ये हैं हैदराबाद के IPS सज्जनार, जिन पर उठे सवाल भी, मिले सैल्यूट भी

हैदराबाद में दिशा के गैंगरेप-मर्डर केस के चारों आरोपियों को पुलिस एनकाउंटर में मार गिराया. इसी बीच पुलिस कमिश्नर सज्जनार सोशल मीडिया पर छाए हुए हैं. उन्हें एनकाउंटर मैन के नाम से जाना जाता है. सोशल मीडिया पर जमकर उन्हें सैल्यूट किया जा रहा है साथ ही उन पर सवाल भी उठाए जा रहे हैं. खासकर महिलाएं उन्हें थैंक्यू कहते हुए सैल्यूट कर रही हैं. आइए जानते हैं कौन हैं आईपीएस सज्जना और क्यों उन्हें एनकाउंटरमैन कहा जाता है.

दिशा गैंगरेप के चारों आरोपियों ने हैदराबाद के NH-44 पर घटना के रिक्रिएशन के दौरान पुलिस हिरासत से भागने की कोशिश की और उनका एनकाउंटर हो गया. इस दौरान कमान साइबराबाद पुलिस के कमिश्नर वी. सी. सज्जनार के हाथ में थी.वह 1996 बैच के एक आईपीएस ऑफिसर हैं. जिन्हें एक सख्त पुलिस अधिकारी के रूप में जाना जाता है. वर्तमान में वह साइबराबाद पुलिस के कमिश्नर है. डेढ़ साल पहले उन्हें पूर्व कमिश्नर संदीप Shindliya की जगह पर नियुक्त किया था

डेढ़ साल पहले संभाली कमान

बता दें कि इससे पहले तेलंगाना में एक कॉलेज गर्ल पर तेजाब फैंका गया था, विवाद बढ़ने के बाद 3 आरोपियों को एनकाउंटर में ढेर कर दिया गया था। इतना ही नहीं कमिश्नर वी.जे सज्जनार कई माओवादियों के एनकाउंटर में भी शामिल रहे हैं। डेढ़ साल पहले ही हैदराबाद में बतौर पुलिस कमिश्नर वी.जे सज्जनार ने कमान संभाली थी।

2008 में वारंगल में क्या हुआ था?
बता दें कि साल 2008 में वारंगल में भी पुलिस ने इसी तरह क्राइम सीन पर ले जाकर ऐसिड अटैक के आरोपियों का एनकाउंटर किया था। आरोपी कुछ समय से एक लड़की को परेशान कर रहे थे। स्कूल से घर आते-जाते उसका पीछा करते और फब्तियां कसते। लड़की के विरोध करने से बौखलाए तीनों आरोपियों ने उस पर ऐसिड से हमला कर दिया। हमले में पीड़िता बुरी तरह झुलस गई थी। उस वक्त अविभाजित आंध्र प्रदेश में इस घटना को लेकर काफी विरोध-प्रदर्शन हुए। हालांकि एक दिन अचानक खबर आई कि पुलिस ने तीनों आरोपियों को एनकाउंटर में ढेर कर दिया है।वह एनकाउंटर मैन के नाम से जाने जाते हैं, इसके लिए वह काफी बार चर्चा में आ चुके हैं. 11 साल पहले तेलंगाना के वारंगल कॉलेज में पढ़ने वाली इंजीनियरिंग की 2 छात्राओं पर एसिड हमला हुआ था. अगर देखा जाए तो उस वक्त भी हालात में काफी समानताएं थीं. वो भी महिला हिंसा का मामला था, उस केस में भी सीन रीक्रिएशन के दौरान पुलिस एनकाउंटर में तीनों आरोपियों को ढेर कर दिया गया था. उस समय भी पुलिस की कमान उनके हाथ में थी. ये मामला 2008 का था.

tसज्जनार के पैनी नजरों से कोई भी गुनहगार नहीं बच पाया

कमिश्नर वी. जे. सज्जनार के पैनी नजरों से कोई भी गुनहगार नहीं बच पाया है. कई माओवादियों के एनकाउंटर में वह शामिल रहे हैंइससे पहले दो बड़े नक्सलियों के एनकाउंटर में भी उनका नाम आया था. ये नक्सली हैदराबाद के आउटस्कर्ट में मारे गए थे. उनके नाम नसीमुद्दीन और नईम थे. तब वो आईजी स्पेशल इंटेलिजेंस ब्रांच में थे. हैदराबाद में जैसे ही गैंगरेप में मर्डर का मामला सामने आया वो तुरंत सक्रिय हो गए. दो दिनों के भीतर चारों आरोपी पकड़े. एफआईआर दर्ज नहीं करने वाले साइबराबाद के तीन पुलिसकर्मी सज्जनार के ही आदेश पर सस्पेंड कर दिये गए..उन्होंने स्पेशल इन्वेस्टिगेशन ब्रांच (SIB), डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस (DIG)  के रूप में काम किया है.मेदक के एसपी रहते हुए उन्होंने अफ़ीम तस्कर का एनकाउंटर किया था, जिन पर पुलिस कॉन्स्टेबल की हत्या के आरोप थे.

डेढ़ साल पहले उनकी नियुक्ति कमिश्नर ऑफ पुलिस

वहीं लगभग डेढ़ साल पहले उनकी नियुक्ति कमिश्नर ऑफ पुलिस के कमिश्नर (CP) रूप में हुई है.कुछ लोग एनकाउंटर पर सवाल भी उठा रहे हैं.27-28 नवंबर की दरम्यानी रात को हैदराबाद में महिला डॉक्टर के चार लोगों ने मिलकर हैवानियत की सारी हदें पार कर जिंदा जला दिया था. इस घटना के बाद पूरे देश में आक्रोश का माहौल था. जिसके बाद लगातार मांग की जा रही थी कि दोषियों को जल्द से जल्द पर फांसी पर लटकाया जाए.वहीं हैदराबाद पुलिस एनएच-44 पर क्राइम सीन रिक्रिएट कराने ले आरोपियों को ले गई थी, जहां पर चारों आरोपियों को एनकाउंटर कर दिया था. पुलिस के मुताबिक चारों आरोपियों ने मौके से भागने की कोशिश की. पुलिस ने चारों आरोपियों को ढेर कर दिया.

पुलिस कमिश्नर वीसी सज्जनार ने इस कथित मुठभेड़ के बारे में शुक्रवार शाम प्रेस कॉन्फ्रेंस कर जो ब्यौरा दिया, उसपर लोगों को विश्वास क्यों नहीं हो रहा? और पुलिस की कहानी में वो कौनसे हिस्से हैं जिनपर सवाल उठ रहे हैं?यह समझने के लिए बीबीसी ने उत्तर प्रदेश पुलिस और केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल के पूर्व महानिदेशक प्रकाश सिंह, दिल्ली के पूर्व पुलिस उपायुक्त मैक्सवेल परेरा और तेलंगाना के वरिष्ठ पत्रकार एन वेणुगोपाल राव से बात की.

1. एनकाउंटर का समय

पुलिस कमिश्नर वीसी सज्जनार ने दावा किया कि पुलिसकर्मियों और अभियुक्तों के बीच मुठभेड़ सुबह 5.45 से 6.15 के बीच हुई.

इससे पहले उन्हीं के विभाग के एक अधिकारी ने नाम ना ज़ाहिर करने की शर्त पर बीबीसी को बताया था कि रात क़रीब 4 बजे पुलिस चारों अभियुक्तों को मौका-ए-वारदात के लिए लेकर निकली थी.

सज्जनार ने कहा कि ‘अभियुक्तों को इतनी सुबह अपराध की जगह इसलिए ले जाना पड़ा क्योंकि उनकी सुरक्षा को लेकर ख़तरा था. लोगों में उन्हें लेकर बहुत गुस्सा था.

गिरफ़्तारी के बाद से ही अभियुक्तों को धमकियां मिल रही थीं’.लेकिन पुलिस कमिश्नर की इस दलील से मैक्सवेल परेरा बिल्कुल भी सहमत नहीं हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा, “ये दलील विश्वसनीय नहीं लगती क्योंकि पुलिस दिन की रोशनी में बड़े आराम से यह काम कर सकती थी. वो अतिरिक्त पुलिस बल के साथ इलाक़े की घेराबंदी कर सकते थे. और ‘लोगों के डर’ से सज्जनार का क्या मतलब है? क्या वो ये मान रहे हैं कि भीड़ पुलिस की मौजूदगी में भी लिंचिंग कर सकती है?”

वहीं प्रकाश सिंह ने अपने समय की कुछ मुठभेड़ों और पुलिसिया छापेमारी की घटनाओं का ज़िक्र करते हुए कहा, “अंधेरे में या तड़के पुलिस की कार्यवाही का एक ही लक्ष्य होता है कि वो अपराधी को रंगे हाथ पकड़ना चाहते हैं. लेकिन यहाँ किसी को पकड़ना तो था नहीं, फिर ये वक़्त चुना ही क्यों गया? क्योंकि सीन रीक्रिएट करने का काम तो दिन में बड़े आराम से हो सकता था, बल्कि बेहतर ढंग से हो सकता था.”

जबकि वरिष्ठ पत्रकार एन वेणुगोपाल राव ‘सीन रीक्रिएट’ करने की पुलिस की दलील को ही ग़ैर-ज़रूरी और बोगस मानते हैं.

वो कहते हैं, “पुलिस ने कहा कि ये चार लोग ही अभियुक्त हैं और जनता ने उनकी बात पर विश्वास किया. इसकी कोई न्यायिक जांच नहीं हुई. पुलिस ने एक सप्ताह पहले प्रेस रिलीज़ जारी कर ये दावा किया था कि चारों ने जुर्म कुबूल कर लिया है. पुलिस ने तो ये दावा भी किया था कि चारों ने कैमरे पर सारे डिटेल बताए हैं. और जब चारों ने कथित तौर पर लिखित में अपना जुर्म कुबूल कर लिया था तो फिर उन्हें मौक़े पर ले जाकर ये जाँच क्यों हो रही थी? वो भी अंधेरे में.”

2. पुलिस की तैयारी

पुलिस ने मोहम्मद उर्फ़ आरिफ़, जोलू नवीन, चेन्न केशावुलू और जोलू शिवा, बीस से 24 वर्ष की आयु के चार अभियुक्तों को 29-30 नवंबर की दरमियानी रात में गिरफ़्तार किया था जिसके बाद उन्हें चेल्लापली मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया.

पुलिस कमिश्नर सज्जनार के अनुसार दो दिसंबर को साइबराबाद पुलिस ने शादनगर कोर्ट में याचिका दायर कर चारों अभियुक्तों की कस्टडी मांगी थी.

4 दिसंबर को इन्हें पुलिस कस्टडी में भेजा गया. 4-5 दिसंबर, यानी दो दिन इन चारों से पूछताछ की गई.

सज्जनार ने दावा किया, “पूछताछ के दौरान इन लोगों ने बताया था कि पीड़िता का फ़ोन, घड़ी और पावर बैंक उन्होंने अपराध की जगह पर छिपाए थे. हम लोग उसी की तलाशी के लिए घटनास्थल पर आए थे. दस पुलिसकर्मियों की एक टीम अभियुक्तों को घेरे हुए थी और चारों अभियुक्तों के हाथ खुले हुए थे.”

पुलिसकर्मियों के अधिकारों पर खुलकर बात करने वाले मैक्सवेल परेरा शीर्ष अदालत के एक आदेश को ‘अव्यवहारिक’ बतलाते हुए कहते हैं कि “सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि पुलिस बिना न्यायिक अनुमति के अभियुक्तों के हाथ में हथकड़ी ना लगाए.”

”पूरी दुनिया में किसी अन्य देश में ऐसे आदेश नहीं हैं. इस नज़र से देखें तो भारत में अभियुक्तों को कथित तौर पर सबसे अधिक मानवाधिकार मिले हुए हैं जो कुछ मौकों पर पुलिस के लिए मुसीबत बनते हैं. कोर्ट कहता है कि पुलिसकर्मी अभियुक्त का हाथ पकड़कर चलें, उन्हें हथकड़ी ना लगाएं.”

”तेलंगाना पुलिस अपने बचाव में इसी आदेश का हवाला देगी. मगर कोर्ट ने कुछ विशेष परिस्थितियों में पुलिस जाँच अधिकारी को कई महत्वपूर्ण अधिकार दिये हुए हैं और इस केस में उन अधिकारों को प्रयोग करने की इच्छाशक्ति दिखाई नहीं देती.”

प्रकाश सिंह सुप्रीम कोर्ट के इसी आदेश का हवाला देकर कहते हैं, “ऐसे मौक़ों पर जाँच अधिकारी लीड करता है. वो सबकुछ रिकॉर्ड करता है. अगर वो चाहे कि अभियुक्तों को हथकड़ी लगानी है, क्योंकि पुलिस बल कम है या अभियुक्त पुलिस पर भारी पड़ सकते हैं, तो ऐसे विशेष मौक़ों पर जाँच अधिकारी हाथ बांधने का फ़ैसला ले सकता है. हालांकि इसके लिए उन्हें वरिष्ठ अधिकारी से जायज़ कारण बताकर अनुमति लेनी होती है और डायरी में उसे दर्ज करना होता है.”

वो कहते हैं, “इस केस में पुलिस के पास सारे कारण थे. अभियुक्तों पर गैंगरेप और हत्या का आरोप था. उनके हाथ बांधे जा सकते थे. लेकिन कोर्ट के आदेश की मूल भावना को समझे बिना, तेलंगाना पुलिस ने ऐसा क्यों होने किया, इसका जवाब उन्हें जाँच में देना होगा.”

कमिश्नर के बयानों से ये साफ़ है कि अभियुक्तों पर भौतिक दबाव बनाए पुलिस ने इन चारों अभियुक्तों को 30 नवंबर को गिरफ़्तार किया था जिसके बाद उन्हें चेल्लापली मजिस्ट्रेट के सामने भेजा गया था.

पुलिस कमिश्नर वीसी सज्जनार के अनुसार 4 दिसंबर को इन अभियुक्तों की पुलिस हिरासत मिली थी.

4-5 दिसंबर, यानी दो दिन तक इन चारों से पूछताछ की गई. सज्जनार ने दावा किया, “पूछताछ के दौरान इन लोगों ने बताया था कि पीड़िता का फ़ोन, घड़ी और पावर बैंक उन्होंने अपराध की जगह पर छिपाए थे. हम लोग उसी की तलाशी के लिए घटनास्थल पर आए थे. दस पुलिसकर्मियों की एक टीम अभियुक्तों को घेरे हुए थी और चारों अभियुक्तों के हाथ खुले हुए थे.”

पुलिसकर्मियों के अधिकारों पर खुलकर बात करने वाले मैक्सवेल परेरा शीर्ष अदालत के एक आदेश को ‘अव्यवहारिक’ बतलाते हुए कहते हैं, “सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि पुलिस अभियुक्तों के हाथ नहीं बांध सकती. पूरी दुनिया में किसी अन्य देश में ऐसे आदेश नहीं हैं. इस नज़र से देखें तो भारत में अभियुक्तों को कथित तौर पर सबसे अधिक मानवाधिकार मिले हुए हैं. लेकिन यह पुलिस के लिए यह एक बड़ी मुसीबत है.”

”कोर्ट कहता है कि पुलिसकर्मी अभियुक्त का हाथ पकड़कर चलें, उन्हें हथकड़ी ना लगाएं. पर कोर्ट ने पुलिस जाँच अधिकारी को कई अधिकार दिये हुए हैं और इस केस में उन अधिकारों को प्रयोग करने की इच्छाशक्ति दिखाई नहीं देती.”

प्रकाश सिंह कोर्ट के आदेश का हवाला देकर कहते हैं, “ऐसे मौक़ों पर जाँच अधिकारी लीड करता है. वो सबकुछ रिकॉर्ड करता है. अगर वो चाहे कि अभियुक्तों को हथकड़ी लगानी है, क्योंकि पुलिस बल कम है या अभियुक्त पुलिस पर भारी पड़ सकते हैं, तो ऐसे विशेष मौक़ों पर जाँच अधिकारी हाथ बांधने का फ़ैसला ले सकता है. हालांकि इसके लिए उन्हें वरिष्ठ अधिकारी से जायज़ कारण बताकर अनुमति लेनी होती है और डायरी में उसे दर्ज करना होता है.”

वो कहते हैं, “इस केस में पुलिस के पास सारे कारण थे. अभियुक्तों पर गैंगरेप और हत्या का आरोप था. उनके हाथ बांधे जा सकते थे. लेकिन कोर्ट के आदेश की मूल भावना को समझे बिना, तेलंगाना पुलिस ने ऐसा क्यों होने दिया, इसका जवाब उन्हें जाँच में देना होगा.”

”कमिश्नर के बयानों से ये साफ़ है कि अभियुक्तों पर भौतिक दबाव बनाए रखने के लिए पुलिसवालों की जितनी तैयारी होनी चाहिए थी, वो नहीं थी. ऐसे में फ़ायर करने की नौबत आ जाये, इसका जिम्मेदार कौन है?”

” इसके लिए पुलिसवालों की जितनी तैयारी होनी चाहिए थी, वो नहीं थी. ऐसे में फ़ायर करने की नौबत आ जाये, इसका जिम्मेदार कौन है?”

3. मुठभेड़ का दावा

मैक्सवेल परेरा पुलिस कमिश्नर सज्जनार के उस दावे को भी संदिग्ध मानते हैं कि ‘चारों अभियुक्तों ने डंडे और पत्थरों से पुलिस पर हमला किया और दो पुलिसकर्मियों से हथियार छीन लिये जिसकी वजह से पुलिस को जवाबी कार्रवाई करनी पड़ी’.

वो कहते हैं, “पुलिस हिरासत में चल रहे अभियुक्तों को डंडे और पत्थर मिल कहाँ से गए? चार अभियुक्तों पर दस पुलिसकर्मी कोई कम संख्या नहीं है जो उनके हथियार छिन जाएं. और अगर ऐसा हुआ है जिसे पुलिस अपनी कहानी में मान भी रही है, तो सीनियर अधिकारियों पर इसे लेकर गंभीर सवाल उठते हैं.”

प्रकाश सिंह भी यह बात हज़म नहीं कर पाए कि दो अभियुक्तों ने पुलिस से हथियार छीन लिए होंगे. वो कहते हैं, “ये पुलिसकर्मी हैं या तमाशा. कैसे 20 वर्ष के लड़के आपसे पिस्टल छीन सकते हैं. ऐसी किसी ड्यूटी पर तो अतिरिक्त सावधानी रखनी होती है. पुलिस ने क्यों नहीं बताया कि उन लड़कों ने पिस्टल छीनने के बाद कितने राउंड फ़ायर किये?”

जबकि वेणुगोपाल इस संबंध में एक अलग ही पहलू पर बात करते है. वो कहते हैं, “ये क्रिमिनल थे, इसमें कोई शक़ नहीं. लेकिन चारों अभियुक्त बहुत तनाव में थे. इनकी उम्र 20 के आसपास थी. ऐसी रिपोर्टें हैं जिनमें कहा गया कि जेल में उन्हें खाना नहीं दिया गया. जिस बैरेक में उन्हें रखा गया वहाँ अन्य क़ैदियों ने उन्हें पीटा. लोग कह रहे थे कि इन्हें वकील नहीं मिलना चाहिए. दो दिन से वो न्यायिक हिरासत में थे. ऐसे में ये बड़ा असंभव लगता है कि इन चारों ने दस हथियारबंद पुलिसवालों के सामने कोई हरक़त की होगी.”

वो कहते हैं, “चारों अभियुक्तों को ये ज़रूर पता होगा कि वो पुलिस से बचकर भाग भी गए तो भीड़ उन्हें ज़िंदा जला देगी. ऐसे में वो पुलिस से बचने की कोशिश करेंगे ही क्यों?”

4. ‘घायल’ पुलिसकर्मी

वीसी सज्जनार ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस में दावा किया कि चारों अभियुक्तों को ढेर करने में पुलिस को क़रीब दस मिनट लगे. यानी खुले मैदान में इस दौरान अभियुक्तों और पुलिस के बीच क्रॉस-फ़ायरिंग होती रही.

जिसका अंत ये हुआ कि चारों अभियुक्तों की गोली लगने से मौत हो गई. लेकिन एक भी पुलिसकर्मी को गोली ने नहीं छुआ.

पुलिस कमिश्नर के अनुसार इस मुठभेड़ में दो पुलिस अधिकारी घायल हुए जिन्हें स्थानीय अस्पताल में भर्ती कराया गया क्योंकि उनके सिर में चोट है जो डंडे या पत्थर से लगी है.

दिल्ली के पूर्व पुलिस उपायुक्त मैक्सवेल परेरा कहते हैं, “पुलिस कमिश्नर का ये बयान बहुत शर्मनाक और ग़ैर-पेशेवर है. ये बिल्कुल यूपी स्टाइल है. जब मैं दिल्ली पुलिस में था तब यूपी के अपराधी दिल्ली में आकर सरेंडर करते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि यूपी पुलिस सरेंडर करने पर भी उन्हें गोली मार देगी. देश का क़ानून अपराधियों को भी अपनी दलील देने का अधिकार देता है और इससे उन्हें वंचित नहीं किया जा सकता.”

प्रकाश सिंह कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस के अनुसार अब इस मामले की जाँच होगी, तभी स्थिति स्पष्ट हो सकेगी क्योंकि सुनने में पुलिस कमिश्नर की ये कहानी बहुत घिसी-पिटी लगती है.

5. हर बार एक जैसी कहानी कैसे?

तेलंगाना के वरिष्ठ पत्रकार एन वेणुगोपाल राव राज्य के इतिहास का हवाला देकर पुलिस की कहानी पर सवाल उठाते हैं. वो कहते हैं कि हर बार पुलिस की कहानी में इतनी समानता कैसे होती है?

वो बताते हैं, “तेलंगाना पुलिस (पहले आंध्र प्रदेश पुलिस) का ऐसी कहानियाँ ‘सुनाने’ का इतिहास रहा है. वो इसमें बहुत निपुण हैं. 1969 के बाद से वो एनकाउंटर के ऐसे संदिग्ध किस्से सुना रहे हैं. इस तरह की मुठभेड़ों की शुरुआत नक्सलियों के ख़िलाफ़ हुई थी जिसपर सिविल सोसायटी ने कभी सवाल नहीं उठाया. लेकिन 2008-09 के बाद से पुलिस ने ये रणनीति आमतौर पर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया.”

“जब तेलंगाना का निर्माण हुआ और इस क्षेत्र में तेलंगाना आंदोलन चल रहा था तब चंद्रशेखर राव समेत अन्य टीआरएस नेताओं ने यहाँ की पुलिस पर आरोप लगाया था कि आंदोलन को दबाने के लिए पुलिस ग़लत तरीक़े अपना रही है. लेकिन जैसे ही वे पावर में आये, तो उनकी सरकार में पुलिस ने नालगोण्डा ज़िले में चार कथित मुस्लिम चरमपंथियों को वारंगल जेल से हैदराबाद कोर्ट के रास्ते में शूट किया और पुलिस ने बिल्कुल यही कहानी दुनिया को बताई. ये 2014 का वाक़या है.”

“लेकिन ये कहानी 1969 से शुरू होती है. तब आंध्र प्रदेश में पहला एनकाउंटर हुआ था. आंध्र पुलिस ने कलकत्ता से आ रहे सीपीआई (एमएल) के सात सदस्यों को रेलवे स्टेशन पर उतरते ही गिरफ़्तार किया और फिर उन्हें गोली मार दी. उस साल पुलिस ने एनकाउंटर की जो कहानी सुनाई थी, वो कहानी आज तक वैसी की वैसी है, बस पात्र, तारीख़ें और जगहें हर बार बदल जाती हैं.”

हैदराबाद डॉक्टर रेप केस का ज़िक्र करते हुए एन वेणुगोपाल राव ने कहा कि दिसंबर 2007 में साइबराबाद के पुलिस कमिश्नर और 1996 बैच के आईपीएस अधिकारी वीसी सज्जनार ने वारंगल ज़िले में एसिड अटैक के तीन अभियुक्तों को पुलिस हिरासत में इसी तरह क्राइम सीन पर ले जाकर गोली मार दी थी. इस बार हैदराबाद केस के बाद हमने देखा कि लोगों ने सोशल मीडिया पर वारंगल की कहानी लिखकर सज्जनार को चैलेंज किया और कहा कि वे अब वैसा क्यों नहीं करते?

वो बताते हैं कि 90 के दशक में चंद्रबाबू नायडू जब सत्ता में आते हैं, तब से ऐसे एनकाउंटर करने वाले पुलिस अधिकारियों को प्रमोशन दिये जाने लगे.

पर क्या सूबे में आज तक कभी किसी एनकाउंटर केस की जाँच के बाद पुलिस को दोषी पाया गया? इसके जवाब में वेणुगोपाल ने बताया, “1987-88 में एक मजिस्ट्रेट ने अपनी जाँच में पाया था कि पुलिस अफ़सर की दलीलें बेबुनियाद हैं और उन्हें सज़ा मिलनी चाहिए. तो उस मामले का अंत ये हुआ कि मजिस्ट्रेट का ट्रांसफ़र कर दिया गया. इसलिए सरकार पुलिस के ख़िलाफ़ जाएगी या निष्पक्ष जाँच को सपोर्ट करेगी, ये उम्मीद कम लगती है.”

वेणुगोपाल कहते हैं, “बीते दो सप्ताह में तेलंगाना राज्य में हैदराबाद गैंगरेप-मर्डर जैसे तीन अन्य केस हुए हैं. लेकिन अन्य दो लड़कियाँ (एक वारंगल में और दूसरा आदिलाबाद में) दलित हैं, इसलिए उनपर अधिक चर्चा नहीं हुई. और ये भी अपने आप में एक बड़ा सवाल है.”

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