महाराष्ट्र बोर्ड :12वीं की किताब में लिखा है, देश में दहेज प्रथा का कारण बदसूरत-दिव्यांग लड़कियां

महाराष्ट्र बोर्ड : पाठ्यक्रम में दहेज पर सोच शर्मनाक

प्रोफेसर के.एल.शर्मा///प्रो-चांसलर, जयपुर नेशनल यूनिवर्सिटी, जयपुर
नेशनल फैलो, आई.सी.एस.एस.आर., आई.डी.एस., जयपुर
पूर्व कुलपति, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर

महाराष्ट्र मेंकक्षा 12वीं के लिये समाजशास्त्र की पाठयपुस्तक में दहेज प्रथा की अविवेकपूर्ण अपरिपक्व व्याख्या की गई है, जो बेहद चिंताजनक है। महाराष्ट्र राज्य के स्कूल बोर्ड को ऐसे विचार के लिये दोषी माना जाना चाहिये। दहेज का कारण लड़कियों का कुरूप होना या फिर उनका दिव्यांग होना कहा गया है। इस सोच पर बोर्ड के अलावा एेसा लिखने वाले समाजशास्त्र के लेखक की सोच पर शर्म आती है। अंग्रेजी के एक बड़े समाचार पत्र ने इस सम्पूर्ण प्रकरण का पटाक्षेप करके एक महत्वपूर्ण सकारात्मक भूमिका अदा की है। बोर्ड और लेखक के बचाव द्वारा इतनी बड़ी नासमझी को दबाने का प्रयास समाज पर कुठाराघात होगा। एनसीईआरटी के लिये 1987 में 12वीं के लिये भारतीय समाज नामक पुस्तक मे मैंने एक अध्याय दहेज प्रथा पर लिखा था। उसमें था कि प्रारम्भ में दहेज भेंट (गिफ्ट और प्रजेन्ट) देने की संस्था थी। कालान्तर में यह कठोर प्रथा बन गई। इसके परिणाम स्वरूप बालिका हत्या, आत्महत्या, बहू को जलाने और अन्य असम्मानजनक अत्याचार दुराचार जैसी घटनाएं होने लगीं।
दहेज अभी भी गम्भीर सामाजिक बुराई बनी हुई है। इसके कारण विवाह के नियम, विशेषतः अन्तःजातीय विवाह और गोत्र-बहिर्विवाह, और अनुलोम और प्रतिलोम की गलत व्याख्या और दुरूपयोग हैं। क्योंकि इन नियमों द्वारा विवाह के लिये लड़के का चयन सीमित हो जाता है। लड़के उसके परिवार को लड़की उसके परिवार से श्रेष्ठतर समझा जाता है। अनुलोम, अर्थात लड़का उसके परिवार को लड़की उसके परिवार से उच्च मानना दहेज को प्रोत्साहित करता है। आज दहेज, एक ‘भेंट’, एक ‘पारस्परिक भेंट’, ‘आदान-प्रदान’ या ‘पारस्परिक प्रतीक’ रह कर, एक सौदे का स्वरूप है। माता-पिता अपने पुत्र का ‘मूल्य’ लगाते हैं। पुत्री के माता-पिता एक ग्राहक या खरीदार के रूप में अपने आपको प्रस्तुत करते हैं। हालांकि शास्त्रीय ग्रंथों में दहेज का उल्लेख नहीं है। इसके विपरीत वधू-मूल्य के कुछ वर्णन अवश्य हैं। दहेज प्रथा वास्तव में मध्यकाल में उभरी है। महात्मा गांधी ने कहा था कि विवाह के लिये दहेज की मांग करना अपनी शिक्षा और अपने देश का और स्त्रीत्व का अपमान करना है। ऐसे लोगों का समाज से बहिष्कार करना चाहिए। 1956 के हिन्दू उत्तराधिकार कानून के अन्तर्गत लड़कियों को पैत्रिक सम्पत्ति में समान हिस्सेदार माना है। 1961 के दहेज प्रतिबन्ध कानून के तहत दहेज गैर-कानूनी है।
दहेज प्रथा की गम्भीरता गहनता को समझने के लिये, नगरीय, ग्रामीण, जाति और परिवार की पृष्ठभूमि को जानना आवश्यक है। जनजातियों निर्धन परिवारों में दहेज नगण्य है। मातृसतात्मक समाजों में भी दहेज नहीं पाया जाता है। कुछ क्षेत्रों में दहेज अधिक है, और कुछ में कम या नही के बराबर है। दहेज प्रथा की जड़ विवाह के नियमों, जाति सोपान, पैत्रिकता, उत्तराधिकार की परम्परा, महिलाओं की निम्न प्रस्थिति, आधुनिक शिक्षा और उत्तम रोजगार आदि में निहित है। दहेज प्रथा एक जटिल सामाजिक समस्या है। इसके उन्मूलन में केवल कानून ही पर्याप्त नही है। दहेज-उत्पीड़न, हत्याओं, आत्महत्याओं, आदि के विरूद्ध लोगों को जागरूक करने की आवश्यकता है। दहेज के ठेकेदारों का सामाजिक बहिष्कार एक उपाय हो सकता है। इस सामाजिक बुराई के विरूद्ध योजनाबद्ध युद्ध-स्तर पर आन्दोलन की आवश्यकता है।

बदसूरत और दिव्यांग लड़कियां

महाराष्ट्र में 12वीं कक्षा की किताब में चौंकाने वाली बात सामने आई है। इसमें कहा गया है कि बदसूरत और दिव्यांग लड़कियां देश में दहेज प्रथा का कारण हैं।इस पाठ्य पुस्तक को महाराष्ट्र सरकार की मंजूरी मिली हुई है। 12वीं की समाजशास्त्र की किताब में ‘मेजर सोशल प्राब्लम्स इन इंडिया’ शीर्षक के तहत यह तर्क दिया गया है।’अग्लीनेस’ उपशीर्षक के तहत कहा गया है, ‘अगर लड़की कुरूप और दिव्यांग है तो उसकी शादी करना मुश्किल हो जाता है। ऐसी लड़की की शादी के लिए दूल्हे और उसके परिवार वाले अधिक दहेज की मांग करते हैं।ऐसे में लड़की के माता-पिता मांगी गई दहेज देने को विवश होते हैं। इससे दहेज प्रथा को बढ़ावा मिलता है।’किताब को लेकर हो-हल्ला मचने पर राज्य के शिक्षा मंत्री विनोद तावडे ने कहा कि उन्होंने महाराष्ट्र राज्य माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष के साथ मामले पर चर्चा की है।उन्होंने यह भी कहा कि यह मामला नया नहीं हैं। पिछले तीन वर्षों से 12वीं के छात्रों को यह पढ़ाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सरकार इससे निपटने के लिए काम कर रही है।

 

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