भास्कर ग्रुप के चेयरमैन रमेश चंद्र अग्रवाल का देव लोक गमन / संपन्न हुआ एक कर्मयोगी का सांसारिक सफर

सोमदत्त शास्त्री/ श्रद्धांजलि/

वे देश के 50 सबसे ताकतवर लोगों की एक सूचि में शामिल थे.रमेशजी ने भोपाल यूनिवर्सिटी से पॉलिटिकल साइंस की डिग्री ली। उन्हें पत्रकारिता में राजीव गांधी लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था। 2003, 2006 और 2007 में इंडिया टुडे ने उन्हें भारत के 50 सबसे ताकतवर लोगों की लिस्ट में शामिल किया था।रमेशजी के नेतृत्व में ही भास्कर समूह ने ऊंचाइयां हासिल की हैं। उन्होंने पिता के साथ भास्कर की नींव रखी। आज अखबार के 14 राज्यों में 62 संस्करण हैं।रमेशजी के ही नेतृत्व में समूह ने हिंदी अखबार दैनिक भास्कर, गुजराती अखबार दिव्य भास्कर, अंग्रेजी अखबार डीएनए, मराठी समाचार पत्र दिव्य मराठी, रेडियो चैनल माय एफएम और डीबी डिजिटल को मीडिया जगत में सबसे अग्रणी बनाया।

सहसा यकीन करना  मुश्किल हो रहा है कि दैनिक भास्कर के चेयरमैन, हम भोपाल वासियों के भाईसाहब और हजारों लोगों के श्रद्धा व सम्मान के  प्रतीक रमेश चंद्र जी अग्रवाल अब इस दुनिया में नहीं रहे. रमेशचंद्र अग्रवाल का 12अप्रेल को  2017सुबह रमेशजी दिल्ली से अहमदाबाद पहुंचे थे .एयरपोर्ट पर सीने में दर्द के बाद उन्हें अपोलो हास्पिटल ले जाया गया था, जहां उन्होंने अंतिम सांस ली वे 73 वर्ष के होने के बावजूद उर्जा से भरपूर और सक्रिय व्यक्ति थे . देश के 50 सबसे ताकतवर लोगों की एक सूची में शामिल थे. रमेशजी ने भोपाल यूनिवर्सिटी से पॉलिटिकल साइंस की डिग्री ली. उन्हें पत्रकारिता में राजीव गांधी लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था. दैनिक भास्कर समूह में लंबे कार्यकाल में भाई साहब के स्नेह भाजकों में मैं भी शामिल रहा. मीडिया जगत ही नहीं सामाजिक जीवन में भी बुलंदियों को स्पर्श कर लेने के बावजूद वे जिस तरह निरहंकारी और निर्लेप बने रहे उसके उदाहरण बिरले ही मिलते हैं.साहस-सादगी और अपूर्व औदार्य उनके संस्कारों में ही था, विपरीत परिस्थितियों में संघर्षों का गजब का हौसला उनमें जीवन पर्यंत बना रहा. खासकर सरकारी तंत्र के दबाव के सामने किसी जनरल की तरह डट जाना उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं थी. अपने इस दुस्साहस की कीमत बहुधा  उन्हें चुकानी  पड़ती रही . यूं तो भास्कर सन 1958 में ही भोपाल से लांच हो गया था, लेकिन 1983 में नई दुनिया के साम्राज्य को चुनौती देते हुए रमेश जी ने ही इंदौर से भास्कर का संस्करण निकालने का जज्बा दिखाया था. यही भास्कर समूह का टर्निंग प्वाइंट था. यहीं से सुधीर अग्रवाल को अपना नेतृत्व कौशल तराशने का अवसर मिला जो कालांतर में भास्कर समूह के लिए प्राण वायु बनकर सामने आया. स्वयं रमेशजी मानते थे कि चौरासी का साल भास्कर समूह के लिए अहम था, जब यूनियन कार्बाइड की गैस रिसन ने मध्यप्रदेश की राजधानी को लाशों के शहर में तब्दील कर दिया था. रमेश जी ने तब आपात बैठक बुलाकर अपने सहयोगियों से कहा था, सभी आर्मी की तरह जुटें और सत्य के रहस्योद्घाटन मे किसी भी तरह का समझौता न करें. बस फिर क्या था, एक से एक खबरें, रहस्य की परतें उजागर हुईं. यहां तक कि तत्कालीन अर्जुन सिंह सरकार ने ‘भास्कर समूहके दमन तक का फैसला ले लिया था और बाकायदा रमेशजी को बुलाकर चेतावनी तक दे डाली थी, लेकिन रमेश जी टस से मस नहीं हुए. यहां तक कि अपने पिता सेठ द्वारिका प्रसाद अग्रवाल के कुछ सुझावों को भी उन्होंने विनम्रता से ठुकरा दिया. रमेशजी के नेतृत्व में ही भास्कर समूह ने ऊंचाइयां हासिल की आज अखबार के 14 राज्यों में 62 संस्करण हैं.रमेशजी के ही नेतृत्व में समूह ने हिंदी अखबार दैनिक भास्कर, गुजराती अखबार दिव्य भास्कर, अंग्रेजी अखबार डीएनए, मराठी समाचार पत्र दिव्य मराठी, रेडियो चैनल माय एफएम और डीबी डिजिटल को मीडिया जगत में सबसे अग्रणी बनाया.

रमेशजी के निधन पर एमपी के सीएम शिवराज सिंह चौहान ने ट्वीट कर शोक जताया। उन्होंने लिखा, ”भास्कर समूह के चेयरमैन श्री रमेश अग्रवाल जी के असामयिक निधन का समाचार अत्यंत दुखदायी है। वे संवेदनशीलता, त्वरित निर्णय के लिए याद किए जाएंगे। सर्वशक्तिमान ईश्वर से श्री रमेश अग्रवाल जी की आत्मा की शांति और परिजनों को यह वज्रपात सहन करने की शक्ति देने की करबद्ध प्रार्थना करता हूं। श्री रमेश अग्रवाल जी के परिजनों और भास्कर समूह के प्रति संवेदना प्रकट करता हूं। मध्यप्रदेश ने वास्तव में अपना एक अनमोल रत्न खो दिया है।’’

रमेश जी की राजनीति में पैठ सर्वविदित है तीन तिकड़म करके कई अखबार मालिकों ने समय-समय पर राज्य सभा की कुर्सी हथियाई है. लेकिन रमेश जी ने तय कर लिया था कि भास्कर समूह का कोई प्रमोटर सीधे राजनीति में नहीं उतरेगा क्योंकि इससे अखबार की शुचिता और निष्पक्षता पाठकों के समक्ष संदिगध हो जाएगी. अक्सर वे कहा करते थे कि “हमें तो रीडर्स पार्टी के लीडर” ही बने रहने दो अखबार को आत्म निर्भर बनाने का मंत्र उन्हें अस्सी के दशक में धीरू भाई अंबानी ने दिया था कि “बिजनेस वही करो जो आत्मनिर्भर “

निडरता और जोखिम उठाने का माद्दा उनमें कूट-कूट कर  भरा था. एक बार इस लेखक को उन्होंने एक  साक्षात्कार देते हुए कहा था मुझे भोपाल में कोतवाली रोड के मकान की  वह बरसाती सदा याद रहती है जिसकी  छोटी सी कोठरी में हमारा पूरा कुटुम्ब समाया रहता. अगर कुछ हुआ भी तो उतनी जगह तो हमसे कोई नहीं छीन पाएगा. कहने का आशय यह है कि उन्होंने ऊंचाइयां पाकर भी अपनी जमीन नहीं छोड़ी थी. वे सार्वजनिक आयोजनों में हमेशा कहते थे कि लक्ष्मी घर में आनी चाहिए लेकिन उल्लू के साथ नहीं विष्णु के साथ. धर्म-कर्म में उनकी यावज्जीवन गहरी आस्था रही. धार्मिक आयोजनों, समाज सेवा के कायों में वे  बिना कुछ सोचे तन-मन-धन से इस तरह जुट जाया करते थे. मानों वे इसी के निमित्त बने हों .

. मीडिया जगत में बुलंदियों को छूकर भी जिस तरह तमाम दुनिया के लिए वे भले ही मीडिया टाइकून रहे हों, लेकिन भोपाल वासियों के लिए वे सबसे सहज उपलब्ध थे, ऐसे महापुरुष जिनसे बगैर किसी मशक्कत के राह चलते भी मिला और मदद ली जा सकती थी फिर वह चाहे विश्रामघाटों के कायाकल्प को लेकर आर्थिक सहयोग की बात हो या सामाजिक, धार्मिक आयोजन पर बैठक हो.

राष्ट्र, समाज और मीडिया जगत के लिए तो यह अपूरणीय क्षति है ही लेकिन भास्कर समूह से जुड़े हम भोपाल वासियों ने तो मानों अपना अभिभावक ही खो दिया है. उनकी निश्छल मुस्कराहट भरी ऊर्जावान प्रतिमूर्ति मानस पटल पर तैर रही है, यकीन करना मुश्किल हो रहा है कि आदरणीय रमेश चंद्र अग्रवाल अब नहीं रहे लगता है मानों कोई आकर कहेगा उनके नहीं रहने की खबर मिथ्या है. देवलोक गमन से पहले संत मुरारी बापू के श्रीमुख से निरंतर नौ दिन तक  भोपाल में तन्मयता पूर्वक रामकथा सुनकर जिस तरह उन्होंने चलते- फिरते देह विसर्जन किया यह उनके योगी होने का साक्षात प्रमाण है.

वे बारंबार इस धरा पर जन्म लें. इसी भावना के साथ उन्हे शत- शत वंदन, नमन.

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