बिहार के शक्तिशाली आईएएस , जिन पर नीतीश को मंत्रियों से ज्यादा भरोसा

दीपक मिश्रा ///बिहार में जब 2005 में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने सत्ता संभाली, तब भाजपा विधायक भोला सिंह, जो बाद में बेगूसराय के सांसद के बने, उन्होंने नीतीश से कहा वह अच्छे चीफ सेक्रेटरी बना सकते हैं. लेकिन एक अच्छा मुख्यमंत्री नहीं.यह सीएम नीतीश कुमार का सिविल सेवकों के प्रति अप्रत्यक्ष झुकाव के संदर्भ में था और जद (यू) और उनकी पार्टी में साथियों के विरोध में.

2014 में 7 महीने को छोड़कर उन्होंने 14 वर्षों से लगातार सत्ता संभाली है. नीतीश की कार्यशैली में थोड़ा बदलाव आया है- मुख्यमंत्री ने राजनेताओं के बजाय उनके प्रति वफादार रहने वाले सिविल सेवकों पर ज्यादा भरोसा करना जारी रखा है. अधिकारियों ने बताया कि इन 14 वर्षों में कुछ सिविल सेवक 14 वर्षों से अपने पदों पर बने हुए हैं. नतीजतन, एक शक्तिशाली गुट का राज्य के मंत्रियो पर वर्चस्व है, यहां तक ​​कि अन्य अधिकारी भी इस कोटरी का हिस्सा नहीं हैं.उदाहरण के लिए योजना और विकास राज्य मंत्री महेश्वर हजारी के मामले को देखें. सितंबर तक हजारी के पास आवास मंत्रालय था, लेकिन उनके विभाग के सचिव चंचल कुमार के साथ मतभेद थे, जो कि 1998-99 में रेल मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक नीतीश के साथ रहे हैं. महेश्वर हजारी को शिफ्ट कर दिया गया लेकिन चंचल अपने पद पर बने रहे.

2016 में आईएएस अधिकारी सुधीर राकेश ने अपने कागजात रखे और स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना (वीआरएस) का विकल्प चुना. वहीं कुमार, एक ऐसे अधिकारी के रूप में जाने जाते हैं जो कि मुख्य चुनाव आयुक्तों के भरोसेमंद थे (उन्हें पश्चिम बंगाल में चुनाव कराने का प्रभार दिया गया था), उन्होंने अपने फैसले के लिए व्यक्तिगत कारणों का हवाला दिया था.

एक सेवारत आईएएस अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, सभी जानते हैं कि सुधीर ने सीएम कार्यालय में एक कनिष्ठ आईएएस अधिकारी के हठी व्यवहार के कारण पद छोड़ दिया, जिन्होंने जोर देकर कहा कि वह सीएम की समीक्षा बैठक के लिए तैयार की गई एक नकली प्रजेंटेशन दिखाते हैं.

सीएम नीतीश कुमार के ताकतवर अफसर

नीतीश सरकार के पास आईएएस अधिकारियों का एक समूह है, जो एक दशक से अधिक समय से उनके नीति-निर्धारण के केंद्र में हैं. मुख्यमंत्री ने उनमें से कुछ को सेवानिवृत्त होने के बाद भी या तो आधिकारिक क्षमता में या अपनी पार्टी के माध्यम से अपने पास रखा है.बिहार की पूर्व मुख्य सचिव अंजनी सिंह को 2018 में सेवानिवृत्त होने पर मुख्यमंत्री का सलाहकार नियुक्त किया गया था. वह एक बहुत शक्तिशाली सिविल सेवक थीं, जिन्हें नीतीश का का करीबी (ताकतवर) माना जाता है. पूर्व आईएएस अधिकारी आरसीपी सिन्हा भी बहुत शक्तिशाली अधिकारी थे, सेवानिवृत्त होने के बाद उन्हें जद(यू) से राज्यसभा सांसद बना दिया गया.

एक मज़बूत सिविल सेवकों में अमीर सुभानी शामिल हैं, जो एक दशक से अधिक समय से गृह विभाग का नेतृत्व कर रहे हैं. जब बिजली की कनेक्टिविटी सुनिश्चित करने या सड़कों के निर्माण जैसे बुनियादी ढांचे की बात होती है, तब आईएएस अधिकारी प्रतय अमृत का नाम आता है.एक अन्य आईएएस अधिकारी जिस पर नीतीश निर्भर हैं, वो हैं आनंद किशोर, जिन्हें हाल ही में पटना के जल निकासी प्रणाली को सुधारने के लिए शहरी विकास विभाग में स्थानांतरित किया गया था, क्योंकि पिछले महीने भारी बारिश के बाद नीतीश सरकार ने राजधानी में जलप्रलय को जिस तरह से संभाला था, उसकी वजह से सरकार को विरोध का सामना करना पड़ा था.

आलोचकों का कहना है कि एक आईएएस अधिकारी को एक पद पर बनाए रखने की प्रवृत्ति ‘खतरनाक’ होती है.

राजद विधायक आलोक कुमार मेहता ने कहा, एक पद पर किसी एक अधिकारी का लंबे समय तक रहना निरंकुशता को जन्म देता है. यह एक खतरनाक प्रवृत्ति है, जिसमें अधिकारियों को राज्य के बजाय एक राजनेता के साथ पहचाना जाता है.मेहता ने कहा, ‘सत्ता के साथ पहचाने जाने वाले कई अधिकारियों को सत्ता बदलने पर दंडित किया जाता है. यह बेहतर होगा कि स्थानान्तरण नियमित हो और निष्ठा के बजाय काबिलियत के आधार पर हो.’बिहार और झारखंड के पूर्व मुख्य सचिव वीएस दूबे ने दि प्रिंट को बताया कि नौकरशाही के लिए यह बुरा है.

दूबे ने कहा, ‘एक नौकरशाह के रूप में आप से न्यूट्रल होने की उम्मीद कि जाती है लेकिन पिछले कुछ वर्षों में अधिकारी मुख्यमंत्री के प्रति अधिक निष्ठावान होने में लगे हैं और यह मायने नहीं रखता है. ये अधिकारी कभी-कभी ऐसा व्यवहार करते हैं मानो वे भगवान हों.’

एक सेवारत आईएएस अधिकारी ने कहा, ‘यह भी नहीं कहा जा सकता है कि वे सभी अक्षम हैं, उनमें से कई अच्छा काम करते हैं, लेकिन अन्य अधिकारियों पर भी उनका प्रभाव पड़ता है.जिस प्रकार अधिकारी पदोन्नत होते हैं, उस पर आलोचक सवाल उठाते हैं. एक अन्य सेवानिवृत्त अधिकारी ने कहा, ‘ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) को उसी क्षेत्र में आयुक्त के रूप में पदोन्नत किया गया है.’ आयुक्त जैसा कि डीएम द्वारा लिए गए निर्णयों की समीक्षा करते हैं. व्यावहारिक रूप से आयुक्त अपने स्वयं के निर्णय की समीक्षा करेंगे. ऐसा नहीं किया जाना चाहिए था.हालांकि, जदयू के मंत्री श्याम रजक ने मुख्यमंत्री का बचाव करते हुए कहा कि यह प्रवृत्ति स्थिरता प्रदान करती है.उन्होंने कहा, ‘लंबे समय तक एक पद पर रहने वाले अधिकारी वास्तव में सरकार को काम करने में मदद करते हैं. ‘यह केवल विभाग में स्थिरता और काम करने में मदद करता है और विश्वास एक महत्वपूर्ण कारक है जो कि राजनीतिक वर्ग और कार्यकारी के बीच होना चाहिए.

*दि प्रिंट से साभार 

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