मप्र के ओपी रावत का ईमानदारी में कोई सानी नहीं -रक्षा मंत्रालय में थे तब हुई थी कार से कुचलने की कोशिश

मध्यप्रदेश केडर के भारतीय प्रशासनिक सेवा  के अधिकारी ओ पी रावत निर्वाचन आयोग में मुख्‍य निर्वाचन आयुक्‍त का पदभार संभाल लिया । श्री रावत अब तक आयोग के निर्वाचन आयुक्त थे ।श्री रावत की गिनती देश के ईमानदार आई ए एस अफसरों में की जाती है। श्री रावत मध्‍यप्रदेश कैडर के पहले आईएएस अधिकारी है, जो भारत निर्वाचन आयोग के इस सर्वोच्‍च पद पर पहुंचे। साथ ही निर्वाचन आयुक्‍त के रिक्‍त होने वाले पद पर अशोक लबासा को नियुक्‍त किया गया है। उल्लेखनीय है कि देश के मुख्‍य निर्वाचन अायुक्‍त अचल कुमार ज्‍योति का कार्यकाल 22 जनवरी को पूरा हो गया ।

श्री ओ पी रावत का कार्यकाल मात्र 11 माह का रहेगा, लेकिन उन्‍हें इस वर्ष  के अंत तक मप्र समेत आठ राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव कराने हैं। उनके 11 माह के कार्यकाल में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और कर्नाटक समेत नगालैंड, त्रिपुरा, मेघालय और मिजोरम के विधानसभा चुनाव होंगे। वे दिसंबर 2018 में सेवानिवृत्त हो जाएंगे। बता दें कि मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यकाल छह वर्ष या 65 वर्ष की आयु ( दोनों में से जो भी पहले हो) तक रहता है। श्री रावत वर्ष 2013 में केंद्र सरकार में भारी उद्योग एवं लोक उपक्रम मंत्रालय में सचिव (लोक उपक्रम) के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। इसके बाद केंद्र सरकार ने उन्हें 13 अगस्त 2015 को चुनाव आयोग में आयुक्‍त नियुक्‍त किया था।मध्य प्रदेश में जनसम्पर्क, आदिम जाति कल्याण, वाणिज्यिक कर और आबकारी विभाग सहित कई महत्वपूर्ण विभागों में अपनी सेवाएं दे चुके श्री ओपी रावत 2013 में रिटायर हो गए थे। उसके बाद उन्हें सरकार ने अगस्त 2015 में चुनाव आयोग में आयुक्त पद पर नियुक्त किया था। बता दें की हाल ही में एमपी कैडर की स्नेहलता श्रीवास्तव भी लोकसभा की पहली महिला महासचिव नियुक्त हुईं हैं। इस पद पर उनका कार्यकाल 1 दिसंबर 2017 से 30 नवंबर 2018 तक है।

नियम -कायदे के पाबंद अफसर 

ओपी रावत नियम-कायदे से काम करने वाले अफसर माने जाते रहे हैं. जो नियमानुसार है, उसे करने में कोई दिक्कत उन्हें नहीं होती. यदि काम नियमों के खिलाफ है तो रावत पर दबाव बनाकर भी काम लेना संभव नहीं होता. आईएएस की नौकरी से उनका रिटायरमेंट दिसंबर 2013 में हो गया था. वे उत्तरप्रदेश मूल के हैं. 1977 बैच के आईएएस अधिकारी श्री रावत मध्यप्रदेश में कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं.उन पर कभी भी किसी राजनीतिक दल का समर्थक होने का ठप्पा नहीं लगा. उन्होंने कांग्रेस सरकारों के मुख्यमंत्री रहे अर्जुन सिंह, मोतीलाल वोरा और दिग्विजय सिंह के साथ भी काम किया और बीजेपी सरकार के मुख्यमंत्री रहे सुंदरलाल पटवा, उमा भारती, बाबूलाल गौर शिवराज सिंह चौहान के भी प्रिय रहे हैं. सुंदरलाल पटवा जब राज्य के मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने रावत को उनकी योग्यता के आधार पर जनसंपर्क विभाग का संचालक नियुक्त किया था. बाबूलाल गौर उन दिनों जनसंपर्क विभाग के मंत्री थे. गौर, रावत की कार्यशैली से काफी प्रभावित रहे हैं. उमा भारती के बाद गौर राज्य के मुख्यमंत्री बने. वे रावत को अपना प्रमुख सचिव बनाकर मुख्यमंत्री सचिवालय में ले आए. रावत के कारण ही राज्य की गौर सरकार कभी विवादों में नहीं आई. गौर, सभी महत्वपूर्ण फैसले रावत से राय लेने के बाद ही करते थे.

रावत को अपने पूरे सेवाकाल में थोड़ी सी असुविधा उमा भारती के मुख्यमंत्री रहते हुई. उमा भारती ने रावत को एक्साइज कमिश्नर नियुक्त किया था. यह पद कमाई वाला पद माना जाता है. रावत इस पद को स्वीकार नहीं करना चाहते थे. उमा भारती से उन्होंने ट्रांसफर कैंसिंल करने का आग्रह किया. लिखित में भी आग्रह किया. उमा भारती ने वादा करके भी आर्डर कैंसिल नहीं किया. मजबूरन ओपी रावत को एक्साइज कमिश्नर का पद स्वीकार करना पड़ा. एक्साइज कमिश्नर के तौर उन्होंने शराब की दुकानों की नीलामी लॉटरी के जरिए करने की नीति को लागू किया. इसके कारण राज्य की रिकॉर्ड आबकारी आय हुई.

रक्षा मंत्रालय की पदस्थापना थी  काफी चुनौतीपूर्ण

ओपी रावत के लिए रक्षा मंत्रालय की पदस्थापना काफी चुनौतीपूर्ण रही है. रक्षा मंत्रालय में वे मई 93 से जून 98 तक पहले संचालक फिर ज्वाइंट सेक्रेट्री रहे हैं. हथियारों की खरीदी का महत्वपूर्ण काम वे देखते थे. इस दौरान उनके साथ दो अप्रिय घटनाएं घटित हुईं. एक घटना में उनकी कार को कुचलने की कोशिश की गई. दूसरी घटना लोधी रोड पर टहलते वक्त अचानक एक पेड के गिर जाने की है. इस घटना में रावत और उनकी पत्नी मंजू रावत को गंभीर चोटें आईं थी. दिल्ली के एम्स में उनका इलाज चला. मामले की जांच में यह तथ्य सामने आया कि रक्षा सौदे की एक फाइल पर निगेटिव नोट के चलते प्रभावित कंपनी ने रावत को रास्ते से हटाने की कोशिश की थी. रावत के फर्जी हस्ताक्षर से डिफेंस सप्लाई का एक फर्जी आर्डर भी तैयार किया गया था.कार एक्सीडेंट के बाद ओपी रावत जब तक रक्षा मंत्रालय में रहे उन्होंने सरकारी गाड़ी का उपयोग नहीं किया. हमले की आशंका हमेशा ही बनी रहती थी. वे दिल्ली में सिर्फ डीटीसी के बस से ही सफर करते थे. पी.वी. नरसिंहराव की सरकार में मध्यप्रदेश कांग्रेस के नेता सुरेश पचौरी को रक्षा मंत्रालय में राज्य मंत्री बनाया गया था. उस दौरान रावत ने मंत्रालय को चलाने में पचौरी की काफी मदद की.

वन भूमि के पट्टे दिलाने में मिला अवार्ड

मध्यप्रदेश देशभर के उन राज्यों में अग्रणी है जिन राज्यों में वन अधिकार अधिनियम का श्रेष्ठ क्रियान्वयन किया गया है. मध्यप्रदेश में इसका श्रेय ओपी रावत को ही जाता है. देश में वन अधिकार कानून वर्ष 2006 में लागू किया गया. मध्यप्रदेश में बड़ी संख्या में आदिवासी वन क्षेत्र में निवास करते हैं. कानून के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी राज्य के आदिवासी विभाग को दी गई. ओपी रावत विभाग में जून 2007 में पदस्थ किए गए. उन्होंने वन भूमि के पट्टे देने का काम तेजी से क्रियान्वित किया. उनके कार्यकाल में वन अधिकार अधिनियम के तहत एक लाख तीन हजार 28 दावों में हक प्रमाण-पत्र वितरित बांटे गए. इसके कारण मध्यप्रदेश वन अधिकार कानून के अमल में देश में पहले नबंर पर रहा. रावत को तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने अवार्ड भी दिया.

सुदीर्घ प्रशासनिक अनुभव के धनी

रावत ने अपने कैरियर की शुरूआत अविभाजित मध्यप्रदेश के सरगुजा जिले से सहायक कलेक्टर के तौर पर की. वे नरसिंहपुर और इंदौर के कलेक्टर रहे. संचालक शहरी विकास, जनसंपर्क, आयुक्त महिला एवं बाल विकास विभाग, सहकारिता विभाग, रहे हैं. कृषि, वाणिज्य एवं उद्योग, आदिम जाति कल्याण विभाग के वे प्रमुख सचिव रहे हैं. मुख्य सचिव के वेतनमान में रहते हुए सरकार ने उनकी पदस्थापना नर्मदा घाटी विकास विभाग में की थी. बाद में भारत सरकार में भारी उद्योग मंत्रालय के सचिव बन गए. उनका रिटायरमेंट भी केंद्र सरकार से ही हुआ है. रावत उन अधिकारियों में हैं, जिन्होंने रिटायरमेंट के बाद पद की मांग के लिए नेताओं के चक्कर नहीं लगाए.

निजी यात्रा को सरकारी नहीं बनाते हैं

फिजिक्स से पोस्ट ग्रेजुएट ओपी रावत के बारे में यह जानकारी कम ही लोगों को है कि वे ज्यादा सरकारी सुख-सुविधाओं के उपयोग से बचते रहते थे. जिस श्रेणी की पात्रता उन्हें है, उतनी ही सुविधाएं उन्होंने स्वीकार की. रावत ने अपनी निजी अथवा पारिवारिक यात्रा को कभी भी सरकारी यात्रा का रूप देने की कोशिश नहीं की. उनके पूरे कैरियर में केवल एक मौका ऐसा आया था, जब किसी मंत्री ने अप्रत्यक्ष तौर पर पैसे की मांग की थी.ओपी रावत केंद्र सरकार से डेप्यूटेशन से वापस लौटे तो दिग्विजय सिंह सरकार ने उन्हें ग्रामीण विकास विभाग का सचिव नियुक्त कर दिया. विभाग के मंत्री छत्तीसगढ़ मूल के थे. उन्होंने रावत को बंगले पर बुलाया. एक वरिष्ठ पत्रकार भी वहां मौजूद थे. उनकी मौजूदगी में ही मंत्री जी ने अपने काम के तरीके बारे में बताते हुए कहा कि मैं आईएएस अफसरों से पैसा भी लेता हूं और डांटता-फटकराता भी हूं. रावत ने दो टूक शब्दों में कह दिया कि पैसे की उम्मीद मुझसे न रखें.

अरोड़ा परंपरा के अनुसार अगले  प्रमुख हो सकते हैं 

मुख्य चुनाव आयुक्त ओम प्रकाश रावत का कार्यकाल इस साल दिसंबर में समाप्त होगा और तब मुख्य चुनाव आयुक्त के बाद सबसे वरिष्ठ आयुक्त अरोड़ा परंपरा के अनुसार चुनाव आयोग के प्रमुख हो सकते हैं.अरोड़ा अप्रैल 2021 में सेवानिवृत्त होंगे और वही मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में 2019 के लोकसभा चुनावों को देख सकते हैं.

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