पद्म पुरस्कार पाने वाले ये गुमनाम चेहरे

नई दिल्ली. रिपब्लिक-डे से एक दिन पहले सरकार ने पद्म पुरस्कारों का एलान किया। 89 पद्म पुरस्कारों में से 7 लोगों को पद्म विभूषण, 7 को पद्म भूषण और 75 को पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। इनमें 15 आम लोग भी शामिल हैं, जो निजी तौर पर समाज को बेहतर बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं। पद्मश्री पाने वालों में कई लोग ऐसे हैं, जो गुमनामी में अपना काम करते हैं और सुर्खियों से दूर रहते हैं। इन्हीं में शामिल हैं इंदौर की रहने वाली 92 साल की डॉक्टर दादी और 76 साल की सबसे उम्रदराज महिला तलवारबाज। कुछ ऐसे भी नाम हैं, जिन्हें लोग एम्बुलेंस दादा और वृक्ष पुरुष के नाम से जानते हैं। पहली बार फिल्म इंडस्ट्री से किसी हीरो-हीरोइन को जगह नहीं मिली है।
जानिए क्या है इनकी कहानी…
 डॉक्टर दादी
– 92 साल की भक्ति यादव को लोग डॉक्टर दादी के नाम से जानते हैं। वो इंदौर की पहली महिला हैं, जिन्हें एमबीबीएस की डिग्री मिली।डॉक्टर दादी पिछले 68 साल से (1948 से) अपने पेशेंट्स का फ्री में इलाज कर रही हैं।गाइनकोलॉजिस्ट डॉक्टर दादी ने हजारों बच्चों की सेफ डिलिवरी भी करवाई। भक्ति अबतक हज़ारों महिलाओं की नॉर्मल डिलि‍वरी करा चुकी हैं और कभी किसी से फीस नहीं ली. साल 1952 में भक्ति यादव इंदौर की पहली महिला MBBS डॉक्टर बनी और तब से अब तक महिलाओं का मुफ्त इलाज कर रहीं हैं. परदेसीपुरा के पास क्लर्क कॉलोनी में रहने वाली डॉक्टर भक्ति यादव अब 91 साल की हो गई हैं. लेकिन डॉक्टर यादव अभी भी दिन में कुछ एक मरीजों को देख लेती हैं. इस उम्र में डॉक्टर दादी को चलने-फिरने में दिक्कत होती है, लेकिन वो अपने जीवन की अंतिम सांस तक पेशेंट्स का इलाज करना चाहती हैं।सिर्फ इंदौर ही नहीं बल्कि उज्जैन, देवास, रतलाम जिलों से भी महिलाएं सामान्य प्रसव के लिए डॉक्टर भक्ति यादव के पास आती हैं.डॉक्टर भक्ति यादव को पद्मश्री मिलना ये दिखाता है कि यदि मन में कुछ कर गुजरने की इच्छा हो तो उम्र और सेहत कभी आड़े नहीं आती और भक्ति यादव वाकई में लोगों के लिए एक मिसाल हैं.
 ब्लाइंड क्रिकेट टीम के कैप्टन
– शेखर इंडियन ब्लाइंड क्रिकेट टीम के कैप्टन हैं। कर्नाटक के शिमोगा में जन्मे शेखर जन्म से ही दृष्टिहीन थे।  8 साल की उम्र में एक ऑपरेशन के बाद शेखर को धुंधला-सा दिखना शुरू हुआ। इसके बाद उन्होंने क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया। उनकी मां ने उन्हें पूरा सपोर्ट किया। 12 साल की उम्र तक शेखर ने अपने मां-बाप को खो दिया था। कर्नाटक के लोकल टूर्नामेंट्स में 46 बॉल में 136 और 249 रनों की पारी खेलने वाले शेखर 2001 में अंडर-18 ब्लाइंड क्रिकेट टीम मेें चुने गए। अंडर-18 टूर्नामेंट में मैन ऑफ द सीरीज चुने गए। इंडिया की ब्लाइंड क्रिकेट टीम ने 2012 का टी20 वर्ल्ड कप और 2014 का वर्ल्ड कप जीता।
 76 साल की तलवारबाज महिला
किसी के लिए भी यह उम्‍मीद करना काफी मुश्किल होगा कि 76 साल की उम्र में कोई महिला मार्शल आर्ट के अपने हुनर से विरोधियों को मिनटों में ही चित्‍त कर देती है। जी हां, यह कोई सपना बल्कि हकीकत है। यहां हम बात कर रहे हैं केरल की मीनाक्षी अम्मा की जो उम्र को मात देकर आज भी अच्छे-अच्छों को चित्‍त करने का जज्बा रखती हैं। वह 76 साल की उम्र में भी पूरी तरह से फिट हैं। इन्हें मार्शल आर्ट्स और सेल्फ डिफेंस की ट्रेनिंग देते देखकर हर कोई दंग रह जाता है। मीनाक्षी अम्मा केरल के वताकारा कस्बे की रहने वाली एक 76 वर्षीय कलरीपायट्टू टीचर हैं। केरल की रहने वाली मीनाक्षी अम्मा 76 साल की हैं। उन्हें भारत की सबसे उम्रदराज महिला तलवारबाज कहा जाता है। मीनाक्षी भारतीय मार्शल आर्ट कलारीपयट्टू में एक्सपर्ट हैं। 7 साल की उम्र से उन्होंने मार्शल आर्ट्स की क्लास लेना शुरू कर दिया था।
– वे 68 साल से ज्यादा समय से मार्शल आर्ट्स की ट्रेनिंग दे रही हैं।
 
 एम्बुलेंस दादा करीमुल
– प. बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले में रहने वाले करीमुल हक को सोशल वर्क के लिए पद्मश्री दिया जाएगा। करीमुल हक को एम्बुलेंस दादा के नाम से भी जाना जाता है। करीमुल हक ने अपने गांव धालाबाड़ी में 24 घंटे की एम्बुलेंस सेवा शुरू की।
– करीमुल हक गरीब मरीजों को अपनी बाइक पर लेकर हॉस्पिटल पहुंचाते हैं और कई बार वो उन्हें फर्स्ट ऐड भी देते हैं।पश्चिम बंगाल के 52 साल के करीमुल हक सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर काम करते हैं। दरअसल, कुछ साल पहले करीमुल के पास कोई वाहन नहीं था जिस वजह से वह अपनी बीमार मां को समय पर अस्पताल नहीं पहुंचा पाए थे और उनकी मां की मौत हो गई थी। ऐसे में करीमुल ने तय किया कि वह अपना जीवन लोगों की जिंदगी बचाने में लगाएंगे जिसके बाद उन्होंने बाइक ऐंबुलेंस की शुरुआत की। चाय के बागान में काम करने वाले एक कर्मचारी करीमुल ने अपनी बाइक को ऐंबुलेंस में बदल दिया जो चौबीसों घंटे मुफ्त में ऐंबुलेंस सर्विस देते हैं। करीमुल हक, गांव के गरीब लोगों को अपनी बाइक ऐंबुलेंस की मदद से जिले के अस्पताल तक पहुंचाते हैं। कई बार वह बीमार लोगों को फर्स्ट एड भी देते हैं। अपने इस मिशन में अब तक करीमुल उर्फ ऐंबुलेंस दादा ने करीब 3 हजार लोगों की जान बचायी है। धालाबाड़ी और उसके आसपास के करीब 20 गांव के लोगों की एकमात्र लाइफ लाइन करीमुल की बाइक ऐंबुलेंस ही है।
 वृक्ष पुरुष रमैया
– 68 साल के दरिपल्ली रमैया तेलंगाना के रहने वाले हैं।
– रमैया ने 1 करोड़ पेड़ लगाए हैं। उन्हें वृक्ष पुरुष के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने भारत को हरा-भरा बनाने की ठानी है।दारिपल्ली रमैया (ट्री मैन)तेलंगाना के एक आम आदमी, जिसने अपना पूरा जीव देश को हरा बनाने में लगा दिया, एक करोड़ से ज्यादा पेड़ लगाए।- 68 साल के चेतला रमैया नाम से जाने जाते हैं (चेतू का अर्थ- वृक्ष) देश में हरियाली वापस लाने के निशन पर, जहां भी खाली जमीन देखते हैं, जेब से बीज निकालते हैं और पौधा लगा देते हैं।पेड़ लगाने के इनके इस काम में इनकी पत्नी जनम्मा का खास योगदान- रमैया घर से निकलते वक्त बीज साथ लेकर चलते हैं और जहां भी उन्हें खाली जमीन दिखाई देती है, वो वहां प्लान्टेशन करते हैं।
स्वच्छता दूत
– पद्म पुरस्कार पाने वालों में पुणे के डॉक्टर मापुस्कर का नाम भी है। इन्हें स्वच्छता दूत के नाम से जाना जाता है।महाराष्ट्र के 88 साल के डॉ मापुस्कर को मरणोपरांत यह सम्मान मिल रहा है। उन्होंने अपना पूरा जीवन स्वच्छता अभियान में लगा दिया। उनकी पहली नौकरी देबू गांव में थी जहां कोई टॉइलट नहीं था। दवाइयों की कार्टन का इस्तेमाल कर उन्होंने अपने लिए एक टॉइलट बनाया और उसके बाद उन्होंने एक क्रांति की शुरुआत की।
– इन्हें स्वच्छ भारत अभियान का पथ प्रदर्शक कहा जा सकता है जिन्होंने 50 साल पहले देबू गांव को खुले में शौच मुक्त बना दिया था1960 में डॉक्टर मापुस्कर ने पुणे के देबू गांव के लोगों को समझाया कि घर में शौचालय का निर्माण करना कितना जरूरी है। इसके बाद पूरे गांव ने खुले में शौच करना बंद कर दिया और 2004 में गांव के हर घर में शौचालय था।
– पिछले 50 सालों में स्वच्छता के लिए कम खर्च में कई विकल्पों के बारे में लोगों को जागरूक किया।
– डीसेंट्रलाइज्ड ऑन साइट इंटिग्रेटेड वेस्ट मैनेजमेंट यानी DOSIWAM को विकसित किया और देशभर में 25 जगहों पर इसे लागू भी करवाया। इन्होंने पुणे के देहू गांव में 1960 से ही सफाई अभियान पर जोर दिया। पूरे गांव को खुले में शौच करने से रोका और सफाई के लिए जागरूक किया। 2004 में पूरे गांव में शौचालय बना दिए गए।
 हाई-वे मसीहा
– गुजरात के रहने वाले डॉ. सुब्रतो दास का नाम भी पद्मश्री पाने वालों में है। डॉ. सुब्रतो को मेडिसिन कैटेगिरी में पुरस्कार दिया गया है।
डॉ. सुब्रतो को हाई-वे मसीहा के नाम से जाना जाता है। वे हाई-वे पर एक्सीडेंट में घायल होने वालों को तुरंत मेडिकल फैसिलिटी मुहैया कराते हैं।गुजरात के रहने वाले सुब्रतो दास एक बार खुद हादसे के शिकार हुए तो अहसास हुआ कि हाइवे पर ऐक्सिडेंट होने पर घायलों को मिलने वाली इमर्जेंसी सर्विस ठीक नहीं है।इसके बाद उन्होंने गुजरात में लाइफलाइन फाउंडेशन की शुरुआत की, जिसका विस्तार अब महाराष्ट्र, केरल, राजस्थान और पश्चिम बंगाल में 4000 किलोमीटर तक है। लाइफलाइन फाउंडेशन की टीम्स हादसा होने पर 40 मिनट से कम वक्त में पहुंच जाती हैं। अब तक 1200 से ज्यादा घायलों को बचाया जा चुका है। उन्हें पद्मश्री से नवाजा जाएगा।
 फायर फाइटर
-एक आम आदमी जो पूरे कोलकाता में कहीं भी आग लगने पर लोगों को बचाने पहुंचने के लिए फेमस हैं, की बार खुद को खतरे में डाल चुके हैं।-वॉलंटिअर फायर फाइटर। पिछले 40 वर्षों से दमकल अधिकारियों के अलावा अकेले ऐसे शख्स जो आगजनित हादसे की तकरीबन हर साइट पर पहुंचे।  प. बंगाल के रहने वाले बिपिन गनात्रा को सोशल वर्क कैटेगिरी में सम्मानित किया जाएगा। 59 साल के बिपिन वालन्टियर फायर फाइटर हैं, जो पिछले 40 साल से कोलकाता में आग लगने वाली हर जगह पर मौजूद रहते हैं और लोगों को बचाने में मदद करते हैं।- एक हादसे में अपने भाई को खोने के बाद बिपिन ने ऐसे लोगों की मदद का बीड़ा उठाया, जो आग लगने जैसे हादसों में फंस जाते हैं।- कोलकाता अग्नि विभाग ने इन्हें वॉलंटिअर फायर-फाइटर का नाम दिया।
-स्कूल की पढ़ाई बीच में छोड़कर कई छोटी-मोटी नौकरियां कीं। फिलहाल जूट कारोबारी के लिए काम करते हैं, साथ में मीटर फिक्सिंग और इलेक्ट्रिशन का काम।
चिंताकिंदी मल्लेशम
– तेलंगाना के चिंताकिंदी मल्लेशम ने लक्ष्मी ASU मशीन बनाई, जिससे पोचमपल्ली सिल्क की साड़ियां बनाने वाले कारीगरों की मेहनत और काम में लगने वाला वक्त काफी घट गया। 44 साल के मल्लेशम की मां पोचमपल्ली सिल्क की साड़ियां बनाती थीं। मेहनत के चलते उन्हें बहुत दर्द होता था, जिसको देखने के बाद मल्लेशम ने ये मशीन बनाई।44 साल के चिंताकिंदी तेलंगाना राज्य के रहने वाले हैं। कभी छठीं क्लास में फेल होने वाले इस शख्स ने एक ऐसी इलेक्ट्रॉनिक मशीन बनाई, जिससे बुनकरों की समस्याएं बहुत कम हो गईं। इसे लक्ष्मी एएसयू मशीन के नाम से जाना जाता है।इस मशीन की मदद से पोचमपल्ली रेशम की साड़ियों को बुनने में लगने वाला वक्त 4 घंटे से गटकर डेढ़ घंटे हो जाता है। चिंताकिंदी ने अपनी मां का काम आसान करने के लिए यह मशीन बनाई है।
लक्ष्मी एएसयू मशीन आंध्र प्रदेश और ओडिशा राज्यों में काफी पसंद की जा रही है। चिंताकिंदी को सायेंस और इंजिनियरिंग के लिए पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा।- पोचमपल्ली सिल्क से साड़ियां बनाने वाले 60% कारीगर इस मशीन से फायदा उठा रहे हैं।
 मरियप्पन थंगवेलु
-तमिलनाडु के 21 साल के मरियप्पन ने रियो पैरालंपिक्स 2016 में गोल्ड जीता। उन्होंने यह मेडल टी42 हाईजंप श्रेणी में जीता। यह पैरालंपिक्स के इतिहास में किसी भारतीय द्वारा जीता गया तीसरा गोल्ड है। सरकार से मिली इनामी रकम को उन्होंने उन स्कूलों को डोनेट कर दिया, जहां खेल से जुड़ी सुविधाओं का अभाव था। मरियप्पन ने अपनी दाईं टांग स्कूल जाते वक्त गंवा दी थी। नशे में एक बस ड्राइवर ने उनके पैर पर गाड़ी चढ़ा दी थी। मरियप्पन ने संघर्ष की मिसाल कायम की है। पिता ने परिवार को त्याग दिया। ईंटें ढोने वाली मां ने उन्हें अकेले ही संभाला।
दीपा कर्मकार मणिपुर
23 साल की दीपा कर्मकार मणिपुर की रहने वाली हैं। वह भारत की ऐसी पहली जिमनास्ट हैं, जिन्होंने ओलिंपिक्स में देश को गौरव के पल दिए। ओलिंपिक्स 2016 में आर्टिस्टिक जिमनैस्टिक्स में दीपा चौथे नंबर पर रहीं। यह किसी भारतीय जिमनास्ट का ओलिंपिक्स के इतिहास में सबसे बेहतर प्रदर्शन है। जिमनैस्टिक्स के इतिहास में प्रोदुनोवा वॉल्ट को अंजाम देने वालीं वह पांचवीं जिमनास्ट हैं। संसाधनों के अभाव के बावजूद सभी मुश्किलों से लड़ते हुए दीपा का इस मुकाम पर पहुंचना एक बहुत बड़ी उपलब्धि है।
गिरीश पेशे से इंजिनियर
66 वर्षीय गिरीश पेशे से इंजिनियर हैं। वह कर्नाटक के रहने वाले हैं। गिरीश ने इंजिनियरिंग में स्नातक किया, लेकिन उन्हें नौकरी नहीं मिली। इसके बाद तो जैसे उन्होंने पुल बनाने को अपने जीवन का मकसद बना लिया। भारत के दूर-दराज के गांवों और पिछड़े इलाकों में उन्होंने कम बजट वाले करीब 100 पुल बनाए। इन सस्पेंशन पुलों की खासियत यह है कि ये इको-फ्रेंडली हैं। पूरे कर्नाटक, केरल और आंध्र प्रदेश में गिरीश ने 100 से भी ज्यादा पुलों का निर्माण किया है। गांवों के लिए विकास के रास्ते खोलने के लिए उन्होंने गांवों का बाहरी संपर्क बेहतर करने में काफी योगदान दिया है। उनके द्वारा बनाए गए पुलों की खासियत यह भी है कि ये बेहद कम खर्च पर बन जाते हैं। सामान्य तौर पर बनने वाले स्टील के पुलों की लागत के दसवें हिस्से में गिरीश एक पुल तैयार कर देते हैं। इतना ही नहीं, गिरीश द्वारा तैयार किए जाने वाले पुल केवल 3 महीने में तैयार हो जाते हैं, जबकि आमतौर पर बनने वाले पुलों को खड़ा होने में कम से कम 3 साल का समय लगता है। कम लागत और कम समय में तैयार होने वाले ये पुल इको फ्रेंडली को हैं ही, साथ ही पूरी तरह सुरक्षित भी हैं।
गेनाभाई दिव्यांग किसान
गेनाभाई दिव्यांग किसान हैं, जिन्होंने अपने प्रयास से सूखाग्रस्त जिले को देश के सबसे बड़े अनार उत्पादक जिले में तब्दील किया है।
– बांसकांठा जिले के सरकारी गोलिया गांव के किसान हैं।
– 2005 में प्रयोग के रूप में उन्होंने अनार की खेती की शुरुआत की।
– उच्च गुणवत्ता वाले रोगमुक्त और जिवाणु मुक्त अनार के उत्पादन के लिए उन्होंने खेती की भिन्न तकनीकों को अपनाया। इसमें 100% ड्रिप से सिंचाई (जिससे पानी बिजली की बचत), जैविक उर्वरकों (जैसे- गोमूत्र, सड़ी घास), अपशिष्ट, मिनि ट्रैक्टर, आधुनिक स्प्रे और ट्रांसपोर्ट आदि को अपनाया।
– अनार की खेती में लाभ देख आसपास के लोगों को भी इन्हीं तकनीकों को अपनाने के लिए जागरूक किया और उन्हें वित्तीय रिस्क को कम करने के उपाय भी सुझाए।
अनुराधा कोईराला ने बहुत काम किया
मानव तस्करी के चंगुल में फंसी लड़कियों और बच्चों के लिए अनुराधा कोईराला ने बहुत काम किया है। उन्होंने मानव तस्करी के शिकार में फंसे 12,000 से भी अधिक पीड़ितों को ना केवल उस दलदल से बाहर निकाला, बल्कि उनका पुनर्वास भी किया। साथ ही, 45,000 से अधिक महिलाओं और बच्चों को उन्होंने इस अमानवीय यातना का शिकार होने से भी बचाया है। नेपाली भाषा में मां के घर को ‘मैती’ कहते हैं। अनुराधा ने ऐसे पीड़ितों के लिए मैती नेपाल नाम का एक संगठन बनाया है। वह सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं। वह नेपाल की राजधानी काठमांडू में एक पुनर्वास केंद्र चलाती हैं। भारत-नेपाल सीमा पर बसे गांवों और शहरों में वह सहायता केंद्र चलाती हैं। काठमांडू में वह एक अकादमी का भी संचालन करती हैं। अनुराधा एक मध्यम वर्गीय नेपाली परिवार से ताल्लुक रखती हैं और कई सालों तक उन्होंने खुद भी काफी तकलीफें भुगती हैं। उनकी उम्र 67 साल है और इस उम्र में भी वह पूरी तरह से सक्रिय हैं।
अनंत एडएक्स  के संस्थापक
अनंत एडएक्स नाम के ऑनलाइन प्लैटफॉर्म के संस्थापक हैं, जो बिना खर्च के एमआईटी और हार्वर्ड जैसे संस्थानों की क्वॉलिटी का स्टडी मटीरियल उपलब्ध कराता है। एडएक्स अपनी एजुकेशन क्वॉलिटी के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। ये कोर्स इंग्लिश, हिंदी और दूसरी कई भाषाओं में उपलब्ध है। 162 देशों के स्टूडेंट इन स्टडी मटीरियल्स से लाभांवित होते हैं। 51 साल के अनंत का मानना है कि अच्छी शिक्षा बिना किसी खर्च के सभी को उपलब्ध होनी चाहिए। अपने मकसद को पूरा करने के लिए अनंत ने प्रतिष्ठित अमेरिकी तकनीकी संस्थान एमआईटी में प्रफेसर की नौकरी छोड़ दी थी।
एली सामाजिक कार्यकर्ता
1970 से नॉर्थ ईस्ट की इकलौती महिला मैगजीन ओरानी की एडिटर, पब्लिशर और मालिकाना हक रखने वालीं एली सामाजिक कार्यकर्ता हैं। महिला सशक्तिकरण की दिशा में काफी काम कर चुकी हैं। नॉर्थ ईस्ट में पहला असम फिल्म इंस्टिट्यूट बनाया। 81 साल की एली ने ‘आमी ओभीनय कोरा नाई’ नाम का ड्रामा भी लिखा। यह ड्रामा शारीरिक तौर पर अक्षम बच्चों, चाइल्ड लेबर और चाइल्ड एजुकेशन पर आधारित है।
जीतेंद्र ओडिशा के मशहूर गायक
64 साल के जीतेंद्र ओडिशा के मशहूर गायक हैं। कोसली-संबलपुरी भाषा के एक हजार से ज्यादा गाने गा चुके हैं। ओडिशा के सबसे मशहूर रिकॉर्डेड गाने रंगाबती के सिंगर ने स्कूली दिनों में ही पढ़ाई छोड़ दी। संगीत की औपचारिक शिक्षा नहीं ली। आजीविका चलाने के लिए मजदूरी और दूसरे काम भी कर चुके हैं।
सुकरी एक लोक गायिका
कर्नाटक के हलक्की आदिवासी समुदाय से ताल्लुक रखने वालीं सुकरी एक लोक गायिका हैं। वह गायन के क्षेत्र में बीते 58 साल से सक्रिय हैं। एक विलुप्त होती सांस्कृतिक विरासत की संरक्षक के तौर पर उन्हें देखा जाता है। वह सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर भी सक्रिय हैं। उन्होंने शराब बिक्री के खिलाफ एक प्रदर्शन की अगुआई की।
HIV/AIDS के खिलाफ सुनीति सोलोमन
HIV/AIDS के खिलाफ भारत की जंग में तमिलनाडु की सुनीति सोलोमन की अहम भूमिका रही है। रिसर्च, ट्रीटमेंट और अवेयरनेस में उनका बड़ा योगदान रहा है। 1985 में उन्होंने भारत के पहले AIDS केस की पहचान की थी। भारत का पहला AIDS रिसोर्स ग्रुप स्थापित करने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है।डॉक्टर सुनीति ने वाई.आर. गायतोंडे सेंटर फॉर रिसर्च ऐंड एजुकेशन स्थापित किया, जो देश में HIV काउंसलिंग और टेस्टिंग के शुरुआती संस्थानों में एक है।
रास्तेवाला बाबा
स्थानीय स्वयंसेवकों को संगठित कर पंजाब की काली बेन नदी को पुनर्जीवित किया। सीचेवाल मॉडल नाम से भूमिगत सीवरेज सिस्टम विकसित किया।स्वयंसेवकों को संगठित कर स्थानीय लोगों से फंड जमा किया। लोगों में चेतना जाग्रत कर उन्हें समझाया कि सीवर का गंदा पानी नदी में न छोड़ें। रिवरबेड को साफ कर उसका कुदरती रूप लौटाया और नदी एक बार फिर साफ पानी से लबालब हो गई।अंडरग्राउंड सीवरेज के सीचेवाल मॉडल को देशभर की नदियों को साफ करने के लिए अपनाए जाने पर विचार हो रहा है।सीचेवाल को रास्तेवाला बाबा (रास्ता दिखाने वाला), बेनवाले बाबा (काली बेन नदी को साफ करने वाले), इको बाबा (पर्यावरण के लिए काम करने वाले), रेलवेवाले बाबा (रेलने स्टेशन स्वच्छ करने वाले) के नाम से भी जाना जाता है।
वर्ष 2000 में सीचेवाल ने अकेले ही इस पवित्र नदी को साफ करना शुरू किया। स्थानीय लोग बाद उनके साथ जुड़ते चले गए। 2008 तक नदी पूरी तरह साफ हो चुकी थी।
पद्म पुरस्कारों में महिला खिलाड़ियों ने दबदबा बनाया
इस बार खेलों के पद्म पुरस्कारों में महिला खिलाड़ियों ने दबदबा बनाया है। सानिया मिर्जा और सायना नेहवाल को पद्म भूषण के लिए जबकि तीरंदाज दीपिका कुमारी को पद्मश्री के लिए चुना गया है। सानिया ने मेलबर्न से कहा कि पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया जाना वास्तव में सुखद अनुभव है इस सम्मान से वे हैरान हैं। दिलचस्प बात है कि इस 25 वर्षीय खिलाड़ी ने पिछले साल पुरस्कार नहीं मिलने पर नाराजगी जताई थी। सायना ने कहा कि  मैंने उम्मीद नहीं की थी, इसके बारे में कोई खबर नहीं थी। जब मैं यह सोचती हूं कि मैं केवल 25 साल की हूं और यह पुरस्कार हासिल कर रही हूं तो बहुत अच्छा लगता है। लेकिन अभी लंबा रास्ता तय करना है। दक्षिण एशियाई खेलों की तैयारियों में लगी दीपिका इससे पहले अर्जुन पुरस्कार हासिल कर चुकी हैं और उन्होंने कहा- मैं बहुत हैरान हूं। मुझे इस पर विश्वास नहीं हो रहा है। चार पांच दिन पहले ही मैं अपनी मित्र से बोल रही थी कि मेरा सपना पद्म पुरस्कार हासिल करना है और इसके लिर कड़ी मेहनत कर रही हूं। और एक दिन देर रात में मुझे महासंघ से फोन आया कि मेरा नाम नामित किया गया है।और मैं खुशी से उछल पड़ी। इसके बाद कई फोन आने लगे। मैंने अपने कोच और माता पिता का आशीर्वाद लिया।

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