बौने पौधों में जिंदगी तलाशती डॉ. ममता मिश्रा

कहते हैं बरगद के दरख्तों तले दूसरे पौधे पनप नहीं पाते हैं लेकिन इस मिथक को ध्वस्त करती हैं डॉ. ममता मिश्रा, जो मप्र के प्रमुख सचिव की धर्मपत्नी होने के बावजूद मिथ्या आडंबर से दूर  सहज, सरल , सौम्य व सादगी की प्रतिमूर्ति हैं। राज काज के तामझाम से दूर बोनसाई को सजाने संवारने की नैसर्गिक दुनिया में खोई रहती हैं। मानों नन्हें पौधों में जिंदगी तलाश रही हों… यहां प्रस्तुत है डॉ. ममता मिश्रा से विशेष भेंट-

आप मूलत: कहां से हैं और आपकी प्रारंभिक व उच्च शिक्षा कहां से हुई?

मेरे पिता श्री बीएल नायक जी शासकीय सेवा में कार्यरत थे, उनके विभिन्न स्थानों पर स्थानांतरण के कारण सागर, कटनी, जबलपुर, दमोह आदि स्थानों पर बचपन बीता. मेरी प्रारंभिक शिक्षा जबलपुर में हुई तथा माध्यमिक शिक्षा मैंने सागर से प्राप्त की है। उच्च शिक्षा सागर में हरि सिंह विश्वविद्यालय से प्राप्त की है। मैंने अपना पहला एमए हिन्दी साहित्य में सन् 1984 में किया और उसके बाद मैंने एमए सोशल वर्क सन् 2007 में किया। इसके पीछे भी एक रोचक किस्सा है जो मैं आप सभी के साथ  बांटना चाहूंगी। मेरी छोटी बेटी कोटा में आईआईटी की तैयारी कर रही थी, वहां  पर मैं अपनी बेटी के साथ रहती थी  उसकी एकाग्रता भंग न हो अत: मुझे भी पिनड्राप साइलेंस रहना पड़ता था। तभी मुझे विचार आया कि क्यों न मैं भी अपने इस  समय का  सदुपयोग अपनी शिक्षा को बढ़ाने में करूं और मैंने एमए सोशल वर्क करने का निर्णय लिया, क्योंकि समाज सेवा में मेरी रुचि आरंभ से ही रही थी और जब मैंने एमए की परीक्षा अच्छे अंकों से उत्तीर्ण कर ली तो मेरा हौसला बढ़ा जिसने मुझे सोशल वर्क में पीएचडी करने की प्रेरणा दी और मैंने इसके बाद सोशल वर्क में पीएचडी भी संपन्न की। कहीं न कहीं मैं इसके लिए अपनी बेटी को धन्यवाद देना चाहूंगी कि उसके कारण मैं यह सब कर सकी।

ममता जी आपने अपना पहला एमए सन 1984 में किया और दूसरा सन् 2007 में किया। क्या आपको शिक्षा प्रणाली में कोई अंतर महसूस हुआ?

जी हां निश्चित रूप से बहुत परिवर्तन आए हैं,   पहले जो पढ़ाई हम करते थे वो बिल्कुल पारंपरिक होती थी उसमें सिर्फ जो क्लास नोट्स होते थे या  यूं कहें कि सिर्फ किताबी ज्ञान बच्चों को रटना पड़ता था। जबकि  आज की शिक्षा प्रणाली बच्चों की संपूर्ण विकास को ध्यान में रखते हुए कार्य कर रही है। आज किताबी ज्ञान के साथ-साथ बच्चों को व्यावहारिक ज्ञान भी दिया जाता है। उनके व्यक्तित्व के संपूर्ण विकास के लिए स्कूल कॉलेजों में अतिरिक्त पाठ्यक्रम गतिविधियां चलाई जाती हैं। उन्हें पढ़ाई के साथ-साथ थियेटर, संगीत, नृत्य, मार्शल आर्ट और खेलकूद आदि को चुनने की स्वतंत्रता प्राथमिक स्तर से ही प्राप्त होती है। हम लोगों के समय में ऐसा बहुत कम होता था। यहां तक कि विषयगत पढ़ाई में भी प्रेक्टिकल/प्रोजेक्ट्स को समाहित कर कर उसे और रोचक कर दिया गया है।

आप शिक्षा, साहित्य और समाज सेवा के क्षेत्र में सक्रिय थीं, लेकिन आज हम सभी आपको एक विश्व प्रसिद्ध बोनसाई आर्टिस्ट के रूप में जानते हैं। क्या आपकी शुरू से ही इस ओर रुचि थी या कोई घटना है जिसने आपको बोनसाई कला की ओर आकृष्ट किया?

मुझे बचपन से ही बागवानी का बहुत शौक था। मेरे घर में जो बगीचा होता था मैं हमेशा उसकी देखभाल के लिए उत्साहित रहती थी। गमलों में लगे पौधों की निराई-गुणाई, उनमें पानी देना, उनकी देखभाल करना शुरू से ही मेरे अभ्यास में था। बोनसाई की शुरुआत सन् 1995 में इंदौर से हुई, वहां पर पीसी सरकार के घर मेरा जाना हुआ। वहां मैंने उनका बोनसाई का संकलन देखा तो मेरे मन में भी उसके प्रति आकर्षण हुआ और मुझे लगा कि मुझे भी यह कला सीखनी चाहिए तो मैंने श्री पीसी सरकार जी से ही प्रशिक्षण प्राप्त किया और उसके बाद से निरंतर इस कार्य को कर रही हूँ। मुझे लगता है इससे अच्छा शौक कोई और हो ही नहीं सकता।

शिक्षक की भूमिका को आप किस प्रकार से देखती हैं?

एमए सोशल वर्क करने के बाद मैंने नूतन कालेज भोपाल में चार साल तक शिक्षण कार्य भी किया है।  प्रथम चार एमए सोशल वर्क के बैच मेरे ही पढ़ाए गए जिनको 100 प्रतिशत प्लेसमेंट भी मिला यह एक शिक्षक के तौर पर मेरी एक बड़ी उपलब्धि है। मेरा मानना है कि मां के पश्चात शिक्षक  बच्चे का सर्वाधिक हित चाहते हैं। उन्हें अपने बच्चों को आगे बढ़ता देख बहुत खुशी होती है। यदि वे अपना 100 प्रतिशत बच्चों को देंगे तो निश्चित ही उन्हें समाज में कोई भी हरा नहीं सकता।

बोनसाई  एक्सपर्ट बनने के लिए किस प्रकार की बेसिक व एडवांस  ट्रेनिंग की आवश्यकता है और यह कहां से प्राप्त की जा सकती है?

कोई भी व्यक्ति जिसे प्रकृति का  सानिध्य पसंद है वह इसकी बेसिक व एडवांस ट्रेनिंग ले सकता है। बेसिक प्रशिक्षण हम किसी भी बोनसाई एक्सपर्ट से प्राप्त कर सकते हैं  मैं बताना चाहूंगी कि प्यूटो रिको से पेट्रो मोरेलिस भारत में ‘बोनसाई स्कूल इन इंडियाÓ चला रहे हैं। साल में दो बार उनके एडवांस सेशन बॉम्बे में होते हैं। भारत भरे से जो भी बोनसाई एक्सपर्ट है वह वहां जाकर उसका लाभ लेते हैं।

बोनसाई कला महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाने में किस प्रकार से सहायक हो सकती है?

निश्चित रूप से यह कला जहां एक ओर हमारे बागवानी के शौक को पूरा करती है वहीं दूसरी ओर ये हमारे लिए आर्थिक स्वावलंबन का साधन भी बन सकती है। इसका सबसे बेहतर उदाहरण मैं स्वयं हूँ शुरू शुरू में तो मैं इस क्षेत्र अपने बागवानी के शौक के कारण आई लेकिन आज की तारीख में मैंने इसे व्यावसायिक तौर पर शुरू किया है। मेरी एक छोटी सी कंपनी है उपवनम जिसके तहत मेरे द्वारा तैयार ऑरनामेंटल प्लांट्स, बोनसाई, गार्डन डिजाइनिंग व  लेड स्केप करती हूँ।  मैं अपनी एक्जीबिशन भी लगाती हूँ, जहां पर लोग मेेरे द्वारा तैयार बोनसाई की सराहना करते हैं व उन्हें क्रय भी करते हैं। जो कहीं न कहीं मुझे आर्थिक रूप से समृद्ध बनाता है। मुझे लगता है और भी महिलाएं इसे अपने व्यावसायिक कार्यक्षेत्र के रूप में चुन सकती हैं । इस व्यवसाय को आरंभ करने के लिए बहुत अधिक धन की आवश्यकता नहीं है। आप टेराकोटा पार्ट के साथ, अपने घर में उपलब्ध सिरेमिक बर्तनों से भी इसकी शुरुआत कर सकते हैं। इसमें बस एक ही चीज की सर्वाधिक जरूरत है वो है लगन और धैर्य।

ममता जी आप अपने परिवार के विषय में कुछ बताइए?                                                                                         

मेरे पति श्री एसके मिश्रा हैं जो कि भारतीय प्रशासनिक सेवा में हैं और वर्तमान में वे मप्र के मुख्यमंत्री के मुख्य सचिव के पद पर कार्यरत हैं। इसके अतिरिक्त वे पीएस एग्रो हैं। यद्यपि वे बहुत व्यस्त रहते हैं लेकिन इसके बावजूद उनका सहयोग मुझे हमेशा प्राप्त होता है सच कहूं तो उनके सहयोग व प्रोत्साहन के बिना मैं ये सब कर ही नहीं सकती। हमारी दो बेटियां हैं प्रज्ञा व श्रेया जो कि इंजीनियर हैं और उनका विवाह हो चुका है। मेरी बेटियों ने भी हमेशा मुझे आगे बढऩे के लिए प्रेरित किया है।

भारत वर्ष में बोनसाई कला को लेकर कितनी जागरुकता है साथ ही महिलाओं की भागीदारी इसमें कितने प्रतिशत है?

भारत वर्ष में बोनसाई कला को लेकर पिछले 10 वर्षो में मुझे लगता है एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। लोग बाग इस कला के प्रति आकृष्ट हो रहे हैं। इससे जुड़ रहे हैं कहीं न कहीं शहरी संस्कृति में इसके प्रति ज्यादा लगाव है। फ्लैट कल्चर बढऩे के से भी लोगों ने बोनसाई कला को अपनाया है। जहां तक महिलाओं की भागीदारी का प्रश्न है, मुझे लगता है कि इस क्षेत्र में महिलाओं की सक्रियता 60 से 70 प्रतिशत है।

बोनसाई को आमतौर पर उच्च धनाढ्य वर्ग का शौक माना जाता है। आप इससे कितनी सहमत हैं?

जी नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है कि इसे हम सिर्फ उच्च धनाढ्य वर्ग तक सीमित कर दें। खासतौर पर आज के समय में तो बिल्कुल भी नहीं। इसमें कई वर्ग होते हैं जैसे लो मेंटनेंस, लो कास्ट, एक्सक्लूसिव, एक्सट्रा एक्सक्लूसिव आदि। ऐसा होने से इसकी पहुंच हर वर्ग के घर तक संभव हो गई है। चाहे वो    किसी बड़े बिजनेस मैन का गार्डन हो या फिर आम भारतीय का ड्राइंग रूम हो।

 आपके विचार में लोगों को बोनसाई आर्ट को क्यों अपनाना चाहिए?

हम लोग पूरी कोशिश कर रहे हैं लोगों को इस कला से जोडऩे की। हमारे क्लब के द्वारा समय-समय पर जो सेमिनार किए जाते हैं उसमें बताया जाता है कि आज कल का दौर सीमेंट और कांक्रीट का दौर है। जहां हर तरफ हम फ्लैट संस्कृति देख रहे हैं। ऐसे में बड़ा मुश्किल है कि आम, पीपल, बरगद, इमली, गूलर आदि को हम अपने घर में लगा सकें। छोटे-छोटे बोनसाई आपको इन बड़े पेड़ों का सुख देते हैं साथ ही आपको प्रकृति के करीब रखते हैं। यह आपके घर को डेकोरेट भी करते हैं। कहीं न कहीं स्वास्थ्य लाभ भी देते हैं। आप अपने फ्लैट की बालकनी में, टेरेस पर या गैलरी में कहीं भी इनको रख सकते हैं। यह कहना गलत न होगा कि बोनसाई के शौक के द्वारा हम एक पंथ और कई काज वाली कहावत को साकार करते हैं।

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