानी 1987-88 में रिजेक्ट हो गया। ऐसा कई बार हुआ, लेकिन रिजेक्शन से निराश होने के बजाय अपनी कमियों को ढूंढा और तैयारी की। खुद से जिद थी कि अपने लक्ष्य को पाने के लिए हर संभव प्रयास करूंगा। मेहनत रंग लाई और एनएसडी रैपट्री में सलेक्ट हो गया। साल 2015 में वर्ल्ड थिएटर डे के मौके पर एनएसडी ने मुझे बतौर चीफ गेस्ट इन्वाइट किया। वो दिन मेरे करियर का सबसे खास दिन था। जिफलिफ में सौरभ इंट्रैक्शन सेशन में शहर के यंग पोएट और लिटरेचर लसर्व से रूबरू होंगे।
संभावनाएं तलाशने वाला कभी कलाकार नहीं बन सकता 
थिएटर के प्रति यंगस्टर्स के इंट्रेस्ट और उनकी थिंकिंग पर सौरभ ने कहा- आज की जनरेशन थिएटर में पहले आर्थिक संभावनाओं को महत्व देती है। लेकिन मेरा मानना है कि जो कलाकार इस फील्ड में संभावनाओं को ढूंढता है तो वो कभी कलाकार नहीं बन सकता। वो अक्सर ये साेचते हैं कि उन्हें झटपट सक्सेस मिल जाएगी। घर, कार और शोहरत मिलेगी। इस आस में वो अपने काम को प्राथमिकता नहीं दे पाते। इसलिए थिएटर के नए कलाकार अपना लक्ष्य तय करें और लगन से काम करें।
पैरेंट्स ने कहा था- थिएटर में जाना है तो पहले डिग्री लो
मेरे माता-पिता म्यूजिशयन थे और दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ाते थे। घर में हमेशा कला और कलाकार को महत्व मिलता था। पढ़ाई में रुचि थी, लेकिन तय नहीं था क्या करूंगा। कॉमर्स से ग्रेजुएशन किया और पैरेंट्स से थिएटर की फील्ड में जाने की इच्छा जाहिर की। ये सुनकर माता-पिता थोड़ा परेशान हुए, क्योंकि उस समय इस फील्ड में करियर की गारंटी नहीं थी। उन्होंने कहा- अगर इस फील्ड में जाना है तो पहले कोई डिग्री या सर्टिफिकेट लो। इसके बाद मैंने एनएसडी के लिए अप्लाई किया। 

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