भारी भरकम क़र्ज़ तो राष्ट्र संत भय्यू महाराज की मौत का कारण नहीं बना

इंदौर/भोपाल / विशेष प्रतिनिधि//

क्या परमार्थिक कार्यों के लिए लिया गया भारी भरकम क़र्ज़ राष्ट्र संत भय्यू महाराज की मौत का कारण बना था . तनाव के अनेक कारणों में एक वजह क़र्ज़ भी हो सकती है www.thebureaucratnews.com ने कुछ अरसा पहले इस बारे में विस्तार से खबर  दी थी . अब

जबकि राष्ट्र संत भय्यू महाराज ने स्वयम को गोली मारकर ख़ुदकुशी कर ली है तो यह तथ्य विचारणीय लगता है .दरअसल , कलियुग के दौर में सच्चे संत  परिभाषा गढ़ते-गढ़ते भय्यू महाराज कर्ज में डूब गए थे । किसानों की गरीबी दर करते -करते देश में आज जहां कई साधु-सन्त ढोंगी चोला ओढक़र दिन दूना रात चौगुना मालामाल हो रहे हैं, वहीं देश का एक संत जनकल्याण के लिए फकीर तक हो गया था । यह राष्ट्र सन्त और कोई नहीं स्वयम भय्यू महाराज थे , जो मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के किसानों की आर्थिक मदद तथा जनसेवा करते करते खुद ही कर्ज में डूब चुके थे । उनके आर्थिक हालात इस कदर बिगड़ चुके थे  कि भय्यू महाराज ने सन्यास लेने का ऐलान कर दिया था । महाराज द्वारा अचानक उठाए गए इस कदम से उनके भक्त ही नहीं, बल्कि आम से लेकर खास तक हर व्यक्ति आश्चर्यचकित था  और सभी की जुबान और मन में एक ही सवाल उठ रहा था  कि आखिर भय्यू महाराज सन्यास क्यों ले रहे हैं? जब इस घोषणा की वजह तलाशने के लिए खोजबीन की, तो सन्त की बेहद मार्मिक वेदना पता चली। आज के दौर में भय्यू महाराज जैसी शख्सियत ने जनकल्याण के लिए अपना सब कुछ लुटा दिया और किसानों की गरीबी दूर करते-करते खुद गरीब हो गए। उन्होंने गरीब किसानों को मदद के लिए महाराष्ट्र में कई संस्थाओं से लोन ले रखा है, जिसको चुकाने में वह असमर्थ थे  अब वह कोई नई योजना नहीं लाना चाहते थे ।
आज के भौतिकतावादी दौर में भी भय्यू महाराज अपने सिद्धांतों से भटके नहीं। उन्होंने कभी भी धर्म को धंधा नहीं बनाया और कर्ज लेकर भी मौत की कगार पर पहुंचे किसानों की आर्थिक मदद और जनसेवा में जुटे रहे। लेकिन आखिर कब तक कर्ज ले लेकर वह ये सब करते रहते। आम से लेकर खास और सरकार तक के संकट हल करने वाले भय्यू महाराज का जो आसमान छूता मुकाम है और जिस सेवा भाव से उन्होंने कल्याणकारी योजनाओं को शुरू किया था, उससे अलग होने की वेदना समझना आसान नहीं है। दरअसल, भय्यू महाराज के ट्रस्ट सूर्योदय परिवार की ओर से मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में गरीब किसानों और अनाथ बच्चों के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। इनमें एचआईवी पीडि़त बच्चों के नि:शुल्क इलाज और शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति जैसी योजनाएं भी शामिल हैं। इसके अलावा गरीब किसानों के लिए अनाज की व्यवस्था करना, कन्याओं के विवाह, छात्रों की छात्रवृत्ति और नदियों की सफाई, तालाबों का निर्माण जैसी कई योजनाएं शामिल हैं। इनको संचालित करने के लिए लाखों करोड़ों रुपए खर्च हो रहे हैं। ये सारे खर्च भय्यू महाराज का ट्रस्ट सूर्योदय परिवार उठाता रहा है। ट्रस्ट के पास जो दान की राशि आ रही है, उससे ज्यादा ट्रस्ट द्वारा सामाजिक हित के कार्यों में लगाया जा रहा है।
मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के किसानों के लिए सूर्यादय ट्रस्ट द्वारा चलाई जा रही योजनाओं पर लाखों रुपए खर्च हो रहे हैं। ट्रस्ट में इतना डोनेशन नहीं आता, जितना योजनाओं को संचालित करने में खर्च हो रहा है। जनकल्याण के लिए डोनेशन से ज्यादा खर्च करके ही भय्यू महाराज आज इस हालत में पहुंचे थे की जेब खाली कर डाली थी । सूर्योदय ट्रस्ट की आर्थिक स्थिति इतनी ठीक नहीं है कि वह किसानों के लिए चलाई जाने वाली योजनाओं को आगे बढ़ा सके। आज जरूरतमंद गरीब किसानों की मदद न कर पाने में असमर्थ भय्यू महाराज ने सन्त से सन्यास लेने की घोषणा क्या कर दी कि तरह तरह के कयास लगाए जाने लगे। प्रश्न उठने लगे कि क्या वह गृहस्थ जीवन छोड़ रहे हैं? क्या वह घर परिवार की जिम्मेदारी से सन्यास ले रहे हैं? जबकि यदि हकीकत में देखा जाए तो सन्त से सन्यास की परिभाषा ही अलग है। पिछले कई सालों से सूर्यादय ट्रस्ट जरूरतमंद गरीब किसानों के लिए सैकड़ों योजनाओं के माध्यम से गरीब बच्चों की पढ़ाई, किसानों के लिए बीज वितरण, तालाबों का निर्माण, नदियों की सफाई आदि समाज सेवा के कार्य कर रहा है, लेकिन आज स्थिति ऐसी है कि ट्रस्ट के पास फंड नहीं है। कई योजनाएं तो कर्ज लेकर संचालित हो रही हैं। अगर अंदर की बात करें तो उनकी मां के इलाज के लिए भी पैसे जुटा पाना उनके लिए भारी पड़ रहा था । दान क रते – करते  स्वयं गरीब होकर उनका सन्यास लेने की घोषणा करना सभ्य शिक्षित समाज के मुंह पर झन्नाटेदार तमाचा था पर लोग संकेत समझ नहीं पाए ।महाराज की कुर्सी पर बैठे भय्यू महाराज इससे पूरी तरह से टूट चुके थे । यही वजह है कि उनके सोर्सेस खत्म हो गए । आज लोग धर्म केे नाम पर नहीं, व्यवसाय के लिए ट्रस्ट में दान देना चाहते हैं। काली कमाई ट्रस्ट में दान देकर 40 फीसदी व्हाइट मनी रिटर्न करने की शर्त पर दान देना चाहते हैं, जो भय्यू महाराज को स्वीकार नहीं था । आज के दौर में लोग श्रद्धा भाव से नहीं, बल्कि बिजनेस डील के तहत दान देना चाहते हैं, लेकिन भय्यू महाराज अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करना चाहते। इसीलिए लोग उनके ट्रस्ट को दान करने से बच रहे हैं।
भय्यू महाराज अपने सोर्स और पूर्वजों की संपत्ति के दम पर अभी तक समाजहित के कार्यों में लगे रहे। इतना ही नहीं, उन्होंने समाज के दर्द को बांटने के लिए जो योजनाएं शुरू कीं, उन्हें सुचारू रूप से संचालित करने और यथावत जारी रखने के लिए करोड़ों रुपये का कर्ज भी ले रखा जब मामले की गंभीरता से जांच की, तो कुछ दस्तावेज हाथ लगे, जिनमें भय्यू महाराज ने विद्या विकास मंडल जवलेत सांगोला जिला शोलापुर संस्था के अध्यक्ष दीपक राव बापू साहेब सालुखे पाटिल से एक करोड़ पचास लाख का कर्ज अप्रैल 2012 में लिया, जिसका बाकायदा एग्रीमेंट उदय सिंह विश्वास राव देशमुख के नाम से बनाया गया। यह राशि आज तक नहीं चुकाई गई। दूसरी एक लाख की रसीद और हाथ लगी। यह राशि अनाथ बच्चों की फीस भरने के लिए भय्यू महाराज द्वारा किसी अन्य व्यक्ति से कर्ज के रूप में ली गई। अप्रैल 2012 में विद्या विकास मंडल जवले शोलापुर की संस्था से एक करोड़ पचास लाख रुपए भय्यू महाराज द्वारा कर्ज के रूप में लिए गए। कुल मिलाकर राष्ट्र संत भय्यू महाराज की आर्थिक स्थिति काफी दयनीय है। भय्यू महाराज के काफिले में चलने वाली लग्जरी गाडिय़ां भी उनकी नहीं, बल्कि दूसरों की हैं। भय्यू महाराज के खास सेवादार ने बताया कि शो रूम में जब कोई गाड़ी आती है तो बतौर डेमो के लिए गुरु जी को दी जाती है। कुछ दिन चलाने के बाद गाड़ी शो रूम को वापस कर दी जाती है। आज उनके हालात इस कदर बिगड़ गए हैं कि वह कर्जदारों को पैसा तक लौटाने मेंं असमर्थ दिख रहे हैं। इन हालात का अब वह सामना नहीं कर पा रहे हैं और इसी से आहत होकर उन्होंने संत से सन्यास लेने की घोषणा की है।

किसानों की मदद के लिए बेच दीं जमीनें

धार। जिला जेल में राष्ट्र संत डॉ भय्यूजी महाराज की प्रेरणा से सूर्योदय परिवार द्वारा बन्दी पुनर्वसन योजनांतर्गत कंप्यूटर के माध्यम से तकनीकी शिक्षा बंदियों को देना, आध्यात्मिक ऐतिहासिक सामाजिक प्रेरणादायीं पुस्तकों सहित जेल में बंद कैदियों के लिए कम्बल व महिला बंदियों को साड़िया वितरण की गई।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि कलेक्टर दीपक सिंह, पुलिस अधीक्षक बीरेन्द्र कुमार सिंह, जिला जेल अधीक्षक एसके उपाध्याय, संस्था उपाध्यक्ष अमृत पाटीदार उपस्थित थे।

भय्यू महाराज ने जनकल्याण के लिए स्वयं को पूरी तरह से उजाड़ दिया। उनकी मौजूदा स्थिति जानने के लिए जब उनके पैतृक गांव शुजालपुर और अख्तियारपुर में लोगों से बात की तो हकीकत सामने आई। गांव वालों ने बताया कि भय्यू महाराज जमींदार परिवार से हैं। उनके पूर्वजों के पास सैकड़ों बीघा जमीन हुआ करती थी। पिता के पास 2014 तक पांच सौ बीघा जमीन थी, जो अब 40 बीघा रह गई है। भय्यू महाराज ने इन जमीनों को बेंचकर लोगों की मदद में पैसा लगा दिया। 2014 तक भय्यू महाराज के नाम एक भी जमीन नहीं थी, लेकिन पिता के स्वर्गवास के बाद 40 बीघा जमीन भय्यू महाराज के नाम हो गई। भय्यू महाराज के सिद्धांतों का पता इसी से लगाया जा सकता हैकि इसके बाद और न इससे पहले उन्होंनेे किसी तरह की कोई प्रापर्टी खरीदी।

धर्म के ठेकेदारों के लिए मिसाल है सूर्याेदय ट्रस्ट
आज के भौतिकतावादी दौर में सूर्याेदय ट्रस्ट एक मिसाल है। भय्यू महाराज के ट्रस्ट की हर साल ऑडिट रिपोर्ट पेश की जाती है। भय्यू महाराज ने बहुत ही कम उम्र की आयु में अपने घर छोड़ दिया था और जिंदगी को करीब से देखने के लिए निकल पड़े थे। इसी दौरान समाज में फैले आडंबर को बहुत नजदीक से देखने के बाद उन्होंने समाज को शिक्षित करने का लक्ष्य अहद कर लिया। अपनी मेहनत और लगन से बहुत ही कम समय में राष्ट्र संत की उपाधि मिली। एक किसान परिवार से आए भय्यू महाराज गरीब किसानों के मसीहा हैं। हजारों किसान परिवारों के घर का चूल्हा उनके द्वारा ही जलता है। हजारों बच्चों को ट्रस्ट के माध्यम से शिक्षित किया जा रहा है। कई बच्चे नेशनल टॉपर हैं। अपने सरल स्वभाव और सादगी के लिए पहचाने जाने वाले भय्यू महाराज पहले ऐसे सन्त हैं, जिनके ट्रस्ट का हर साल डिकलेरेशन किया जाता है। ट्रस्ट में आए डोनेशन का लेखा जोखा पूरे व्योरे के साथ डिक्लेयर किया जाता है। ट्रस्ट को कितना डोनेेशन आया, कितना सामाजिक कार्यों में खर्च हुआ, हर चीज का लेखाजोखा पेश किया जाता है। भय्यू महाराज का पहला ट्रस्ट है, जिसका हर साल ऑडिट होता है।

क्या कहते हैं उनके पुश्तैनी कामगार 

‘‘पिछली 6 पीढ़ी से भय्यू महाराज के यहां काम कर रहे हैं। पहले इनके परिवार के पास पांच सौ बीघा जमीन थी, जिसको बेचकर इन्होंने लोगों की मदद की और इंदौर के आश्रम का निर्माण किया। आज 40 बीघा जमीन बची है, जो गुरु जी के पिता जी की मौत के बाद गुरु जी के नाम आ गई। उन्होंने आज तक जमीन का एक टुकड़ा नहीं खरीदा।
शितलिया
भय्यू महाराज का कामगार, शुजालपुर

‘‘ घर में दो गाय और दो बैल हैं। शुजालपुर और अख्तियारपुर के पैतृक घरों की हालत जर्जर हो चुकी है। बाड़े में जानवर घूमते हैं। घर की मरम्मत के लिए कई बार गुरुजी को बोल चुके हैं, लेकिन घर अभी तक नहीं बना।
पृथ्वी सिंह
सेवक शुजालपुर

 

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