मध्यप्रदेश में अब शिव-सिंधिया के दबदबे की सरकार

सोमदत्त शास्त्री///
नेतृत्व परिवर्तन की अटकलों, राजनीतिक उहापोहों और बहिरागतों के भाजपा प्रवेश से उत्पन्न असंतुलनों के बावजूद आखिरकार चतुर सुजान शिवराज सिंह चौहान अपने मंत्रिमंडल का गठन अपनी मर्जी से करने में कामयाब रहे। हालांकि अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद वे मंत्रिमंडल के 40 फीसदी कांग्रेसीकरण को रोकने में नाकाम रहे, लेकिन उन्होंने उपमुख्यमंत्री के रूप में नरोत्तम मिश्रा के प्रभावी अवतार को रोक कर साबित कर दिया कि टाइगर वाकई अभी जिंदा है। नरोत्तम मिश्रा के अलावा तुलसी सिलावट को भी उपमुख्यमंत्री का खिताब पाने की तमन्ना थी। उनके अरमानों पर भी फिलहाल तो पानी पड़ गया है। वैसे गोपाल भार्गव को भी वे बाहर रखना चाहते थे लेकिन भार्गव दोबारा मंत्री बनने में सफल रहे। बता दें कि नेता प्रतिपक्ष होने के बावजूद पिछली बार भी गोपाल भार्गव को मंत्री नहीं बनाया गया था। मंत्रिमंडल के विस्तार में अपवाद स्वरूप कुछ नामों को छोड़ दें तो अधिकांश ऐसे नए चेहरे हैं जो शिवराज के अनुकूल ही रहेंगे। नए मंत्रिमंडल में ज्योतिरादित्य सिंधिया की मर्जी भी खूब चली। दरअसल, सरकार बनाने में उनके अहसानों तले भाजपा इस कदर दबी हुई है कि उनकी हर मांग स्वीकार की जा रही है। हालांकि जो सिंधिया समर्थक मंत्री बन रहे हैं उन्हें विधानसभा चुनाव लड़कर अपनी सदस्यता साबित करनी होगी तभी वे मंत्री रह पाएंगे।
सरकार कायम रखने के इस खेल में भाजपा को अपने समर्पित नेताओं के अरमानों की जिस निर्ममता से बलि देनी पड़ी है वह एक इतिहास बन चुका है। शिवराज सिंह के खासुलखास रामपाल सिंह, राजेंद्र शुक्ल, संजय पाठक, पारस जैन, सुरेंद्र पटवा जैसे नेता सत्ता की देहरी पर जिस तरह हाथ मलते बैठे रह गए हैं उसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की होगी। शिवराज और विनय सहस्त्रबुद्धे इन सीनियर नेताओं को जब समझाइश दे रहे थे तब उनके पास मन मसोस कर रह जाने के अलावा कोई विकल्प शेष नहीं बचा था। यहां यह बता दें कि शिवराज सिंह मंत्रिमंडल में मंत्री पद का कोटा फुल हो गया है। नियमानुसार एक मंत्री की गुंजाइश है और दो विधायक विधानसभा अध्यक्ष-उपाध्यक्ष के रूप में एडजस्ट किए जा सकते हैं।
मंत्रिमंडल के विस्तार में कई क्षेत्र छूट गए हैं और एक तरह का असंतुलन साफ दिखाई देता है। लेकिन इस विस्तार का सारा फोकस वे विधानसभा क्षेत्र थे जहां आने वाले दिनों में उपचुनाव होना है। संयोग से उपचुनाव के अधिकांश क्षेत्र ग्वालियर-चंबल डिवीजन में आते हैं इसलिए इस क्षेत्र के तमाम नेता किसी न किसी समीकरण के तहत एडजस्ट किए गए हैं, लेकिन इस फेर में महाकौशल पूरी तरह उपेक्षित नजर आता है। इसी तरह इंदौर से कैलाश विजयवर्गीय के खास समर्थक रमेंश मेंदोला और विंध्य से संजय पाठक को बाहर रख कर कोई बेहतर संदेश नहीं दिया गया है। संयोगवश इन दोनों नेताओं पर उपचुनाव में काम करने की जिम्मेदारी आने वाली है। मालवा अंचल में कैलाश विजयवर्गीय को अपने इलाके की सीटें जिताना है। देखने की बात है कि मंत्रिपरिषद से बाहर रहे नेता अपनी जिम्मेदारी उपचुनाव के दौरान पूरी निष्ठा और लगन से निभा पाते हैं या नहीं।

नरोत्तम के अरमानों पर पानी फिरा
मंत्रिपरिषद के ताजा विस्तार में नरोत्तम मिश्रा को शिवराज सिंह ने जो झटका दिया है वह भी पोखरण विस्फोट जैसा जोर का झटका ही मानिए। नरोत्तम मिश्रा को अमित शाह का करीबी माना जाता है। मंत्रिपरिषद के विस्तार की सरगर्मी के बीच नरोत्तम मिश्रा लगातार दिल्ली में बने रहे। वे लगातार वहां नेताओं से मिलते रहे और फार्मूले भी सुझाते रहे। नए चेहरों को जगह देने का फार्मूला नरोत्तम मिश्रा का ही बताया जाता है। उनकी इस दौड़धूप में एक बात तय मानी जा रही थी कि उन्हें और सिंधिया खेमे के तुलसी सिलावट को उपमुख्यमंत्री का दर्जा मिल सकता है। लेकिन लाख कशमकश के बाद दोनों नेताओं के हाथ मायूसी ही लगी। जाहिर है कि नरोत्तम मिश्रा के लिए शिवराज का यह जोर का झटका धीरे से था।
भाजपा में बदलाव की शुरुआत
दरअसल, भाजपा के लिए आरएसएस राजनीतिक जमीन तैयार करने का काम करता है। संघ के पदाधिकारी एक विशेष कार्यशैली से काम करने के लिए जाने जाते हैं। 2018 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को मिली हार के बाद बड़े स्तर पर फेरबदल की बात सामने आई थी। आरएसएस भी यही चाहता था कि प्रदेश भाजपा में आमूलचूल परिवर्तन किया जाए। नए और युवा चेहरे विष्णुदत्त शर्मा को पार्टी ने प्रदेश अध्यक्ष बनाया। कुछ ही समय बाद प्रदेश में कमलनाथ सरकार का पतन हो गया और शिवराज चौथी बार मुख्यमंत्री बन गए। पार्टी नेताओं का मानना है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, प्रदेश संगठन और केंद्रीय नेतृत्व नए चेहरों को मौका देने के पक्ष में है। यही कारण है कि शिवराज मंत्रिमंडल का विस्तार पर एक बार फिर मंगलवार को टाल दिया गया।
शाह ने बदलाव की शुरुआत की थी
पार्टी में पीढ़ी परिवर्तन की शुरुआत भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते हुए अमित शाह ने की थी, जिसे राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष आगे ब?ा रहे हैं। शाह ने 2018 के चुनाव में ही एक सीमा रेखा खींच दी थी, जिसमें मध्य प्रदेश के वयोवृद्ध बाबूलाल गौर, सरताज सिंह, कुसुम महदेले, रामकृष्ण कुसमरिया जैसे नेताओं के टिकट कट गए थे। इसके बाद भाजपा के संगठन चुनाव हुए तो सबसे पहले मंडल अध्यक्ष के लिए 35 साल की उम्र सीमा तय की गई। इसके बाद जिलाध्यक्षों के लिए भी 50 साल की लक्ष्मण रेखा खींच दी।आरएसएस की मंशा है कि कि प्रदेश में नया नेतृत्व सामने आए और उसे काम करने का मौका मिले। सूत्रों का कहना है कि शिवराज के पिछले कार्यकाल में उन्हें मोदी की टीम में शामिल कर कृषि मंत्री बनाए जाने की चर्चा हुई थी। किन्हीं कारणों से ऐसा नहीं हुआ। प्रदेश भाजपा में लंबे समय से उपेक्षा का शिकार नेताओं में ये चर्चा है कि आखिर शिवराज कब तक। असंतुष्ट नेताओं ने अपनी बात विशेष माध्यम से आलाकमान तक पहुंचा दी है।

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