प्रांजल पाटिल ने दिव्यांगता को नहीं माना बाधा, IAS टॉप कर बनी कलेक्टर

‘व्यक्ति जब खुद से हार जाता है, तो वो दिव्यांग न होते हुए भी दिव्यांग हो जाता है.’ ये कहना है 2017 में यूपीएससी परीक्षा में 124वीं रैंक हासिल करने वाली प्रांजल पाटिल का.

 

केरल में अपना कार्यभार संभालने के बाद सभी विभागों के अधिकारियों से मुलाकात की। कार्यालय के स्थापना विभाग के पी.एच रोशिता ने उनका हाथ पकड़ उन्हें प्रशासन हॉल का रास्ता दिखाया। सभी अफसरों ने बहुत ख़ुशी के साथ उनका स्वागत किया।जब प्रांजल ने अपने सभी कार्यों में अपने अधिकारियों का साथ माँगा तो सभी ने प्रोटोकॉल तोड़, उनका हाथ अपने हाथों में लेकर उनका साथ देने का आश्वासन दिया।हम आईएएस अफसर प्रांजल को उनकी इस उपलब्धि के लिए बधाई देते हुए उनके हौंसलों को सलाम करते हैं। यक़ीनन वे बहुत से लोगों के लिए प्रेरणा हैं।

 

नई दिल्ली: ‘व्यक्ति जब खुद से हार जाता है, तो वो दिव्यांग न होते हुए भी दिव्यांग हो जाता है.’ ये कहना है 2017 में यूपीएससी परीक्षा में 124वीं रैंक हासिल करने वाली प्रांजल पाटिल का. दिव्यांगता को पैरों की बेड़ियां मानने वालों के लिए महाराष्ट्र के उल्हासनगर की रहने वाली प्रांजल पाटिल एक मिसाल के तौर पर सामने आई हैं. प्रांजल का कहना है कि दिव्यांग होना एक बाधा हो सकती है, लेकिन अगर आप में आत्मविश्वास और हार न मानने का जज्बा है, तो इसे दूर करना असंभव नहीं है. प्रांजल ने 4 जून से केरल के एर्नाकुलम जिले में सहायक कलेक्टर के रूप में पदभार संभाला है. आपको बता दें कि प्रांजल ने आठ साल की छोटी सी उम्र में अपनी आंखों की रोशनी खो दी थी.

 

“मैं हर रोज उल्हासनगर से सीएसटी जाया करती थी। सभी लोग मेरी मदद करते थे, कभी सड़क पार करने में, कभी ट्रेन मे चढ़ने में। बाकी कुछ लोग कहते थे कि मुझे उल्हासनगर के ही किसी कॉलेज में पढ़ना चाहिए पर मैं उनको सिर्फ इतना कहती कि मुझे इसी कॉलेज में पढ़ना है और मुझे हर रोज आने-जाने में कोई परेशानी नहीं है।”

 

रेलवे ने किया था नौकरी देने से इनकार
प्रांजल पाटिल ने साल 2016 में अपने पहले ही प्रयास में संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में 733वीं रैंक हासिल की थी. प्रांजल को उस समय भारतीय रेलवे लेखा सेवा (आईआरएएस) में नौकरी आवंटित की गई थी. ट्रेनिंग के समय रेलवे मंत्रालय ने उन्हें नौकरी देने से इनकार कर दिया. रेलवे मंत्रालय ने प्रांजल की सौ फीसदी नेत्रहीनता को कमी का आधार बनाया था. इंडिया टाइम्स में छपी खबर के अनुसार, प्रांजल ने बताया कि उस कठिन समय में मेरे परिवार (माता-पिता) ने मुझे और ज्यादा मेहनत करने की बात कही. माता-पिता से लगातार मिलने वाली प्रेरणा से मैंने साल 2017 में फिर से यूपीएससी परीक्षा पास की और 124वीं रैंक हासिल की. उन्होंने बताया कि वे हमेशा से ही आईएएस अधिकारी बनना चाहती थीं और उनका सपना अब पूरा हो गया है.

नई चीजें सीखने और समझने का अवसर
एर्नाकुलम जिले में सहायक कलेक्टर के रूप में पोस्टिंग पर उत्साहित प्रांजल ने कहा कि मैंने दो हफ्ते पहले ही लाल बहादुर शास्त्री नेशनल एकेडमी ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन, मसूरी, उत्तराखंड से नौ महीने का प्रशिक्षण पूरा किया है. उन्होंने कहा कि ये मेरे लिए एक मौके की तरह है. मुझे नई चीजें सीखने और समझने का अवसर मिलेगा. उन्होंने कहा कि यहां मैं उन क्षेत्रों पर ज्यादा ध्यान दूंगी, जहां पर किसी भी प्रकार से मेरे योगदान की आवश्यकता है. प्रांजल ने कहा कि जिले में विकास और सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए मैं सारे प्रयास करूंगी. उनहोंने कहा कि वे यहां के लोगों से बातचीत करके शहर के बारे में और अधिक जानने की कोशिश करेंगी, ताकि लोगों की मूल समस्याओं को जान सकूं और उनका निदान कर सकूं.

प्रांजल सिर्फ छह साल की थी जब उनके एक सहपाठी ने उनकी एक आँख में पेंसिल मारकर उन्हें घायल कर दिया था। इसके बाद प्रांजल की उस आँख की दृष्टि खराब हो गयी। उस समय डॉक्टर ने उनके माता-पिता को सूचित किया था कि हो सकता है भविष्य में वे अपनी दूसरी आँख की दृष्टि भी खो दें। और बदकिस्मती से डॉक्टर की कही बात सच हुई; कुछ समय बाद प्रांजल की दोनों आँखों की दृष्टि चली गयी।

बचपन में ही चली गई थी आंखों की रोशनी
प्रांजल के पिता एलबी पाटिल और माता ज्योति पाटिल ने बताया कि प्रांजल बचपन से ही पढ़ने में तेज थी. उन्होंने बताया कि प्रांजल के साथ पढ़ने वाले एक बच्चे ने उसकी एक आंख में पेंसिल से प्रहार कर दिया था. इस घटना से उपजे रेटिनल डिटेचमेंट के कारण उसकी बायीं आंख की रोशनी चली गई. उन्होंने बताया कि डॉक्टरों ने उन्हें इस घटना के बाद ही चेतावनी दी थी कि प्रांजल की दूसरी आंख की रोशनी भी जा सकती है. उन्होंने बताया कि दुर्भाग्य से डॉक्टरों की चेतावनी सही साबित हुई और एक साल के भीतर ही प्रांजल ने अपनी दूसरी आंख की रोशनी भी खो दी. प्रांजल के माता-पिता ने कहा कि हमने कभी उसे पढ़ने और आगे बढ़ने से नहीं रोका. हमने प्रांजल को दादर,मुंबई के कमला मेहता स्कूल फॉर ब्लाइंड मे भेजा. प्रांजल ने सेंट जेवियर्स कॉलेज, मुंबई से राजनीति विज्ञान में स्नातक किया. प्रांजल ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली से अंतरराष्ट्रीय संबंधों में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की. प्रांजल के पिता एलबी पाटिल ने कहा कि जो लोग हमेशा अपनी असफलताओं के लिए बहाने बनाते हैं, उन्हें मेरी बेटी से सीखना चाहिए.

सफलता में माता-पिता और टेक्नोलॉजी का योगदान
प्रांजल ने कहा कि उनकी सफलता और शिक्षा में माता-पिता के साथ ही टेक्नोलॉजी ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. उन्होंने बताया कि मैंने ब्रेल लिपि से पढ़ना सीखा. मैंने अब अपने लैपटॉप पर एक स्क्रीन रीडर सॉफ्टवेयर डाला है. ये सॉफ्टवेयर किताब या स्क्रीन पर आने वाले हर टेक्सट को स्कैन करता है. अगर मैं उसे पढ़ना चाहती हूं, तो ये सॉफ़्टवेयर उन शब्दों को मेरे लिए पढ़ता है. उन्होंने बताया कि स्क्रीन रीडर सॉफ्टवेयर मेरे लिए बहुत कारगर साबित हुआ. उन्होंने कहा कि जब आप टेक्नोलॉजी के उपयोग को समझ जाते हैं, तो टेक्नोलॉजी भी आपके लिए चीजें आसान कर देती है.

परीक्षा की तैयारी में सही कंटेंट और उपलब्धता ही असल चुनौती
यूपीएससी परीक्षा के बारे में प्रांजल ने कहा कि ये सिर्फ मेरे लिए ही नहीं, हर किसी के लिए चुनौतीपूर्ण होता है. उन्होंने कहा कि परीक्षा की तैयारी के लिए सही कंटेंट और उसकी उपलब्धता ही असल चुनौती होती है. उन्होंने कहा कि मेरे लिए मेरा पेपर लिखने वाला एक भरोसेमंद लेखक ढूंढ़ना भी एक बड़ी चुनौती थी. लेकिन ये चुनौती भी मेरी लिए आसान हो गई. प्रांजल ने बताया कि अब उन्होंने कम से कम समय में कई मलयालम शब्दों को सीखने का लक्ष्य बनाया है. उन्होंने कहा कि मुझे पता है कि मलयालम अन्य भाषाओं से बिल्कुल अलग है. उन्होंने कहा कि मैं इसे सीखने के लिए सही दिशा में प्रयास के साथ ही जमकर मेहनत करूंगी. सिविल सेवा के उम्मीदवारों के लिए उन्होंने कहा कि सभी को खुद में विश्वास रखना चाहिए. प्रांजल ने कहा कि किसी भी नकारात्मक टिप्पणी को न सुनें, लेकिन अच्छी आलोचना को बुरा न मानें. उन्होंने कहा कि आलोचना से परेशान न हों, ये आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं. उन्होंने कहा कि सफलता मिलने में समय लग सकता है, लेकिन हमें हार नहीं माननी चाहिए.

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