2 साल में एनडीए ने 7 राज्यों में सत्ता गंवाई,झारखंड भी भाजपा के हाथ से निकला

नई दिल्ली. झारखंड में भी भाजपा के हाथ से सत्ता निकल गई। यह सातवां राज्य है, जहां भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए ने पिछले दो साल में सत्ता गंवा दी है। दिसंबर 2017 में एनडीए बेहतर स्थिति में था। भाजपा और उसके सहयाेगी दल शीर्ष पर थे। मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ जैसे मध्य क्षेत्र के राज्यों में उसकी सरकार थी। बिहार में नीतीश कुमार राजद का महागठबंधन छोड़कर एनडीए में आ चुके थे और उत्तर प्रदेश में भाजपा ने रिकॉर्ड सीटों के साथ सरकार बनाई थी। 72% आबादी और 75% भूभाग वाले 19 राज्यों में एनडीए की सरकार थी। झारखंड में सत्ता गंवाने के बाद अब एनडीए के पास 16 राज्यों में ही सरकार बची है। इन राज्यों में 42% आबादी रहती है।

इस विधानसभा चुनाव में ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन पार्टी यानी आजसू के सत्तारूढ़ गठबंधन से बाहर निकलने का भाजपा को खामियाजा भुगतना पड़ा। वहीं, विपक्षी दलों झामुमो, कांग्रेस और राजद का महागठबंधन एकजुट रहा। उसने समय रहते सीटों का बंटवारा किया। भाजपा के आक्रामक प्रचार के विपरीत सुदूर इलाकों में रैलियां कीं और गठबंधन के नेताओं के साथ मंच साझा किया। इन्हीं वजहों से महागठबंधन के दलों को पिछली बार के मुकाबले 14 सीटों का फायदा हुआ और उसने भाजपा से सत्ता छीन ली।

 भाजपा का वोट शेयर लोकसभा चुनाव में 51% था, विधानसभा चुनाव में 33% रह गया
7 महीने पहले मई 2019 में जब लोकसभा चुनाव के नतीजे आए थे, तो भाजपा ने 51% वोट हासिल कर 54 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त बनाई थी। 35 विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा की लीड 50 हजार से अधिक थी। इनमें 16 विधानसभा क्षेत्रों में लीड मार्जिन 90 हजार से ज्यादा था। भाजपा ने राज्य की 14 में से 11 लोकसभा सीटें भी जीती थीं। आजसू भी उसके साथ जिसे 1 सीट मिली थी। इसी वजह से भाजपा को झारखंड में सत्ता में वापसी की उम्मीद थी। झारखंड का ट्रेंड भी बताता है कि लोकसभा चुनाव की तुलना में विधानसभा चुनाव में भाजपा का वोट शेयर लगभग 10% गिरता है। इस हिसाब से भाजपा का वोट शेयर 51% से घटकर 41% पर टिकता, तो भी वह सत्ता में वापसी कर लेती। लेकिन कुर्मी-कोयरी समेत पिछड़े और दलितों के बीच ठीक-ठाक आधार रखने वाली सहयोगी पार्टी आजसू उससे छिटक गई। उसे चुनाव में 8% वोट मिले। नतीजा यह हुआ कि भाजपा का वोट शेयर भी अनुमानित 41% से 8 फीसदी और कम होकर 33% पर रह गया।

2. रघुवर दास की जमीन खिसकी
राज्य में पिछड़ा बहुल 26 विधानसभा क्षेत्रों से भाजपा को सत्ता हासिल होती थी, वहां उसे सबसे ज्यादा घाटा हुआ। जमशेदपुर पूर्वी में अवैध 86 बस्तियों को नियमित बनाने का सवाल ऐसा तना कि मुख्यमंत्री रघुवर दास का आधार ही खिसक गया। वे इन बस्तियों को नियमित नहीं कर पाए। नतीजा यह हुआ कि वे जमशेदपुर पूर्वी सीट पर अपनी ही सरकार में कभी मंत्री रहे सरयू राय से पिछड़ गए। उधर, भाजपा के लक्ष्मण गिलुआ भी चक्रधरपुर में तीसरे स्थान पर खिसक गए।

3. भाजपा सरकार से आदिवासी नाराज हुए
जल-जंगल-जमीन के सवाल पर आदिवासी सरकार से नाराज थे। राज्य में उद्योगों के लिए लैंड बैंक बनाए जा रहे थे। आदिवासी इस जमीन को अपना मानते थे। छोटा नागपुर टेनेंसी एक्ट और संथाल परगना टेनेंसी एक्ट में सरकार ने संशोधन की कोशिश की थी। आदिवासी मान रहे थे कि उनकी जमीन उद्योगों को देने के लिए यह कोशिश हो रही है। भारी विरोध के चलते इन कानूनों में संशोधन तो नहीं हुआ, लेकिन अादिवासियों की नाराजगी बढ़ गई। अनुसूचित जनजाति के लिए सुरक्षित 28 सीटों में 20 झामुमो-कांग्रेस गठजोड़ के खाते में गईं। भाजपा को यहां 5 सीटों का सीधा नुकसान हुआ। सत्ता में रहते हुए पारा शिक्षकों, आंगनबाड़ी सेविका-सहायिका की नाराजगी केंद्रीय योजनाओं के बूते हुए विकास के काम पर कुछ ऐसी भारी पड़ती दिखी कि प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री की डबल इंजन की सरकार की गुहार काम नहीं आई।

4. महागठबंधन पहले से तैयार था, चुनाव घोषित होते ही भाजपा से दूर हुई आजसू
झामुमो-कांग्रेस-राजद गठजोड़ ने चुनाव घोषणा से पहले ही सीटों का बंटवारा कर जमीन पर कवायद शुरू कर दी थी। वहीं, भाजपा-आजसू गठजोड़ चुनाव घोषणा के बाद टूटा। आजसू पिछले 5 साल भाजपा के साथ सत्ता में थी। सीटों के बंटवारे के सवाल पर भाजपा ने पुराने सहयोगी आजसू पार्टी को खोया। भाजपा ने मंत्री सरयू राय का टिकट काट दिया। दूसरे दलों से आए नेताओं को भी टिकट दिए गए। ये दोनों ऐसी चूक थीं, जो चुनावी हवा का रुख भाजपा के खिलाफ करने में मददगार साबित हुईं।

5. महागठबंधन ने गुरिल्ला प्रचार शैली अपनाई, बड़ी रैलियां नहीं कीं
भाजपा के बड़े नेताओं की कारपेट बॉम्बिंग शैली में किए गए प्रचार के उलट गठबंधन के नेताओं ने प्रचार की गुरिल्ला शैली अपनाई। बड़ी सभाएं नहीं कीं। सुदूर इलाकों में कई-कई बार हेलिकॉप्टर से उतरे। अलग-अलग प्रचार किए। मौका देख मंच साझा किया। उनकी रणनीति कामयाब रही।

  •      अभी भाजपा विरोधी दलों की 12 राज्यों में सरकारें, इनमें से कांग्रेस के पास 6 राज्य; झारखंड में सरकार बनने पर 7वां राज्य जुड़ेगा

  • पिछले 2 साल में भाजपा ने 4 राज्यों में सत्ता हासिल की, इनमें कर्नाटक को छोड़कर मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम छोटे राज्य हैं

  • तमिलनाडु में भाजपा ने अन्नाद्रमुक के साथ सिर्फ लोकसभा चुनाव लड़ा, राज्य में उसका विधायक नहीं, इसलिए वह सत्ता में भागीदार नहीं

  • दिसंबर 2017 में एनडीए के पास 19 राज्य थे। एक साल बाद भाजपा ने मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में सत्ता गंवा दी। यहां अब कांग्रेस की सरकारें हैं।
  • चौथा राज्य आंध्र प्रदेश है, जहां भाजपा-तेदेपा गठबंधन की सरकार थी। मार्च 2018 में तेदेपा ने भाजपा से गठबंधन तोड़ लिया। 2019 में हुए विधानसभा चुनाव में यहां वाईएसआर कांग्रेस ने सरकार बनाई।
  • पांचवां राज्य महाराष्ट्र है, जहां चुनाव के बाद शिवसेना ने एनडीए का साथ छोड़ा और हाल ही में कांग्रेस-राकांपा के साथ सरकार बना ली।
  • छठा राज्य जम्मू-कश्मीर है, जहां जून 2018 में भाजपा ने पीडीपी से नाता तोड़ा था। यहां पहले राज्यपाल और फिर राष्ट्रपति शासन लगाया गया। अब यह दो केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में विभाजित हो चुका है। इनमें से जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव होना बाकी है। लद्दाख को बिना विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया है।
  • सातवां राज्य अब झारखंड है। यहां कांग्रेस-झामुमो-राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन को जीत दिख रही है।
  • भाजपा ने ये सात राज्य गंवाए, लेकिन कर्नाटक, मिजोरम, त्रिपुरा और मेघालय में सरकार बनाई। इनमें कर्नाटक बड़ा है। बाकी राज्य छोटे हैं। इसलिए अब 72% की जगह देश की 42% आबादी वाले राज्यों में ही एनडीए का शासन बचा है।
  • कांग्रेस खुद के बूते या गठबंधन के जरिए महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, पंजाब, पुड्‌डुचेरी में सत्ता में है। झारखंड में सरकार बनने पर उसकी 7 राज्यों में सरकार होगी।
  • दिल्ली में आम आदमी पार्टी, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, केरल में माकपा के नेतृत्व वाला गठबंधन, आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस, ओडिशा में बीजद और तेलंगाना में टीआरएस सत्ता में है।
  • एक और राज्य तमिलनाडु है, जहां भाजपा ने अन्नाद्रमुक के साथ लोकसभा चुनाव तो लड़ा था, लेकिन राज्य में उसका एक भी विधायक नहीं है। इसलिए वह सत्ता में भागीदार नहीं है।

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