हर चुनाव में याद आयेंगे टीएन शेषन…

-प्रस्तुति–सोमदत्त शास्त्री ————–
नब्बे के दशक में बतौर मुख्य चुनाव आयुक्त छंटे हुए नेताओं को नानी याद दिला देने वाले नामी नौकरशाह टीएन शेषन अब सदा के लिए खामोश हो गये हैं कभी अपनी मुखरता के लिए जानी गईं यह हस्ती अपनी-अपनी याददाश्त खो चुकी थी ।मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक टी एन शेषन आजकल चेन्नई में रहते थे और वो ज्यादार वक्त अपने घर के पास मौजूद ओल्ड एज होम में गुजारते थे . अगर वो घर पर भी रहते थे , तो उनके साथ रहने वाला कोई नहीं था . वो वहां भी अकेले ही रहते थे . मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कुछ साल पहले ही उनको भूलने की बीमारी हो गई थी, जिसके बाद उनके रिश्तेदारों ने उन्हें ओल्ड एज होम में शिफ्ट कर दिया था. 3 साल वहां गुजारने के बाद वो घर तो लौट आए, लेकिन उनका ज्यादातर वक्त ओल्ड एज होम में गुजरता था . . देश के दसवें मुख्य चुनाव आयुक्त रहे टीएन शेषन को एक वक्त में अव्यवस्थित रही भारतीय चुनाव व्यवस्था को पटरी पर लाने का श्रेय जाता है.
इसके अलावा टीएन शेषन को उनके कड़े रुख के लिए भी जाना जाता है. उन्होंने अपने कार्यकाल में प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव से लेकर बिहार के मुख्यमंत्री रहे लालू प्रसाद यादव जैसे दिग्गज नेताओं को भी नहीं बख्शा.

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अब से कोई पचास साल पहले की बात है. आईएएस की परीक्षा में टॉप करने वाला एक नौजवान चेन्नई (तब मद्रास) में परिवहन निदेशक (डायरेक्टर ऑफ ट्रांसपोर्ट) नियुक्त होकर आया. कुल 3 हजार बसों और 40 हजार कर्मचारियों की कमान उसके हाथ में थी. उसमें कुछ नया कर दिखाने का जज़्बा था. हर वक्त धुन ये सवार रहती कि यातायात के नियमों का कड़ाई से पालन हो. इस धुन में डायरेक्टर साहब अक्सर सड़कों पर देखे जाते थे. एक दिन उनसे एक बस ड्राइवर ने पूछ लिया-डायरेक्टर साहब! क्या आप बस के इंजन के बारे में जानते हैं?

इस सवाल पर वह सन्न रह गए. ड्राइवर ने आगे कहा, ‘अगर आप बस के इंजन के बारे में नहीं जानते, बस को चलाना भी नहीं जानते तो फिर आप ड्राइवरों की किसी परेशानी को कैसे समझेंगे?’

बात उसके दिल को लग गई. उसने बस ड्राइविंग तो सीखी ही, बसों के वर्कशॉप में भी वक्त गुजारा. यह हुनर एक दिन बड़े मौके पर उसके काम भी आया. उसके परिवहन निदेशक रहते चेन्नई में बस ड्राइवरों की हड़ताल हुई. फिर क्या था, वह नौजवान एक बस पर सवार हुआ और यात्रियों से भरी एक बस को पूरे 80 किलोमीटर तक चलाकर यात्रियों को उनकी मंजिल तक पहुंचा दिया.

60 के दशक में एक दिन चेन्नई की सड़कों पर बस चलाकर नौकरशाहों के लिए नजीर कायम करने वाला वाला यही डायरेक्टर ऑफ ट्रांसपोर्ट आगे चलकर (दिसंबर,1990) देश का मुख्य चुनाव आयुक्त बना. मुख्य चुनाव आयुक्त रहते हुए उसने चुनावों जारी धनबल, बाहुबल और मंत्रीपद के दुरुपयोग पर ऐसी नकेल कसी कि मुहावरा बना- एक तरफ नेशन, दूसरी तरफ शेषन!

हम बात कर रहे हैं मुख्य चुनाव आयुक्त रहते देश के मध्यवर्ग के दिलों पर राज करने वाले तिन्नेल्लई नारायण अय्यर शेषन की, जिन्हें हम-आप टी.एन. शेषन के नाम से जानते हैं.यही शेषन अब फानी दुनिया से विदा ले चुके हैं . भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन का 10 दिसंबर की रात दिल का दौरा पड़ने से चेन्नई में शेषन का निधन हो गया. वो 86 साल के थे दिल्ली के अशोक रोड से गुजरिएगा कभी तो एक इमारत नजर आएगी- निर्वाचन सदन. यहीं से चलता है भारत का चुनाव आयोग यानी इलेक्शन कमीशन. 12 दिसंबर 1990 को इस इमारत में एक शख्स दाखिल हुआ. नाम था- टीएन शेषन. बतौर मुख्य चुनाव आयुक्त वो शेषन ही थे जिनके आने के बाद चुनाव आयोग का नाम और उसका काम, दोनों आम आदमी के दरवाजे तक पहुंचे. एक ऐसे दौर में जब नौकरशाही का मतलब, सरकारों की हां में हां मिलाना माना जाता रहा हो, शेषन ने अपनी ईमानदारी और डंडे का ऐसा इस्तेमाल किया कि सिस्टम को मनमुताबिक चलाने की सोच रखने वालों में खौफ भर गया. इससे पहले न तो किसी ने चुनाव आयोग का ऐसा रूप देखा था, न ही ऐसा दमदार नौकरशाह.

चार साल पहले जब चेन्नई स्थित उनके आवास में एक पत्रकार ने टीएन शेषन से पूछा कि वह अपना सबसे बढयि़ा कार्यकाल कौन सा मानते हैं? 50 के दशक में मदुरै (डिंडिगुल) के सब कलेक्टर के पद से शुरुआत कर देश के कैबिनेट सचिव और फिर मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभालने वाले टी.एन. शेषन का जवाब था, ‘ढाई वर्ष का वह कार्यकाल जब चेन्नई मैं डायरेक्टर ऑफ ट्रांसपोर्ट हुआ करता था. मैं बस का इंजन अब भी खोल सकता हूं और उसे दोबारा बस में लगा सकता हूं.’

सवाल पूछने वाले पत्रकार के मन में इस जवाब को सुनकर चाहे जो आया हो लेकिन हम-आप यह अनुमान तो लगा ही सकते हैं कि टी.एन. शेषन ने मुख्य चुनाव आयुक्त रहते जब कहा था कि ‘आई ईट पॉलिटिशियन्स फॉर ब्रेकफॉस्ट’ तो ऐसा कहने का जज़्बा उनमें कहां से आया होगा!

शेषन का शुरुआती सफर
टी.एन. शेषन नौकरशाह रहते कैबिनेट सचिव के पद पर पहुंचे. पिता वकील थे और शेषन छह भाई-बहनों (दो भाई, चार बहन) में सबसे छोटे. अपने बचपन के दिनों की याद करते हुए शेषन ने तनिक मजाकिया लहजे में लिखा है, ‘परिवार निम्न मध्यवर्गीय था, लेकिन केरल के जिस ब्राह्मण कुल में मेरा जन्म हुआ उसमें लोगों ने चार कामों-नौकरशाही, संगीत, रसोइया और ठगी में नाम कमाया है.’ बताते इनके ब?े भाई भी ढ्ढ्रस् (1953 में प्रथम बैच ) टॉपर थे ,उनकी ही राह पर चलकर 20 वर्ष में ढ्ढक्कस् (पहले ढ्ढक्कस् की उम्र 20 वर्ष की थी ) कि परीक्षा 1954 में टॉप की फिर 1955 में ढ्ढ्रस् ।आगे बताने की जरूरत नहीं कि नॉकरशाही के सर्वोच्च पद कैबिनेट सचिव के पद से योजना आयोग के सदस्य फिर मुख्य निर्वाचन आयुक्त होकर देश की चुनावी व्यवस्था को धार दी । मेट्रो मैन “श्रीधरन ” बचपन से ही इंटरमीडिएट तक शेषन के सहपाठी थे । इंटरमीडिएट के बाद श्रीधरन इंजीनिरिंग में गये और शेषन भौतिकी से क्चस्ष् करके अलग राह पर ।

कुल-परंपरा से अलग शेषन वैज्ञानिक बनना चाहते थे लेकिन संयोग देखिए कि बने वे नौकरशाह ही. फिजिक्स से बीएससी थे सो कुछ दिन कॉलेज में विज्ञान पढ़ाया लेकिन वेतन इतना कम था कि सोचा बड़े भाई के नक्श-ए-कदम पर चलकर नौकरशाह बनना ही ठीक है. बड़े भाई टी.एन. लक्ष्मीनारायणन आईएएस के पहले बैच के टॉपर थे. शेषन पहले आईपीएस की परीक्षा में बैठे और टॉपर हुए फिर अगले साल (1954) 21 साल की उम्र में आईएएस की परीक्षा में शीर्ष स्थान पर रहे.

मदुरै (डिंडिगुल) की सब कलेक्टरी हो या फिर ग्राम विकास के सचिव (1958) की जिम्मेदारी शुरुआती दौर से ही हर पद पर उन्होंने साबित किया ‘बीए हुए नौकर हुए पेंशन मिली और मर गए’ वाली नियति उनकी नहीं होने जा रही.

डिंडिगुल में स्थानीय कांग्रेस के प्रेसिडेंट के पति पर गबन का आरोप लगा था. शेषन के ऊपर राजनीतिक दबाव था कि आरोपी को गिरफ्तार न किया जाय लेकिन शेषन ने फर्ज भी निभाया और नौकरी भी बचाई. परिवहन विभाग की डायरेक्टरी वाला किस्सा हमलोग ऊपर पढ़ ही चुके हैं. तब ढाई साल के भीतर शेषन ने चेन्नई में खस्ताहाल परिवहन-व्यवस्था को चाक-चौबंद करने का करिश्मा कर दिखाया था. उनके बारे में यह भी कहा जाता है कि नौकरी के ऊंचे पदों पर पहुंचने पर जिस भी मंत्रालय में महत्वपूर्ण पद संभाला वहां प्रभारी मंत्री की छवि चमक गई.

बेशक, एक नौकरशाह के रूप में शेषन की कामयाबियों की लिस्ट लंबी है और वे खुद भी चेन्नई में डायरेक्टर ऑफ ट्रांसपोर्ट के रूप में बिताए अपने कार्यकाल को सबसे श्रेष्ठ मानते हैं लेकिन भारत का मध्यवर्ग उन्हें किसी और रूप में याद करता है.

लोकतंत्र के महापर्व का महापुरोहित
मध्यवर्ग के मन में शेषन की छवि आने वाले कई दशकों तक दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के महापर्व चुनाव के महापुरोहित यानि एक ऐसे व्यक्ति के रूप में कायम रहेगी जिसने सिर्फ वही किया जो संविधान में लिखा है. खुद कानून की चौहद्दी में रहा, दूसरों को इस चौहद्दी के भीतर रहने की हिदायत दी और अगर किसी ने इस हिदायत का जरा सा भी उल्लंघन किया तो चाहे वह कोई भी हो-इस महापुरोहित के कोप का शिकार हुआ.

अब से तकरीबन तीन दशक पहले भारतीय राजनीति में उथल-पुथल का दौर था. वीपी सिंह की सरकार के गिरने के बाद केंद्र में चंद्रशेखर की सरकार (10 नवंबर 1990- 21 जून 1991) बस बनी ही थी. वीपी सिंह के जगाए बोफोर्स के जिन्न ने राजीव गांधी की कांग्रेस को विपक्ष में बैठने के लिए मजबूर किया था और महज 64 सांसदों वाली चंद्रशेखर की सरकार को विपक्ष में बैठी कांग्रेस की बैसाखी का सहारा था. कहते हैं, चंद्रशेखर की सरकार ने राजीव गांधी के कहने पर कैबिनेट सचिव टी.एन. शेषन को मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया था.

लेकिन शेषन ने मुख्य चुनाव आयुक्त बनने के चंद महीनों के भीतर अपने फैसलों से स्पष्ट कर दिया कि उनको कांग्रेस का तरफदार बताने वाले आलोचक गलत हैं. सख्ती और आगे के इरादे का पता देता शेषन का यह वाक्य 1991 के मार्च महीने तक अखबारों में छप चुका था – ‘भूल जाइए कि संसद में गलत तौर-तरीकों का इस्तेमाल करके पहुंच सकेंगे आप. किसी को ऐसा करने की इजाजत नहीं दी जाएगी.’

लोग सालों से चाह रहे थे कि कोई चुनावी गंगा को धनबल, बाहुबल और सत्ताबल से गंदा करने वाले नेताओं पर लगाम कसे और टी.एन. शेषन की खबरदार करती कड़क आवाज गूंजी तो लोगों को लगा यह कोई मुख्य चुनाव आयुक्त नहीं बल्कि देश का सामूहिक विवेक बोल रहा है.

शेषन ने जैसा कहा था, 1991 के चुनावों में ठीक वैसा ही करके दिखाया. इसकी पहली बानगी देखी 1991 के पहले पखवाड़े में जारी किए गए उनके आदेश में. शेषन ने पांच राज्यों बिहार, यूपी, हरियाणा, राजस्थान और कर्नाटक की सरकारों से कहा आपने अपने अधिकारियों का जो थोक भाव से तबादला करना शुरू किया है उस पर रोक लगाइए, अधिकारी जहां काम कर रहे थे, वे वहीं काम करेंगे. (दरअसल चुनावों की घोषणा होने के साथ राज्यों में चुनावी गणित के हिसाब से अधिकारियों के तबादले हो रहे थे और लोकलुभावन वादें किए जा रहे थे).

राज्यों ने तकनीकी तौर पर कुछ गलत नहीं किया था. सारे तबादले 25 मार्च यानी चुनावी आचार संहिता लागू होने से पहले हुए थे, लेकिन शेषन ने कहा कि यह आचार संहिता की भावना का उल्लंघन है. शेषन के फरमान पर बाकी राज्य चुप रहे लेकिन हरियाणा सरकार ने जवाब दिया कि तबादले का आदेश हम नहीं रद्द करने वाले.

सोचिए, हरियाणा सरकार की इस रुखाई का शेषन ने क्या जवाब दिया होगा? शेषन का पलटवार था, ‘न रुकने वाला तूफान, न हिलने वाले पहाड़ से टकराये तो फिर दोनों में से किसी एक को झुकना पड़ता है!’

आगे के सालों में शेषन का यह अंदाज और तल्ख हुआ और उनके कामकाज के अंदाज की यह तल्खी ही थी जो वे राजनेताओं को जितना खटकते चले गए, मध्यवर्ग के दिल पर उतनी ही उनकी बादशाहत बढ़ती गई.

शेषन ने किसी को नहीं बख्शा
शेषन पर कांग्रेसी होने का ठप्पा लगा था लेकिन जल्दी ही कांग्रेस को समझ में आ गया कि मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन.शेषन को न तो पिछला उपकार याद दिलाकर रोका जा सकता है, न ही लालच दिखाकर डिगाया जा सकता है. कोई चाहे तो मिसाल के तौर पर कांग्रेस के विजय भास्कर रेड्डी और संतोष मोहन देब के साथ शेषन के बरताव को याद कर सकता है.

विजय भास्कर रेड्डी को आंध्रप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया और पद पर बने रहने के लिए नियम के मुताबिक उनके लिए छह महीने के भीतर चुनाव में निर्वाचित होना जरूरी था. शेषन ने उपचुनाव कराने से इनकार कर दिया. तर्क दिया कि विजय भास्कर रेड्डी की जरूरत के हिसाब से उपचुनाव नहीं होंगे. जब बाकी जगहों के उपचुनाव होंगे तो ही आंध्रप्रदेश में उपचुनाव कराए जाएंगे.

त्रिपुरा के चुनाव (1988) में कांग्रेस को जीत दिलाने वाले संतोष मोहन देब (केंद्रीय मंत्री) भी एक दफे टी.एन.शेषन का निशाना बने. 1993 के त्रिपुरा विधानसभा के चुनाव फरवरी महीने में होने वाले थे. शेषन ने चुनाव स्थगित कर दिए. कहा जबतक उन पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं हो जाती जिनकी संतोष मोहनदेब के साथ चुनाव-प्रचार के दौरान मिलीभगत की खबरें आई हैं, तब तक त्रिपुरा में चुनाव नहीं होंगे. त्रिपुरा में चुनाव अप्रैल (1993) में हुए, पुलिस अधिकारियों पर सरकार को कार्रवाई करनी पड़ी.

कानून के पालन पर अडिग शेषन ने अर्जुन सिंह को भी नहीं बख्शा. मध्यप्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश में बीजेपी की सरकारों को भंग करने के बाद पी.वी नरसिम्हाराव सरकार के सबसे ताकतवर मंत्रियों में शुमार अर्जुन सिंह ने कहा इन राज्यों में चुनाव एक साल बाद होंगे. शेषन ने तुरंत प्रेस विज्ञप्ति जारी कर याद दिलाया कि चुनाव की तारीख मंत्रिगण या प्रधानमंत्री नहीं बल्कि चुनाव आयोग तय करता है.

शेषन के ऐसे फैसलों से चिढ़कर एक दफे नरसिम्हाराव ने उनसे निजात पाने की सोची. द इंडिपेन्डेन्ट अखबार में छपे लेख में टिम मैक्गिर्क ने वो किस्सा कुछ यों बयान किया है: एक दफे प्रधानमंत्री राव ने शेषन को बुलाया और कहा, ‘शेषन! कहिए मैं आपके लिए क्या कर सकता हूं. उन्होंने शेषन के सामने दो विकल्प रखे. कहा कि आप चाहें तो किसी राज्य के राज्यपाल बन जाएं या फिर वॉशिंगटन में भारत के राजदूत. शेषन ने इनकार कर दिया. इस वाकये को याद करते हुए बाद में शेषन ने मजाकिया अंदाज में कहा, ‘मुझे उपहार में सिर्फ गणेश की मूर्तियां अच्छी लगती हैं. इसलिए कि मैं खुद ही बहुत कुछ गणेश की तरह दिखता हूं.’अस्मेरोम और एलिसा पी. रीस द्वारा संपादित किताब डेमोक्रेटाइजेशन एंड ब्यूरोक्रेटिक न्यूट्रेलिटी में टी.एन. शेषन के संघर्ष की कहानी का जिक्र है. इस किताब में पेज नंबर 275 पर लिखा है कि 1962 में टी.एन. शेषन का एक ही दिन में सुबह 10.30 बजे से 5 बजे शाम तक 6 बार ट्रांसफर किया गया था. टी.एन. शेषन ने एक ग्रामीण अफसर को 3000 रुपए का घपला करने के लिए रोका था, इसलिए उनका ट्रांसफर हुआ था. इतना नही नहीं, रेवेन्यू मंत्री की बात न मानने पर टी.एन. शेषन को तमिलनाडु में मंत्री ने अपनी गाड़ी से ऐसी जगह उतार दिया था, जहां सुनसान इलाका था.
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राज्यपाल गुलशेर अहमद.इस्तीफ़ा देना पड़ा
शेषन के सबसे हाई प्रोफ़ाइल शिकार थे हिमाचल प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल गुलशेर अहमद. चुनाव आयोग द्वारा सतना का चुनाव स्थगित करने के बाद उन्हें अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा.गुलशेर अहमद पर आरोप था कि उन्होंने राज्यपाल पद पर रहते हुए अपने पुत्र के पक्ष में सतना चुनाव क्षेत्र में चुनाव प्रचार किया था.उसी तरह राजस्थान के तत्कालीन राज्यपाल बलिराम भगत को भी शेषन का कोपभाजन बनना पड़ा था जब उन्होंने एक बिहारी अफ़सर को पुलिस का महानिदेशक बनाने की कोशिश की.
उसी तरह पूर्वी उत्तर प्रदेश में पूर्व खाद्य राज्य मंत्री कल्पनाथ राय को चुनाव प्रचार बंद हो जाने के बाद अपने भतीजे के लिए चुनाव प्रचार करते हुए पकड़ा गया. ज़िला मजिस्ट्रेट ने उनके भाषण को बीच में रोकते हुए उन्हें चेतावनी दी कि अगर उन्होंने भाषण देना जारी रखा तो चुनाव आयोग को वो चुनाव रद्द करने में कोई हिचकिचाहट नहीं होगी.
उनकी एक और उपलब्धि थी उम्मीदवारों के चुनाव ख़र्च को कम करना. उनसे एक बार एक पत्रकार ने पूछा था, “आप हर समय कोड़े का इस्तेमाल क्यों करना चाहते हैं?”शेषन का जवाब था, “मैं वही कर रहा हूँ जो कानून मुझसे करवाना चाहता है. उससे न कम न ज़्यादा. अगर आपको कानून नहीं पसंद तो उसे बदल दीजिए. लेकिन जब तक कानून है मैं उसको टूटने नहीं दूँगा.”
संतोष के लिए लिखी आत्मकथा
चुनाव आयोग में उनका कार्यकाल समाप्त होने के बाद मसूरी की लाल बहादुर शास्त्री अकादमी ने उन्हें आईएएस अधिकारियों को भाषण देने के लिए बुलाया.शेषन का पहला वाक्य था, “आपसे ज़्यादा तो एक पान वाला कमाता है.” उनकी साफ़गोई ने ये सुनिश्चित कर दिया कि उन्हें इस तरह का निमंत्रण फिर कभी न भेजा जाए.शेषन अपनी आत्मकथा लिख चुके हैं लेकिन वो इसे छपवाने के लिए तैयार नहीं हैं क्योंकि उनका मानना है कि इससे कई लोगों को तकलीफ़ होगी. उनका कहना है, “मैंने ये आत्मकथा सिर्फ़ अपने संतोष के लिए लिखी है.”
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चुनाव में उम्मीदवारों के खर्च पर लगाम लगाने की बात हो या फिर सरकार से उधार पर लिए गए हेलिकॉप्टर के जरिए मंत्रियों के चुनाव-प्रचार करने की रीत पर रोक की बात- आज ये चीजें किसी नियम की तरह स्थिर नजर आती हैं तो इसकी वजह है टी.एन.शेषन का चुनाव-सुधार मिशन. दीवारों पर नारे लिखना और पोस्टर चिपकाना, लाउडस्पीकरों से कानफोड़ू शोर करना, चुनाव-प्रचार के नाम पर सांप्रदायिक तनाव पैदा करने वाले भाषण देना सबकुछ टी.एन.शेषन के निशाने पर आया और नेतृवर्ग ऐसे सवालों पर नए सिरे से सोचने पर मजबूर हुआ.
1990 के दशक के पूर्वार्द्ध में जब टीएन शेषन चुनाव सुधार कर रहे थे तो लालू प्रसाद यादव उन दिनों परेशान थे, तब उन्होंने संकेत में आरोप लगाया था कि वे पिछड़ी जाति के हैं और इसी वजह से उन्हें दो ब्राह्मण परेशान कर रहे हैं. लालू प्रसाद यादव का इशारा तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव और मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन की ओर था. 1995 में इंडिया टुडे को टीएन शेषन ने एक लंबा इंटरव्यू दिया. इस इंटरव्यू में उनसे इस संबंध में सवाल पूछा गया कि लालू प्रसाद ने ऐसा कहा है, क्या कहेंगे आप? इस पर टीएन शेषन ने एक पंक्ति में सपाट जवाब दिया कि लालू प्रसाद यादव महान राष्ट्रभक्त हैं. लालू ने 1995 के बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान कहा था कि ब्राह्मणवादी ताकतें हमें रोकने का प्रयास कर रही हैं, लेकिन जनता दल दो तिहाई बहुमत से सरकार में आयेगी.
चीफ इलेक्शन कमिश्नर, टीएन शेषन की छवि कुछ ऐसी बनी कि कहा जाने लगा- भारत के नेता सिर्फ दो चीजों से डरते हैं. एक भगवान और दूसरे टीएन शेषन. शेषन की ये छवि बेवजह नहीं थी. 1991 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव थे. ये यूं भी सियासी तौर पर एक उबलता हुआ साल था. शेषन ने यूपी के सभी डीएम, पुलिस अफसरों और चुनाव की जिम्मेदारी संभालने वाले करीब 300 पर्यवेक्षकों को साफ कर दिया कि अगर चुनाव में कोई भी गलती होती है तो बख्शा नहीं जाएगा.
यूपी में शेषन ने करीब 50 हजार अपराधियों को विकल्प दिया कि या तो वो अग्रिम जमानत लेलें या खुद को पुलिस को सौंप दें.
उत्तर प्रदेश का एक और किस्सा मशहूर है. कल्पनाथ राय उस वक्त खाद्य मंत्री थे. चुनाव प्रचार बंद हो चुका था. लेकिन डीएम ने उन्हें भतीजे के लिए प्रचार करते पकड़ लिया. उन्हें साफ शब्दों में चेतावनी दी गई कि अगर भाषण नहीं रोका गया तो इलेक्शन कमीशन को ये चुनाव रद्द करने में जरा भी हिचकिचाहट नहीं होगी. ये हिम्मत शेषन की दी हुई थी जिसकी धमक ऊपर से नीचे तक चुनावी मशीनरी में दिखाई देने लगी थी. हिमाचल चुनाव में भी शेषन की कसी हुई मुठ्ठियों ने कइयों की मुश्कें कस दीं.
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टीएन शेषन ने अपने इस इंटरव्यू में बताया था कि नरसिंह राव उनसे बैर का भाव रखते हैं.

टीएन शेषन ने यह भी कहा था कि वे त्यागी नहीं हैं और उन्होंने अपने पूरे जीवन में प्रतिशोध देखा है. टीएन शेषन से जब यह पूछा गया था कि उनके प्रिय नेता कौन हैं, तो उन्होंने सरदार वल्लभ भाई पटेल और राजा जी यानी चक्रवर्ती राजगोपालाचारी का नाम लिया था. उन्होंने कहा था कि राजाजी अपने ज्ञान व विद्वता के कारण उन्हें पसंद हैं.

शेषन अपने फैसलों के कारण कई दफे विवाद में पड़े. एक बार तो उन्होंने यह तक कह दिया था कि जबतक सबके वोटर आईकार्ड नहीं बन जाते, इस देश में चुनाव नहीं होंगे. ऐसे कुछ फैसलों के कारण उन्हें प्रचार-लोभी और अहंकारी कहा गया. कई बार उनके फैसलों पर अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ा. यह भी कहा जाता है कि शेषन ने संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत प्राप्त शक्तियों की मनमानी व्याख्या की. और, एक वक्त ऐसा भी आया जब उनकी शक्ति सीमित करने के लिए चुनाव आयोग की संरचना में बदलाव करते हुए एक की जगह तीन चुनाव आयुक्त नियुक्त करने का विधान रचा गया. बतौर इलेक्शन कमिश्नर शेषन का सबसे दिलचस्प और मुश्किल चुनाव आया साल 1995 में. जगह थी–बिहार. ये मान कर चला जाता था कि बिहार में साफ-सुथरे चुनाव एक सपना हैं. बूथ कैप्चरिंग आम थी और दुनालियों से गोली निकलते सेकेंड नहीं लगता था. कोई और होता तो शायद हथियार डाल देता. लेकिन नहीं, टीएन शेषन नहीं. लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री थे….और चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री ही बने रहना चाहते थे. शेषन ने पूरे राज्य को अर्धसैनिक बलों से पाट दिया. शेषन को कोई कोताही बर्दाश्त नहीं थी. वो जरा भी शक होने पर चुनाव रद्द कर देते. चार बार चुनाव की तारीख आगे बढ़ चुकी थी. एक तरह से सीएम लालू प्रसाद यादव का मुकाबला विपक्ष से न होकर सीधे शेषन से हो गया. संकर्षण ठाकुर अपनी किताब- द ब्रदर्स बिहारी में लिखते हैं- लालू अपने जनता दरबार में शेषन को जमकर लानतें भेजते. वो अपने ही अंदाज में कहते- शेषनवा को भैंसिया पे चढ़ाकर के गंगाजी में हेला देंगे.
शेषन के सिस्टम चलाने के अंदाज से लालू इस तरह नाराज हुए कि वो सीधे राज्य चुनाव आयुक्त आरजेएम पिल्लई के पास पहुंचे. उन्होंने, पिल्लई से कहा- हम तुम्हरा चीफ मिनिस्टर है, और तुम हमरा अफसर तो ई शेषनवा कहां से बीच में टपकता रहता है? लेकिन शेषन डिगे नहीं. वो डरे नहीं. वो सिर्फ अपना फर्ज निभा रहे थे. एक ऐसे राज्य में जहां 1984 लोकसभा चुनाव में 24 लोग मारे गए, 1985 विधानसभा चुनाव में 63, 1989 के आम चुनाव में 40 और जिस साल लालू चुनाव जीतकर सीएम बने 1990 के साल में सबसे ज्यादा यानी 87 लोग.
शेषन ने पैरामिलिट्री फोर्स की 650 टुकड़ियां तैनात कर दीं. चार चरणों में चुनाव का ऐला हुआ और चार बार ही तारीखें बदली गईं. राज्य में आचार संहिता तो लागू थी ही, साथ ही शेषन संहिता भी लागू हो गई! ये देश के इतिहास में सबसे लंबा चलने वाला चुनाव था. चुनाव का ऐलान 8 दिसंबर 1994 को हुआ और चुनाव खत्म हुआ 28 मार्च 1995 को. लेकिन इस लंबे चुनाव ने एक तरह से लालू की मदद कर दी. लालू को वक्त मिल गया, सूबे के हर हिस्से तक पहुंचने और चुनाव प्रचार करने का. बिहार में शेषन ने अपने दम पर वो कर दिखाया जिसके बारे में कोई सोच तक नहीं सकता था. पहले साफ-सुथरे चुनाव में लालू ने जीत दर्ज की और लालू के साथ ही शेषन के नेतृत्व में चुनाव आयोग के इरादों की भी जीत हुई.
शेषन ने किए कई चुनाव सुधार
शेषन ने तमाम राजनीतिक विरोध को झेलते हुए भी चुनाव में पहचान पत्र अनिवार्य किया. जब नेताओं ने इसे खर्चीली प्रक्रिया बताया तो उनका जवाब था कि ठीक है…अगर ऐसा नहीं होता तो 1 जनवरी 1995 के बाद देश में कोई चुनाव ही नहीं कराया जाएगा.
शेषन ने उम्मीदवारों के लिए चुनावी खर्चे की सीमा भी तय की.
11 दिसंबर 1996 तक शेषन ने चुनाव आयोग की बागडोर संभाली और 6 साल तक ये संस्था एक ऐसे शेर बनी रही जो सिर्फ दहाड़ता नहीं था बल्कि वक्त आने पर शिकार भी करता था. इसी साल उन्हें रैमन मैग्सेसे पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया. उन्होंने लोकसभा का चुनाव भी लड़ा और राष्ट्रपति के लिए भी खड़े हुए लेकिन दोनों जगह हार का सामना करना पड़ा.
शेषन के पूरे किरदार को समझना हो तो उनके कलेक्टर की एक बात से समझा जा सकता है जो सर्विस के पहले साल में ही कही गई थी- “शेषन, तुमने अपने लिए नामुमकिन से स्टैंडर्ड बना रखे हैं.”
लेकिन, टीएन शेषन ने वो सारे नामुमकिन स्टैंडर्ड…मुमकिन बना दिए.

शेषन अपनी उम्र के आठवें दशक में ऐसी आलोचनाओं और प्रशंसाओं से बहुत दूर जा चुके थे चेन्नई के उनके घर पर आप कभी समय निकालकर जाते और बीती बातों को पूछते तो वे आपको यह जरूर बताते थे कि, मैं राजनीति से नहीं, बुरे राजनेताओं से नफरत करता हूं.मुख्य चुनाव आयुक्त रहते हुए शेषन ने चुनावों जारी धनबल, बाहुबल और मंत्रीपद के दुरुपयोग पर ऐसी नकेल कसी कि मुहावरा बना- एक तरफ नेशन, दूसरी तरफ शेषन! सेवा से रिटायरमेंट के बाद शेषन ने 1997 में राष्ट्रपति का चुनाव लडा और हारे उसके बाद वे चेन्नै में रिटायरमेंट का जीवन जीने लगे। यहाँ वे एक मैनेजमेंट कॉलेज में लीडरशिप पर लेक्चर क्लास भी लेते थे। अकसर होता है. वो किसी से भी फोन पर बात नहीं करते हैं. शेषन सत्य साईं बाबा के भक्त थे। उनके निधन के बाद वो सदमे में आ गए थे

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