मप्र में शिक्षा का निजीकरण-खतरे की घंटी बज चुकी है?

वासुदेव शर्मा / वरिष्ठ पत्रकार /

क्यों जरूरी है अध्यापकों को निजीकरण के दुष्प्रभावों को जानना-

अध्यापक संघर्ष समिति के गठन के साथ ही शिक्षा का निजीकरण और उसके खतरों को गहराई से समझने की जरूरत अध्यापकों की ओर से महसूस की जाने लगी थी। 4,500 सरकारी स्कूलों को बंद कर दिए जाने और युक्तियुक्त करण के जरिए एक लाख से अधिक प्राईमरी एवं मिडिल स्कूलों के अस्तित्व को समाप्त करने जैसे फैसलों के बाद सरकार ने दलित छात्रों के लिए चल रहे छात्रावासों को निजी हाथों में देने की शुरूआत कर दी है 15 किलोमीटर की शालाओं को बंद कर उन्हें एक ही स्कूल में समाहित करने की जिस प्रक्रिया को शिवराज सिंह की सरकार अपनाने जा रही है उसके तीन खतरे हैं। पहला, ग्रामीण आबादी को शिक्षा से वंचित करना। दूसरा, सबसे अधिक रोजगार देने वाले विभाग में नौकरियों के रास्ते वंद कर देना एवं तीसरा, शिक्षकों के अतिशेष होने पर उन्हें वीआरएस जैसा विकल्प देकर घर बैठा देना। स्कूलों की संख्या कमी की ओर सरकार अचानक नही बढ़ रही है, यह निजीकरण के आखिरी चरण को जल्दी से जल्दी पूरा कर लेने की प्रतिबद्धता के तहत किया जा रहा है। जिन गांवों से शालाओं को बंद किया जाएगा, वहां निजी स्कूलों का विकल्प भी सरकार उपलब्ध कराएगी। इस तरह की प्रक्रिया शिक्षा विभाग में भले ही पहली बार अपनाई जा रही हो, लेकिन इसी तरह की प्रक्रिया को सफलतापूर्वक सरकार राज्य परिवहन निगम में लागू कर चुकी है।
इसे इस तरह समझते हैं। बात कोई 18-20 साल पुरानी है। जब राज्य परिवहन निगम के प्रबंधन ने ड्राइवरों एवं कंडेक्टरों को खराब एवं खटारा बसें थमाना शुरू कर दी थीं, कभी-कभी तो 10-15 लीटर डीजल ही दिया जाता था इस स्थिति में परिवहन विभाग की बसें गंतव्य तक पहुंचने से पहले ही सडक़ पर खड़ी हो जाया करती थीं। कभी पंचर होने के कारण, कभी इंजन में खराबी आ जाने से तो कभी डीजल के अभाव में। इस स्थिति का सारा दोष ड्राइवरों एवं कंडक्टरों के सर मड़ा जाने लगा था। एक स्थिति ऐसी आई कि आम लोग परिवहन विभाग की इस खस्ता हालत के लिए कंडक्टरों एवं ड्राइवरों को ही जिम्मेदार मानने लगे, यहां तक रोडवेज को बद किए जाने की जिम्मेदारी इन्हीं पर कुशलतापूर्वक डाल दी गई। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान एक मजेदार तथ्य यह भी रहा कि जब रोडवेज प्रबंधन ने बसों के लिए सामान खरीदना बंद कर दिया, उनके टूल बाक्स तक रखवा लिए, तभी ताबड़तोड़ चैकिंग शुरू करना शुरू की गई। रास्ते में खड़ी मिली बसों के कंडक्टर एवं ड्राइवरों पर इसके लिए कार्रवाई की जाने लगी। उस वक्त डिप्टी कलेक्टर, एसडीएम, तहसीलदार, आरटीओ से लेकर पुलिस के अधिकारी हर कोई रोडवेज की बसों की चैकिंग के लिए ही निकलता था। स्थितियां ऐसी निर्मित की गईं कि रोडवेजकर्मी वीआरएस लेने पर मजबूर हो जाए।
अब आते हैं स्कूलों की ओर। आज हर अधिकारी स्कूलों की ओर दौड़ रहा है। स्कूलों को गोद लेकर शिक्षकों पर निगरानी बढ़ाई जा रही है। कलेक्टर, एडीएम, एसडीएम, तहसीलदार, एसपी, टीआई हर किसी को स्कूल गोद लेने के सरकारी फरमान हैं अब तो खुद मुख्यमंत्री ने आओ मिल बांचे अभियान के तहत हर ऐरे-गैरे को स्कूल के अंदर जाने की परमीशन दे दी है। आओ मिल बांचे अभियान के तहत कोई जुआरी, सटोरिया, शराब माफिया नाह-धोकर स्कूल में पहुंचेगा और प्राचार्य एवं हैडमास्टर से बिना पूछे क्लास में घुसकर सीएम के अभियान को सफल बनाने में जुट जाएगा। इस अभिायन के जिन दुष्परिणामों के आने की संभावना है, उनमें पहला तो यही कि जो व्यक्ति आओ मिल बांचे के लिए जाएगा, उसकी आव-भगत नहीं की गई तो वह इसकी शिकायत करेगा। बाहरी तत्वों स्कूलों में पहुंचने से महिला शिक्षकों के लिए असहज स्थितियां निर्मित होंगी। इस तरह देखा जाए तो सीएम का आओ मिल बांचे अभियान शिक्षा माफियाओं को सरकारी स्कूलों का रास्ता बताने का अभियान है। ठीक वैसे ही जैसे बस माफियाओं को रोडवेज की हालत खस्ता करके सडक़ें दिखाई गई थीं। कभी जिन सडक़ों पर मप्र की जनता की बसें दौड़ती थीं, उन पर बस माफियाओं का कब्जा हो चुका है। आज जो स्कूल शिक्षा विभाग के हैं, वे आगे चलकर उनके हो जाएंगे, जो आओ मिल बांचे अभिायन के तहत स्कूल का रास्ता देख आए हैं।
खतरे की घंटी बज चुकी है। इसकी भयावहता को जानने और समझने की जरूरत है। इस खतरे का किस तरह मुकाबला किया जाए, इसकी जानकारी होना हर अध्यापक के लिए जरूरी है। अध्यापक संघर्ष समिति के आम कार्यकर्ताओं की ओर से शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ व्याख्यानमाला के रूप में ऐसा ही प्रयास किया जा रहा है। आईए, सामूहिकरूप से किए जा रहे इस प्रयास को सफल बनाएं और रविवार 12 फरवरी को सुबह 11 बजे से पहले गांधी भवन, भोपाल पहुंचे और मुख्य वक्ता के रूप में दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रो. संजीव कुमार एवं जीवाजी यूनिवर्सिटी के डा. ए पी एस चौहान को सुने। इनके साथ ही निजीकरण के खिलाफ लगातार संघर्ष करने वाले बीएमएस के सुल्तान सिंह शेखावत, इंटक के आर डी त्रिपाठी, सीटू के प्रमोद प्रधान एवं शिव कुमार शर्मा (कक्का) जी से इस खतरे के खिलाफ लडऩे का हुनर हासिल करें।

क्यों जरूरी है अध्यापकों के लिए सेमीनार?
उदारीकरण के बाद जनता की जरूरी सेवाओं को ही निशाना बनाया गया है। शिक्षा, स्वास्थ्य एवं परिवहन के क्षेत्र से सरकार खुद को पूरी तरह मुक्त कर लेना चाहती है, यदि सरकार इसमें सफल हो गई, तब नौकरियां तो जाएंगी ही, आने वाली पीढ़ी को नौकरियां कहां मिलेगा, यह सवाल भी नौकरियां छिन जाने से ज्यादा बड़ा है। इस संकट को तभी रोका जा सकता है, जब हमें इस खतरे की जड़ की जानकारी हो। यही जानकारियां अध्यापक हासिल करना चाहता है, इसीलिए रविवार 12 फरवरी को भोपाल के गांधी भवन में शिक्षा का निजीकरण और उसके खतरे जैसे विषयों पर राज्य स्तरीय सेमीनार आयोजित किया जा रहा है, जिसमें दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एवं शिक्षाविद् संजीव कुमार तथा ग्वालियर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डा. ए पी एस चौहान मुख्य वक्ता के रूप में व्याख्यान देंगे।
उदारीकरण की नीतियों ने किन-किन क्षेत्रों में तबाही मचाई है और किस तरह रोजगार से लगे लोगों को बेरोजगार कर घर बिठा दिया है, इसकी विस्तृत जानकारियां देने के लिए विभिन्न सरकारी विभागों एवं सार्वजनिक क्षेत्रों में काम कर रही यूनियनों के केंद्रीय श्रमिक संगठनों के प्रदेश अध्यक्षों को भी आमंत्रित किया गया है, जो सेमीनार में मौजूद अध्यापकों को उनके सामने मौजूद मुश्किलों के वास्तविक कारणों से अवगत कराएंगे। सेमीनार में आने के लिए जिन्हें आमंत्रित किया गया है उनमें भारतीय मजदूर संघ के अध्यक्ष शेखावतजी, इंटक के अध्यक्ष आर डी त्रिपाठी, एवं सीटू के अध्यक्ष प्रमोद प्रधान शामिल हैं। तीनों ही श्रमिक संगठन अपने-अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में निजीकण के खिलाफ 22 साल से लड़ रहे है। उदारीकरण की बर्बादी सिर्फ नौकरियां छीनने, नौकरियों के रास्ते बंद करने तक ही नहीं रुकी, इसके भी आगे जाकर इसने खेती और किसानों को भी बुरी तरह बर्बाद किया है। निजीकरण ने किसानों को किस तरह तबाह किया है, इसकी जानकारी अध्यापकों को प्रदेश के किसान नेता शिव कुमार शर्मा (कक्काजी) देंगे।
रविवार 12 फरवरी का सेमीनार 20 साल के अन्याय से मुक्ति का रास्ता बताने में सफल होगा। ऐसी उम्मीद इसलिए की जा सकती है कि दुनिया के किसी भी देश में अन्याय की उम्र 20 साल से अधिक नहीं रही। मप्र में निजीकरण अपनी यह उम्र पूरी कर चुका है, इसीलिए इसकी विदाई की तारीख तय होनी ही चाहिए। 12 फरवरी का सेमीनार इस दिशा में मील का पत्थर साबित होगा, ऐसा विश्वास और भरोसा इसलिए है कि सेमीनार में प्रदेश के चुनिंदा 300-400 अध्यापक नेता शिरकत करने वाले हैं। यहां से जो जानकारियां मिलेंगी, उन जानकारियों से यही अध्यापक शिक्षा विभाग को तो बचाएंगे ही, दूसरे क्षेत्रों को बचाने का रास्ता भी बताएंगे। यहां इतना याद रखना भी जरूरी है कि अंग्रेजों से मुक्ति के संघर्ष में शिक्षक ही अग्रिम पंक्ति में थे और अब उदारीकरण से मुक्ति के संघर्ष में भी शिक्षकों को ही आगे आना पड़ेगा, तभी खुद को औ आने वाली पीढ़ी के भविष्य को बचाया जा सकता है।
बिना जानकारियों के होने वाले आंदोलन भीड़ तो जुटा सकते हैं, लेकिन नतीजे हासिल नहीं कर सकते, इसीलिए जीतने के लिए जरूरी है जानकारियां, इसी दिशा में एक प्रयास है 12 फरवरी का सेमीनार। तो, आईए 12 फरवरी के सेमीनार की तैयारियां शुरू करें और 11 बजे से पहले भोपाल के गांधी भवन पहुंचे।

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