ब्यूरोक्रेट्स की कार्य शैली में थोड़ा भी बदलाव कमलनाथ की कामयाबी कहलायेगी

अजय बोकिल///
मध्यप्रदेश के नए मुख्येमंत्री के रूप में कमलनाथ की बैटिंग का पहला ओवर ही चौकों-छक्कों से भरा रहा। यह बैटिंग भी दो तरफा थी। पहला तो किसी भी नए मुख्यटमंत्री की पारी के मंगलाचरण में सियासी स्वस्तिवाचकों का भारी जमावड़ा और दूसरा नई गेंद पर ही त्वरित फैसलों की केल्कुलेटेड बैटिंग। संकेत साफ है कि कमलनाथ पूरी तैयारी के साथ प्रदेश की कमान सम्हालने मैदान में उतरे हैं। बेशक आगे उन्हें और समस्याओ  की गुगलियों और बाउंसरों का सामना करना है, लेकिन एक मैसेज प्रशासन और जनता में चला गया है कि उनका नाम भले कमल की तरह कोमल हो, लेकिन वे हर घोड़े को नाथना जानते हैं।
जब भी राज्य की कमान नए मुख्यमंत्री के हाथों में आती है तो लोगों की निगाहें उसके आचरण, सदिच्छा, विनम्रता, आत्मीयता, विजन, संकल्प शक्ति और जमीनी पकड़ पर होती है। राजनीतिज्ञ, अफसरशाह और मीडिया तो नए कप्तान को अपने नजउरिए से तौलते ही हैं, जनता अपनी हजार आंखों और कानों से उसे खरे सोने सी जांचती-परखती है। इस मायने में मप्र में कांग्रेस की डेढ़ दशक बाद सत्ता में वापसी और पार्टी में अंदरूनी खींचतान के बाद नेतृत्व की बाजी कमलनाथ के हाथ लगते ही आशाअों और अपेक्षाअों के पहाड़ खड़े होने शुरू हो गए। हर आतुर निगाह यह जानने की कोशिश में थी ‍कि कमलनाथ अपनी पारी के शुरूआती अोवर किस अंदाज और तेवर के साथ खेलते हैं। लेकिन कमलनाथ का मुख्यकमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण ही जिस राजनीतिक सौजन्य, परस्पर आदरभाव, विनम्रता के साथ हुआ, वह मप्र के राजनीतिक इतिहास में एक लैंडमार्क है। ऐसा मानने की वजह मंच पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ कई विपक्षी नेताअोंकी एक साथ मौजूदगी और इसके माध्यम से संभावित महागठबंधन का संदेश देने की कोशिश भर नहीं थी, बल्कि एक घोर प्रतिद्वंद्वी एवं प्रतिपंथी राजनीतिक दल के मुख्य मंत्री के शपथ ग्रहण में सिंहासन से ताजा-ताजा उतरी पार्टी के तीन पूर्व मुख्यममंत्रियों की स्नेहिल उपस्थिति थी। अमूमन शपथ ग्रहण समारोह में गुजरे लमहों के मुख्य मंत्री आते भी हैं तो कुछ बेमन और रस्म अदायगी के भाव से। लेकिन उनके चेहरों पर कोई खुशी या संतोष का भाव नहीं होता। कमलनाथ के शपथ ग्रहण का अनूठा पहलू यही था कि चार दिन पहले प्रदेश की कमान से मुक्त हुए शिवराजसिंह ने अपनी सौजन्यता की अपनी बेस लाइन को न सिर्फ और गाढ़ा किया बल्कि नए सीएम कमलनाथ और चुनाव प्रचार के दौरान जिन ‘महाराज’ से वे माफी मांगते दिखे, उन्हीं महाराज के साथ हाथ उठाकर एकता का प्रदर्शन किया। यह एकता परस्पर सदभाव की एकता थी। और ऐसा करते समय किसी के चेहरे पर राजनीतिक कटुता की कोई ‍िशकन नहीं थी। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण था कि मप्र की राजनीतिक जमीन पर कोई भी दल खेती करे, कितने ही आरोप-प्रत्यारोप के हल चलाए, सह्रदयता और परस्पर सौजन्य की दृष्टि से यह जमीन कभी ऊसर नहीं होगी। क्योंकि यह मध्यप्रदेश और उसके बाशिंदों का मूल चरित्र है, उनकी आत्मा है।
ऐसा कैसे संभव हुआ? इस प्रश्न का उत्तर है कमलनाथ की व्यक्तिगत पहल और उनके सहयोगी तथा कांग्रेस की एकजुटता के रणनीतिकार पूर्व मुख्यथमंत्री दिग्विजयसिंह सहित कई कांग्रेस नेताअो की प्रदेश की राजनीतिक जमीन में पिछले कुछ सालों से उग आई विद्वेष और अनुदारता की हल्की खरपतवार को भी उखाड़ फेंकने की दिली ख्वारहिश। वरना कोई कारण नहीं था कि कमलनाथ के शपथ ग्रहण में बुजुर्ग नेता और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी और बाबूलाल गौर भी आते। दिग्विजय सिंह ने तो मंच पर ही कैलाशजी के पैर छुए और गौर साहब का हाथ थाम कर उन्हें उनके आसन तक ले गए। इसे महज दिखावा कहना उसकी महत्ता को कम करना होगा। ये सभी दिग्गज समारोह में इसलिए आए, क्योंकि कमलनाथ ने इस औपचारिक समारोह को एक पारिवारिक आयोजन का स्वरूप दे दिया। उन्होंने स्वयं इन सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों को आने का न्यौता दिया और शिवराज ‍‍सहित सभी ने इसे बड़े दिल के साथ ‍स्वीकार किया। जो भी हो, राजनीतिक अहंकार, वैचारिक मतभेद और कटुता को पादुकाअोंकी तरह मंदिर के प्रवेश द्वार के बाहर ही उतार देने के ऐसे प्रसंग सियासत में बिरले ही दिखते हैं।
लेकिन कोई भी राजनीतिक सौजन्य तब तक अधूरा रहता है, जब तक उसमें प्रशासनिक कुशलता का परफ्यूम न हो। यूं मप्र में सत्ता की कमान संभालते ही पहला धमाका जनहित के अहम फैसलों के साथ करने की परंपरा शिवराजसिंह चौहान ने शुरू की थी। कमलनाथ ने उसे अपनी पार्टी के ‘वचन पत्र’ की भावना के अनुरूप आगे बढ़ाने का काम पूरी निष्ठा से किया। इसी के परिणामस्वरूप नई सरकार सत्ता में आने का मंगलगान बहुप्रतीक्षित किसानों की कर्ज माफी के अधिकृत ऐलान के साथ हुआ। यह फैसला कोई लोक लुभावन फैसला नहीं है। यह किसानों की तकलीफों पर मरहम और प्रदेश की आर्थिकी की अग्नि परीक्षा लेने वाला फैसला भी है। लेकिन कमलनाथ ने बिना हिचके इस पर मुहर लगाई। सीएम के रूप में कमलनाथ के पहले चार फैसलों से यह साफ संकेत मिला कि उन्हें मप्र की जरूरतों, मुश्कितलों, क्षमताअों और मर्यादाअों का पूरा अहसास है। पूर्ववर्ती शिवराज सरकार के औद्योगिक करारनामों का हिमालय भीतर से खोखला इसलिए था कि रोजगार सृजन और भूमिपुत्रो को राज्य में ही काम मिलने की उम्मीदें ज्यादातर फाइलों के ढेर में ही गुम हो गई थीं। लिहाजा कमलनाथ ने राज्य में ‍िनवेश पर इंसेटिव की सुविधा में 70 फीसदी रोजगार मप्र के बेटे-बेटियों को देने की शर्त लगाकर फिर नई उम्मीद जगाई है। कितनी पूरी होगी, यह देखने की बात है। लेकिन नए मुख्य मंत्री का हाथ सही नब्ज पर गया है, इसमें दो राय नहीं। बेटियों की शादी के लिए सरकारी सहायता की राशि बढ़ाकर 51 हजार करना ‘बेटी बढ़ाअो’ योजना का ही विस्तारित रूप है। अगर गरीब को बेटी के हाथ पीले करने के लिए नकद पैसा सही समय पर सरकार से मिल जाए तो किसी भी बेटी के बाप के लिए इससे बड़ा शगुन कोई हो नहीं सकता। कमलनाथ की पहली चार ‘आज्ञाअों’का चौथा बिंदु अफसरशाही को नियमों के बजाए व्यवस्था परिवर्तन की हिदायत है। हालांकि यह शेर को ‍िशकार की बजाए चारा चरने के लिए प्रेरित करने जैसा है, लेकिन ब्यूरोक्रेट्स की कार्य शैली और मानस में इसमें थोड़ा भी बदलाव जनता को महसूस हो तो उसका संदेश बड़ा जाएगा।
बेशक यह सत्ता की सप्तपदी का पहला वचन है। अभी तो कई कदम चलने हैं। जो फर्क कानों में गूंज रहा है, वो यह कि अभी तक मप्र का जनमानस कमल को एक राजनीतिक सिंबल के रूप में चीन्हने और महसूसने का आदी हो चुका था। इस पहचान को कमल के नैसर्गिक भाव यानी शुचिता, सुंदरता, बड़प्पन, वैभव और अनुग्रह को प्रबंधन और प्रशासनिक पकड़ की चाबी से प्रशासनिक में तब्दील करने का काम कमलनाथ ने शुरू कर दिया है। यूं लीडरशिप और मैनेजमेंट स्किल दो अलग अलग बाते हैं। लेकिन दोनो का संयोजन एक ही व्यक्तित्व में हो तो परिस्थितियां खुद ‘कमलनाथ’ बन जाती हैं।

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