सरकारी खजानों की सेहत के लिए भी जरूरी खुराक बन चुकी शराब

प्रकाश भटनागर /

मध्यप्रदेश में इस बार विवादों का जिन्न शराब की बोतल से निकलकर फिर प्रकट हो गया है। इसके दो मुख्य किरदार हैं। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और अभूतपूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान। अभूतपूर्व इसलिए कि चौहान राज्य में चौथी बार इस पद को संभालने वाले एकलौते मुख्यमंत्री हैं। पन्द्रह साल लगातार प्रदेश में भाजपा की सरकार यानि तीन बार लगातार जनादेश हासिल करने का करिश्मा भी शिवराज के खाते में हैं। तो लॉकडाउन के अनलॉक होते ही प्रदेश में शराब की ज्यादातर दुकानों के शटर भी खुल गए हैं। ठेकेदारों से पटरी न बैठ पाने के कारण खुद सरकार को ही यह काम करना पड़ रहा है। भोपाल जैसे शहरों में तो ताजा-ताजा साप्ताहिक नीलामी हुई है। इसे आबकारी आयुक्त चाहेंगे तो चार सप्ताह तक बढ़ा सकेंगे। तो ऐसे सुरामयी माहौल के बीच दिग्विजय सिंह का एक ट्विट बवाल की वजह बन गया है। सिंह ने एक ऐसा वीडियो सोशल मीडिया पर डाला है, जिसमें शिवराज सिंह चौहान किसी से मुखातिब हैं। उसमें वे कथित तौर से कह रहे हैं कि दारू इतनी फैला दो प्रदेश में कि पिएं और पड़े रहे…मतलब राज्य में जमकर शराब बेची जाए। जाहिर है यह वीडियो जोड़ तोड़ का कमाल है। क्योंकि शिवराज तो ऐसा कह नहीं सकते जिनके पिछले कार्यकाल में न सिर्फ शराब की दुकानें कम हुर्इं बल्कि उसकी खपत को कम करने के भी कारगर प्रयास किए गए।

अब इस फर्जी वीडियों पर दिग्विजय सिंह ने भरोसा करके इसे अपने ट्विटर एकाउंट पर डाल दिया, जाहिर है उनके खिलाफ साइबर अपराध का मामला बनता है। इसलिए एफआईआर दर्ज हो गई। गलती का अहसास होने के बाद दिग्विजय सिंह ने इसे ट्विटर से हटा भी लिया। राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के दलित नेता फूल सिंह बरैया को दूसरी वरीयता में रखने को लेकर हमलावर भाजपा ने इस वीडियो को इस चुनाव से भी जोड़ दिया है। दिग्विजय सिंह ने हमेशा से ही अपने किसी आरोप के जवाब में हुए प्रत्यारोप को एन्जॉय करने की हद तक हलके में लिया है। इसलिए ताजा मामले में भी वे पूरी तसल्ली के साथ उलटे शिवराज सिंह चौहान को ही निशाने पर लेने का प्रयास कर रहे हैं। दिग्विजय का कहना है कि उन्होंने शिवराज के विधानसभा क्षेत्र बुधनी में किसानों की समस्याओं को उठाया, इसलिए उनके खिलाफ गलत आधार पर प्रकरण कायम करवा दिया गया है। दिग्विजय सिंह ने जो भी कोशिश की हो लेकिन यह शिवराज ही हैं, जिनकी सरकार की नीतियों के चलते सन 2010 के बाद से प्रदेश में शराब की एक भी नई दुकान नहीं खुली। इससे ठीक उलट दिग्विजय के शासन के समय तो प्रदेश में मदिरा प्रेमियों की सुविधा के लिए बीयर की दुकाने अलग से खुलवा दी गयी थीं। कांग्रेस खुद को जीवन-भर शराब का विरोध करने वाले महात्मा गांधी का फॉलोवर कहती जरूर है, लेकिन इसी पार्टी की कमलनाथ सरकार ने राज्य में शराब की उप दुकानें खोलने और महिलाओं के लिए अलग से दारू बेचने की व्यवस्था का भी प्रयास कर डाला था। शिवराज ने प्रदेश में नर्मदा नदी के करीब शराब की बिक्री पर रोक लगाई। धार्मिक स्थल और स्कूल/ कॉलेज के करीब उनकी दुकानों को बंद कराया।

यह सच है कि देश के अधिकांश हिस्सों की ही तरह मध्यप्रदेश में भी शराबबंदी लागू नहीं की गयी, लेकिन एक तरीके से देखें तो इसके कई पॉजिटिव पहलू भी सामने आये हैं। गुजरात और बिहार सहित नागालैंड जैसे जिन राज्यों में शराबबंदी लागू है, वहां इस की जमकर तस्करी और काला बाजारी होती है। ऐसे राज्यों में शराब की बिक्री में सरकार की कोई भूमिका नहीं है, इसलिए नकली शराब बिकने के भी बहुत मामले उन राज्यों में सुनायी देते हैं। उन प्रदेशों में न तो शराब से रेवेन्यू मिल रहा है, बल्कि हो यह रहा है कि इसकी चोरी-छिपे बिक्री से सरकार को राजस्व का नुक्सान ही उठाना पड़ रहा है। तमाम रिपोर्ट बताती हैं कि देश में शराब के शौकीनों की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है। ऐसे में कम से कम यही सोचकर संतोष किया जा सकता है कि प्रदेश में सरकारी बिक्री किए जाने से लोगों को नकली शराब के खतरे से तो बचाया ही जा सकता है।

शराब की बिक्री और इसके सेवन के खिलाफ चाहे जितनी दलीले दी जाऐ, लेकिन हकीकत यह है कि सूरा के सुरूर की चाह राज्य सरकारों का खजाना भरने का बहुत बड़ा माध्यम बन चुकी है। रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया ने इसी साल मई में बताया कि देश में वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी लागू करने के बाद प्रदेश सरकारें शराब की बिक्री से हुई कमाई के द्वारा ही अपने कुल रेवेन्यू का दस से पन्द्रह फीसदी हिस्सा हासिल करती हैं। यही वजह रही कि लॉकडाउन के दौरान राज्य सरकारों ने केंद्र पर शराब की दुकानें खुलवाने के लिए बहुत दबाव बनाया था। पंजाब में कांग्रेस की सरकार है। भले ही यह दल कोरोना से निपटने के तमाम उपायों को लेकर केंद्र सरकार पर आरोप लगा रहा हो, लेकिन इसी पंजाब के कांग्रेसी मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह ने मई में पीएम नरेंद्र मोदी को इस चिट्ठी भेजी। इसमें उन्होंने कहा कि राज्य में शराब के ठेके फिर खोलने की इजाजत दी जाए. कैप्टेन ने पत्र में कहा कि राज्य सरकार को साल भर में 62 सौ करोड रुपये की आमदनी शराब के ठेके नीलाम करने से होती है, जो प्रति महीना 521 करोड रुपये बनता है, लेकिन पिछले 43 दिनों से शराब के ठेके बंद होने के कारण राज्य सरकार को इस बड़ी आमदनी से हाथ धोना पड़ रहा है। शराब के गणित को इस बात से भी समझा जा सकता है कि उत्तरप्रदेश सरकार ने तो आवारा पशुओं की अच्छी देखरेख के लिए पैसे जमा करने की खातिर शराब पर विशेष शुल्क लगा रखा है। नशे से कमाई के लिए ही तमिलनाडु जैसे राज्य शराब पर वैट के अलावा विदेश से आयतित शराब पर विशेष शुल्‍क, परिवहन शुल्‍क और लेबल और ब्रांड पंजीकरण शुल्क भी लेते हैं।

रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया की एक हालिया रिपोर्ट बताती है कि वित्तीय वर्ष 2018-19 देश के 29 राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों में शराब से एक लाख पचास हजार छह सौ सत्तावन करोड़ रुपए से अधिक का उत्पाद शुल्क जुटाया था। इन राज्यों ने वर्ष 2019- 20 के लिए उत्पाद शुल्क के जरिये सोलह फीसदी अधिक यानी पौने दो लाख करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई का लक्ष्य तय किया था। इस बात को और बेहद आसानी से समझिये। वित्तीय वर्ष 2019-20 हरेक राज्य ने शराब पर उत्पाद शुल्क के जरिये पंद्रह-पंद्रह हजार करोड़ रुपए तक कमाए। ये भारी-भरकम कमाई कोरोना के चलते लागू हुए लॉकडाउन से पहले ही कर ली गयी थी। हां, हम एक उदाहरण और दे दें. मध्यप्रदेश के एक सीमावर्ती राज्य राजस्थान में बीयर की जो बोतल सौ रुपए की बिकती है, सरकार उस पर पैंतालीस रुपये का टैक्स वसूल रही है। जाहिर है कि सूरा का सुरूर सरकारी खजानों की सेहत बनाये रखने के लिए भी बहुत जरूरी खुराक बन चुका है।

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