पौने दो सौ साल में खडी की गई हमारी शिक्षा पद्धति का क्या होगा

अजय बोकिल//   बच्चों की ई-लर्निंग, होम स्कूलिंग और कुछ जरूरी सवाल…////
कोरोना अनलाॅक 2.0 में भी स्कूल, काॅलेज और शैक्षणिक संस्थाअों के खुलने की संभावना कम है, क्योंकि इन संस्थाअों में सोशल डिस्टेंसिंग कैसे मेंटेन हो और पढ़ाई भी चलती रहे, इस पर तमाम लोग मंथन कर रहे हैं। स्कूल- काॅलेज जब भी खुलें, लेकिन कोरोना ने हमारी शिक्षा पद्धति में एक अहम बदलाव ला दिया है और वो है ई-लर्निंग तथा होमस्कूलिंग का। अधिकांश राज्यों में बीते दो माह से बच्चों की ई-पढ़ाई की हो रही है। निजी और सरकारी स्कूलों में इसे लागू किया गया है। शिक्षक आॅन लाइन बच्चों को पढ़ा रहे हैं। लेकिन वो दिखते किसी गजेट के स्क्रीन पर ही हैं। शिक्षा की इस आभासी पद्धति को अब काफी हद तक स्थायी बनाने का प्रयास हो रहा है। शिक्षा पद्धति में आ रहे इस व्यवस्थागत बदलाव और उन्मुखीकरण का दूरगामी असर क्या होगा, इस बारे में कयास लगाए जा रहे हैं? इसी के साथ होम लर्निंग की पुरानी संकल्पना को फिर बढ़ावा देने की कोशिश भी है। इस पद्धति में बच्चे स्कूल न जाकर घर पर ही अध्ययन करते और प्रायवेट विद्यार्थी के रूप में परीक्षा में शामिल होते हैं। सोचने की बात यह भी है कि इस तरह शिक्षित बच्चों का सामाजिक व्यवहार क्या होगा? समाज का उनके प्रति व्यवहार क्या होगा? और बड़े पैमाने पर बच्चे होम स्कूलिंग करने लगे तो स्कूलों और जिस शिक्षा पद्धति को हमने पौने दो सौ साल में खड़ा किया है, उसकी क्या उपयोगिता रह जाएगी? भविष्य में स्कूल रहेंगे भी या नहीं ? रहेंगे तो उनका स्वरूप कैसा होगा?
ऐसे कई सवाल कोरोना संकट ने खड़े कर दिए हैं। चूंकि स्कूल एक ऐसी जगह है, जो बच्चों को शुरू से सामूहिकता की ट्रेनिंग देती है। एकाकीपन को तोड़ने और शेयरिंग सिखाती है। मिलकर खेलना कूदना, पढ़ाई करना, मनोरंजन करना आदि। लेकिन कोरोना ने इसी संकल्पना की धज्जियां उड़ा दी हैं। बच्चों की दृष्टि से सबसे कठिन काम उनकी फिजिकल डिस्टेंसिंग है। वो एक दूसरे से ज्यादा देर तक अलग नहीं रह सकते। बच्चे परिचय के मोहताज नहीं होते। वो खुद किसी भी माहौल में घुल मिलजाते हैं। अपने दोस्त और खेल खुद तलाश कर लेते हैं।
चूंकि कोरोना ने हिल-मिल कर जीने के आग्रही विद्यालयों को ही बंद कर दिया है तो पढ़ाई यानी कोर्स पूरा करने के लिए तमाम स्कूलो में ई- लर्निंग प्रणाली लागू की जा रही है। यहां टीचर एक टीवी एंकर की माफिक बच्चों को ‘टीच’ करती है। कई निजी स्कूलों में इसका कड़ाई से पालन हो रहा है। ई-लर्निंग के साथ तगड़ा होमवर्क भी दिया जा रहा है। जिससे कई बार बच्चे परेशान भी हो जाते हैं। मोबाइल या लैपटाॅप स्क्रीन पर लगातार देखने से आंखों पर भी विपरीत असर हो रहा है। टीचर्स वच्युअल क्लासेस पढ़ा तो रही हैं, लेकिन शिक्षक और विद्यार्थी के बीच भी वैसा ही रिश्ता बन रहा है, जैसा कि पारंपरिक शिक्षा पद्धति में था, अभी तय होना है। प्राप्त जानकारी के अनुसार मध्यप्रदेश के सरकारी स्कूलों में शिक्षा विभाग ने जिला, ब्लॉक स्तर तथा जनशिक्षा केन्द्र स्तर पर व्हाट्सएप पर डिजिटल ग्रुप्स ‍तैयार किए हैं। प्रत्येक जनशिक्षा केन्द्र पर कक्षा 1 से कक्षा एवं कक्षा 9 के लिए डिजीटल ग्रुप बने हैं। साथ ही पालकगण और विषय विशेषज्ञ शिक्षकों को भी इस ग्रुप में सदस्य बनाया है। शिक्षा विभाग के मुताबिक इस ग्रुप में राज्य शिक्षा केन्द्र से प्राप्त होने वाले ई-लर्निंग मटेरियल को प्रतिदिन सुबह 10 से 11 बजे तक पोस्ट किया जाता है और शिक्षक पालक तथा छात्र के बीच संवाद होता है। इसके अलावा आकाशवाणी और दूरदर्शन से भी बच्चों के पाठ का प्रसारण किया जा रहा है। हालांकि सरकारी स्कूलों में ई-लर्निंग कितने प्रभावी ढंग से लागू हो रहा है, यह भी एक सवाल है। क्योंकि ई- लर्निंग के लिए इलेक्ट्राॅनिक गजेट्स की जरूरत होती है। अर्थात स्मार्ट फोन, लैपटाॅप, कम्प्यूटर इत्यादि । गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों के पास इनमें से कितनी सुविधाएं हैं, इसका निश्चित आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। ई-लर्निंग और वर्चुअल क्लासेस के लिए पहली जरूरत नेट की उपलब्धता है और नेट चलने के लिए बिजली जरूरी है। ग्रामीण क्षेत्रों में दोनो की ‍दिक्कत है। अहम बात है कि ई-लर्निंग का इससे पहले शिक्षकों और बच्चों को कोई प्रशिक्षण नहीं ‍िदया गया है। ऐसे में ‘ट्राय एंड एरर’ के भरोसे काम ज्यादा हो रहा है। लेकिन सीबीएसई से जुड़े स्कूलों का परफार्मेंस इस मामले में अच्छा है। इसकी पुष्टि पिछले दिनो आयोजित एक वेबीनार में सीबीएसई के पूर्व चेयरमैन अशोक गांगुली ने भी की। जाहिर है कि ट्रेडिशनल क्लास रूम को ई-क्लासरूम में बदलने तथा बच्चों को उसका आदी बनाने के लिए अभी काफी कुछ करना बाकी है।
ई-लर्निंग के बरक्स दूसरा कनसेप्ट घर पर रह कर ही पढ़ने-पढ़ाने का है। इसे अंग्रेजी में ‘होम स्कूलिंग’ कहते हैं। अपने समवयस्कों के साथ उनका रिश्ता उन स्कूली बच्चों से यकीनन अलग तरह का होता है, जो हर दिन कई घंटे एक साथ सामूहिक रूप से बिताते हैं। आज के जमाने में भी कुछ लोगों ने ऐसे साहसिक प्रयोग किए हैं और बच्चों को स्कूल भेजने के बजाए घर पर रहकर पढ़ा रहे हैं। मेधावी बच्चों का परफार्मेंस यहां भी दूसरे बच्चों से बेहतर है। इसका अर्थ यही है कि अभिभावक ही गुरू की भूमिका भी बेहतर ढंग से निभा सकते हैं। हालांकि सभी बच्चों पर यह लागू हो, जरूरी नहीं है। गांधीजी कहते थे कि घर से बेहतर कोई स्कूल नहीं और अभिभावक से अच्छा कोई शिक्षक नहीं। अगर कोरोना की दहशत यूं ही जारी रही तो मुमकिन है कि बहुत से पालक अपने बच्चों को स्कूल भेजने की जगह ‘होमस्कूल’ को ही तवज्जो दें।
इस बारे में नीति आयोग से जुड़ी एजुकेशन प्रोफेशनल रिचा चौधरी का कहना है कि अब शतकों पुराना चाक-टाॅक टीचिंग माॅडल अब पुराना पड़ चुका है। इसकी जगह अब हमे बहुआयामी शिक्षा पद्धति पर ध्यान देना होगा। अर्थात गुरू-शिष्य रिश्तों में अब मानवीय सम्बन्धों से ज्यादा टैक्नोलाॅजी की भूमिका होगी। दरअसल कोरोना ने हमे जीवन जीने और शिक्षण की वै‍कल्पिक पद्धतियों को अपनाने तथा इस दिशा में सोचते रहने पर मजबूर कर दिया है। ई-लर्निंग भी तब तक बहुपयोगी नहीं है जब तक आपके पास पर्याप्त संसाधन न हों। इस काम में मोबाइल फोन एक जरूरी उपकरण है। इसी के साथ यह भी आवश्यक है कि ई-लर्निंग सर्व समावेशी हो, जिसमें कमजोर और गरीब बच्चों की भी समुचित भागीदारी हो। ‍रिचा चौधरी का मानना है कि जैसे जैसे इंटरनेट की पहुंच दूरदराज के इलाकों में होती जाएगी, शिक्षा का स्वरूप भी बदलता जाएगा। स्कूलिंग का तरीका भी बदलेगा। बेशक ई- ‍लर्निंग अब समय की जरूरत है और एक यांत्रिक समाज की दरकार भी। लेकिन इसे ज्यादा सहज और टीचर-स्टूडेंट फ्रेंडली बनाने की आवश्यकता है। साथ ही इस मामले में सरकारी और गैर सरकारी स्कूलो में विषमता भी नहीं दिखनी चाहिए। ई- लर्निंग हो, होमस्कूलिंग भी हो, लेकिन मानवीयता के आग्रहों को मजबूत करने वाला हो।
वरिष्ठ संपादक

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