बतौर अमेरिकी राष्ट्रपति दुनिया को क्या दिखाना चाहते हैं डोनाल्ड ट्रम्प

बात आगे बढे उससे पहले उनके दो फोन कॉल को समझना जरूरी है, जिनसे सहयोगियों के साथ संबंधों पर असर पड़ेगा-

पहला : ट्रम्प ने सबसे पहले मैक्सिको (तीसरा बड़ा कारोबारी सहयोगी) को निशाने पर लिया। वहां के राष्ट्रपति एनरिक निएतो ने ट्रम्प प्रशासन से बात करनी चाही, तो व्हाइट हाउस के अधिकरियों ने साफ कह दिया कि वे मैक्सिको सीमा पर दीवार बनाने के लिए पैसों की व्यवस्था का प्लान लेकर ही आएं। शायद इसमें वहां से आयतित वस्तुओं पर अतिरिक्त टैक्स लगाने की बात शामिल थी। यह बात सुनने के बाद निएतो के लिए वाशिंगटन यात्रा रद्‌द करने के सिवाय कोई विकल्प नहीं था। निएतो से बातचीत में ट्रम्प ने मैक्सिको सीमा पर ऐसी सेना तैनात करने की धमकी दे डाली थी, जो उधर से आने वाले ‘खराब लोगों’ से सीमा की रक्षा करेगी। बाद में ट्रम्प के सहयोगियों ने कहा कि वह तो मात्र मजाक था।
दूसरा : ट्रम्प ने ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री मैल्कम टर्नबुल को भी निशाने पर लिया। टर्नबुल और बराक ओबामा के बीच अच्छी बातचीत होती रही है और ऑस्ट्रेलिया भी अमेरिका के घनिष्ठ सहयोगियों में से एक है। टर्नबुल और ओबामा ने 20 जनवरी के पहले शरणार्थियों को ऐसे द्वीप पर बसाने पर सहमति जताई थी, जिस पर ऑस्ट्रेलिया का नियंत्रण था। ट्रम्प उन्ही टर्नबुल पर फूट पड़े। इस बातचीत के अगले दिन कोई अफसोस नहीं जताया गया। यह ऐसे देश की बात थी, जिसने इराक, अफगानिस्तान युद्ध और खुफिया मामलों में बिना सवाल किए अमेरिका की हर बात मानी। इस फोन कॉल के बारे में उन्होंने कहा- ‘क्या मैंने ज्यादा सख्ती दिखाई? इसकी बिल्कुल फिक्र करने की जरूरत नहीं है’।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और उनके प्रशासन ने अगर ऐसा ही झगड़ालू रवैया अपनाना जारी रखा, तो बहुत जल्द घनिष्ठ एवं मित्र देशों के साथ रिश्ते कड़वाहट में बदल जाएंगे। अमेरिका विरोधी नेताओं की संख्या बढ़ने लगेगी। जब वक्त आएगा, तब संभव है कि इन्हीं ट्रम्प को अपने परंपरागत सहयोगियों और मित्र देशों को सहयोग देने के लिए आग्रह करना पड़े। इसमें उन्हें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि वे उस लाइन के अंतिम छोर पर खड़े रह जाएं, जहां तक पहुंचते ही फोन कॉल अचानक बंद हो जाते हैं।

अभी तक जो दिख रहा है, उससे पता चलता है कि विदेशी संबंध निभाने को लेकर ट्रम्प झगड़ालू प्रवृति दिखाते हैं। उन्होंने अपने ‘एग्जीक्यूटिव ऑर्डर’ में भी यही प्रदर्शित किया है। उनके गलत फैसलों में सबसे ज्यादा पथभ्रष्ट फैसला सात मुस्लिम देशों के लोगों पर ‘पाबंदी’ लगाना रहा है। इससे यह प्रदर्शित होता है कि अमेरिका कहीं न कहीं कमजोर है।
ट्रम्प प्रशासन का अमेरिकी छवि पर क्या असर हो रहा है, यह जानने के लिए यूरोप में हो रहे विरोध प्रदर्शन काफी हैं। यह रैलियों के रूप में नहीं, बल्कि खबरों के प्रसारण के रूप में नजर आ रहे हैं। उदाहरण के लिए जर्मनी की मशहूर मैग्जीन स्पीगल ने डिजिटल अंक के कवर पेज पर डोनाल्ड ट्रम्प का इलस्ट्रेशन प्रकाशित किया है। उनके एक हाथ में स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी का रक्त बहता सिर है और दूसरे हाथ में बड़ा छूरा है। संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों ने इस पर फटकार भी लगाई है। राष्ट्रपति के व्यवहार का खामियाजा उन राजनयिकों को भुगतना पड़ रहाहै, जो विदेश में तैनात हैं। उनके पास कई ऐसे सवाल हैं, जिनके वे जवाब नहीं दे सकते हैं।

ट्रम्प प्रशासन के अधिकारी उनकी भाषा बोलने लगे हैं। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत निक्की हैली ने चेतावनी दी है कि उन सहयोगियों की सूची बन रही है, जिन्हें अमेरिका की जरूरत नहीं है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के शपथ वाले दिन से अबतक के वक्त को उनके प्रशासन को ‘हनीमून सीज़न’ कहा जा सकता है। इस अवधि में अभी तक विदेश नीति को लेकर कोई बड़ा संकट खड़ा नहीं हुआ है। लेकिन, विश्व नेता यह जानना चाहते हैं कि आखिर व्हाइट हाउस में चल क्या रहा है। वैश्विक मंच पर अमेरिका ही सबकी निगाह में है और खासतौर पर अमेरिका के राष्ट्रपति। लेकिन, अब ऐसा ज्यादा दिन तक नहीं चल सकता। अमेरिकी राष्ट्रपति को अपने सहयोगियों को फिर से विश्वास में लेना होगा कि अमेरिका उनके साथ है। वर्तमान दौर में सबसे ज्यादा विचलित वे देश हैं, जो अमेरिका के साथ हर मौके पर खड़े रहे हैं। राष्ट्रपति ट्रम्प को संयुक्त प्रयास करने और अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों का सामना मिलकर करने की नींव रखनी होगी।
व्हाइट हाउस स्थित अपने खूबसूरत ओवल ऑफिस में राष्ट्रपति ट्रम्प फोन पर विश्व नेताओं से चर्चा करने लगे हैं। ऐसा करते हुए उन्हें कुछ ही सप्ताह हुए हैं और उनकी बातचीत से दुनिया परेशान होने लगी है। ऐसा इसलिए क्योंकि ट्रम्प अपने सहयोगी देशों के शीर्ष नेताओं के सम्मान की भी परवाह नहीं करते हैं। फोन पर ही उनका अपमान करते हैं और मीडिया में उसकी जानकारी भेजते हैं। वे लगातार अचंभित करने वाली बातें कर रहे हैं, जो कहीं न कहीं सहयोगी देशों में गलत भावना का प्रसार कर रही है। बतौर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प को यह समझना होगा कि उनके लिए सहयोगियों का साथ बहुत जरूरी है। वे लगातार फोन पर बातचीत करके उनका अपमान नहीं कर सकते हैं।राष्ट्रपति ट्रम्प को यह भी समझना जरूरी है कि उनका प्रशासन उन ‘कोर पोजीशन’ से यूं ही नहीं हट सकता, जहां ओबामा प्रशासन ने अमेरिका को रखा था। उदाहरण के तौर पर पिछले सप्ताह ट्रम्प प्रशासन ने रूस को इस बात के लिए सतर्क किया कि वह पूर्वी यूक्रेन में अपनी भूमिका निभाने में ढिलाई न बरते। इसके अतिरिक्त ट्रम्प प्रशासन ने गाजा और फिलिस्तीनी क्षेत्र में इजरायली गतिविधियों (खासतौर पर बसाहट को लेकर) पर भी कम गौर करने के संकेत दिए।डोनाल्ड ट्रम्प बतौर अमेरिकी राष्ट्रपति दुनिया को क्या दिखाना चाहते हैं, यह वे खुद ही जानते हैं। उन्हें आए एक महीना भी पूरा नहीं हुआ और अमेरिका के उन देशों से संबंध बिगड़ने लगे, जो घनिष्ठ हैं और हर विपदा में उसके साथ खड़े रहे हैं। बराक ओबामा ने संबंधों को मजबूत बनाने का काम किया था, लेकिन अब ऐसा नहीं लगता। इसका बुरा असर उन राजनयिकों पर पड़ रहा है, जो विभिन्न देशों में तैनात हैं। ट्रम्प ने कूटनीति को मजाक बना दिया है, जबकि उन्हें इसकी गंभीरता का ज़रा भी अनुभव नहीं है।

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