रांची के इनकम टैक्स आफिसर की बनी बायोपिक

रांची. धौनी के बाद अब रांची में इनकम टैक्स के डिप्टी कमिश्नर अजय सिंह पर बायोपिक बनी है। खास बात यह है कि इसमें वह खुद एक्टिंग कर रहे हैं।पांच साल के अजय कैसे घर में रखे पटाखों में विस्फोट के कारण एक दिव्यांग की जिंदगी जीने लगे। कैसे बमुश्किल स्कूली पढ़ाई की। यूपी में राज्य सिविल सेवा में चुन लिए गए मगर एक बुरे तजुर्बे के बाद नौकरी छोड़ दी। फिर भारतीय सिविल सेवा में आए। त्रिवेणी फिल्म्स के ऋषि प्रकाश मिश्रा की इस फिल्म का ट्रेलर और म्यूजिक शुक्रवार को रांची में लांच होगा।

सिर्फ बाएं कान से सुन सकता थे, वो भी मशीन के सहारे
धनतेरस की वो रात भूलती नहीं। मैं पांच साल का था। छपरा जिले के डुमरी गांव में मेरे पिता किसान थे। दो बहनों के बाद मेरा जन्म हुआ, इसलिए सभी लाड़ से पालते थे। दिवाली के लिए पटाखे आए थे। मैं ढिबरी लेकर उन्हें पास से देख रहा था। तभी विस्फोट हुआ। मैं बचा कैसे, यही अचंभा है। सिर, बाल, आंख, कान समेत सामने के सारे अंग बुरी तरह जल गए। दो महीने इलाज के बाद घर लौटे मगर दोनों आंखों की रेटिना और एक कान बुरी तरह डैमेज हो चुके थे। दायां कान तो पूरी तरह खत्म हो गया। दाईं आंख की रेटिना का चार बार ऑपरेशन हुआ। बाईं आंख का दो बार। नेत्र ज्योति लगातार घटती गई। सिर्फ बाएं कान से सुन सकता था। वो भी मशीन के सहारे।
कोई चश्मा छीन कर अंधा बताता
मुझे इस हाल में देखकर मां-बाप रोते रहते थे। कई महीनों बाद स्कूल शुरू किया। सहानुभूति तो दूर रही। दोस्त चिढ़ाते ज्यादा थे। कोई बहरा कहता। कान नोचता। कोई चश्मा छीन कर अंधा बताता। इसका जवाब उन्होंने सरस्वती शिशु मंदिर में छठी तक प्रथम आकर दिया।
इंटरव्यू में कम नंबर मिले वरना आईएएस होते
आगे गांव के स्कूल में पढ़ना पड़ा। पिता तंगहाली में थे। प्रथम श्रेणी में मैट्रिक की। इलाहाबाद से कृषि में स्नातक। अपना खर्च चलाने के लिए कोचिंग में पढ़ाने लगे। वहीं यूपी में गन्ना विकास अधिकारी बन गए। आठ साल सेवा की। बस्ती के एक गन्ना फैक्ट्री मालिक को घटतौली में जेल नहीं भेज सके तो नौकरी छोड़ दी। परिवार ने विरोध किया। मगर मैंने किसानों से कहा था कि नाइंसाफी नहीं होने दूंगा। दिल्ली जाकर यूपीएससी की तैयारी की। घरवाले तो मेरी मानसिक स्थिति पर ही शक कर बैठे। मगर पांच साल पहले पहली कोशिश में ही आईआरएस बन गए। उन्हें मलाल है, इंटरव्यू में कम नंबर मिले। वरना आईएएस होते।
हिंदी में जवाब देने के कारण इंटरव्यू में कम नंबर मिले
यूपीएससी के इंटरव्यू बोर्ड में एक मेंबर ने अंग्रेजी में सवाल पूछे मगर जवाब मैंने हिंदी में दिए। इसलिए 300 अंकों के इंटरव्यू में सिर्फ 102 अंक मिले। यदि 104 अंक मिलते तो मैं आईएएस होता। मगर मातृभाषा के लिए यह कोई बड़ी कुर्बानी नहीं है। आईआरएस के रूप में पहली पोस्टिंग 24 अप्रैल 2011 को जमशेदपुर में असिस्टेंट कमिश्नर के रूप में मिली। चार साल बाद डिप्टी कमिश्नर बनकर रांची आए। देश के दस टॉप टैक्स कलेक्टरों में अजय का नाम शुमार है। यही सोचकर फिल्म बनाने दी कि दिव्यांगों को प्रेरणा मिले।

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