पी नरहरि : एक संवेदनशील नौकरशाह

मध्यप्रदेश कैडर 2001 बैच के आईएएस अधिकारी पी. नरहरि को विकलांगों के लिए उत्कृष्ट कार्य करने के लिए राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। ग्वालियर में नरहरि के कार्यकाल में स्कूल फीस वृद्धि का मामला चर्चा में रहा, उनके प्रयास से 92 स्कूल संचालकों ने फीस नहीं बढ़ाने का निर्णय लिया था ।इंदौर में भी जिला कलेक्टर के तौर पर उन्होंने कई चुनौतियों का सामना किया। इनमें बीआरटीएस का चौड़ीकरण, मेट्रो प्रोजेक्ट, खान नदी किनारे से अतिक्रमण हटवाना जैसे कई मुद्दे थे। इंदौर के पूर्व कलेक्टर तथा वर्तमान में जनसंपर्क विभाग भोपाल के आयुक्त आईएएस पी नरहरि की कहानी आज के युवाओं के लिए बेहद प्रेरणास्पद साबित हो सकती है।

इंदौर  का बाईस वर्षीय युवक प्रदीप सिंह उन अनेक नौजवानों में से एक है जिसने पी. नरहरि को देखकर, उनसे प्रेरित होकर सपनों में रंग भरना चाहा और यूपीएससी का एक्जाम क्रेक किया। प्रदीप सिंह के पिता मनोज सिंह इंदौर के एक पेट्रोल पंप पर गाड़ियों में पेट्रोल डालने का काम करते थे। उन्होंने प्रदीप सिंह की पढ़ाई के लिए अपना घर तक बेच डाला। प्रदीप सिंह मानते हैं कि, आईएएस पी. नरहरि उसके लिए रोल मॉडल की तरह हैं। प्रदीप का कहना है कि “मैंने नरहरि सर की वर्किंग देखी है उन्होंने शहर और प्रशासन में बदलाव लाने के लिए चमत्कारिक कार्य किए हैं।” आज कई युवा आईएएस बनने का सपना तो देखते हैं लेकिन उनमें संघर्ष करने का माद्दा नहीं होता लेकिन जब हम पी नरहरि के संघर्ष की कहानी सुनते हैं तो ऐसा लगता है कि अभावों के बीच भी बहुत कुछ किया जा सकता है। पी नरहरि ने इंदौर में एक कार्यक्रम में अपने जीवन से जुड़ा एक किस्सा सुनाया था।

यहां छात्रों ने उनसे सवाल किया था की अभावों के चलते किस तरह से मंजिल पाई जा सकती है। इस पर पी नरहरि ने अपनी कहानी सुनाते हुए कहा कि मैं खुद ऐसी परिस्थितियों से आया हूं इसलिए आपकी परेशानियों को समझता हूं। उन्होंने बताया कि आपके इंदौर शहर में कई लाइब्रेरी है लेकिन मैं जिस गांव में रहा वहां इतनी सुविधाएं नहीं थीं। पिता गांव में टेलर थे और आर्थिक परिस्थितियां इस बात की इजाजत नहीं देती थी कि सारी किताबें खरीद कर ही पढ़ाई की जा सके। मैं सभी लाइब्रेरी में जाकर घंटों इसलिए पढ़ता था क्योंकि मेरा लक्ष्य निश्चित था मुझे आईएएस बनना है।कई बार तो स्थितियां यहां तक हो जाती थी कि लाइब्रेरी वाले मुझे घर जाने के लिए कहते थे लेकिन वही मेरी लगन को देखकर मुझे ऐसी किताबें भी घर ले जाने के लिए दे देते थे जिन्हें इशू करने की मनाही होती है। खाली वक्त में मैं किसी को पढ़ा कर या कुछ काम कर के कुछ पैसे जमा कर लिया करता था ताकि पढ़ाई की जरूरतों को पूरा कर सकू। यह सब मैं इसलिए बता रहा हूं ताकि आप यह समझ सके कि अच्छा मुकाम केवल सुविधाओं से नहीं बल्कि संकल्प से ही पाया जा सकता है।

एकलव्य के पास संसाधन और गुरु दोनों नहीं थे फिर भी प्रबल इच्छा शक्ति से ज्ञान प्राप्त किया उन्होंने बताया कि पढ़ाई के साथ ही व्यक्ति को तमाम गतिविधियों में भाग लेना चाहिए इससे उसके व्यक्तित्व का निर्माण होता है उनका यह भी सुझाव था कि किताबें खरीद कर पढ़ना ही जरूरी नहीं है लाइब्रेरी की मदद भी ली जा सकती है। उल्लेखनीय है कि पी नरहरि का फेसबुक पेज भी युवाओं के लिए बेहद प्रेरणादाई और मार्गदर्शक साबित हो सकता है इसमें उन्होंने पॉजिटिव थिंकिंग की कई स्टोरीज दे रखी है। पी. नरहरि अपनी तरह के अनूठे अधिकारी हैंऐसे अनेकों व्यक्ति होंगे जो संघर्ष करके अपने लक्ष्यों को पा लेते हैं लेकिन बिरले ही होते हैं जो ऊंचाई पर पहुंच कर लक्ष्य को पा लेने के बाद समाज को कुछ लौटाने का जज्बा दिखाते हैं। आंध्र प्रदेश में करीम नगर जिला मुख्यालय से 50 किमी दूर बसा धूल धूसरित कस्बा बसंत नगर चारों तरफ सीमेंट के कारखानों से घिरा हुआ है।

यहीं नरहरि के जीवन का काफी समय गुजरा था। वैसे उनके पुरखे वारंगल जिले में चिंतागुटै गांव के रहने वाले थे और बेहतर जिंदगी की तलाश में बसंत नगर आ गए थे। नरहरि ने हायर सेकेंडरी तक की पढ़ाई बसंत नगर से ही की फिर कॉलेज की पढ़ाई के लिए कृष्णा जिले के निम्माकुरू चले गए। वे तत्कालिक तौर पर इंजीनियरिंग करने का इरादा रखते थे इसलिए तमाम बाधाओं के बावजूद उस्मानिया विश्वविद्यालयकरना करना हैदराबाद जा पहुंचे। उनकी अगली मंजिल भारतीय प्रशासनिक सेवा थी। नरहरि ने यह चुनौतीपूर्ण परीक्षा 78वीं रैंक हासिल कर पास कर ली। प्रशासनिक अधिकारी के रूप में पी नरहरि के पास उपलब्धियों की लंबी श्रृंखला हैप्रदेश की सबसे कामयाब लाड़ली लक्ष्मी योजना भी पी. नरहरि के दिमाग की उपज थी। इस योजना का मकसद रहा बालिकाओं के लिए मजबूत भविष्य की बुनियाद रखना ताकि उनकी आर्थिक और शैक्षणिक स्तर परिवर्तन के साथ-साथ समाज में एक सकारात्मक बदलाव लाया जा सके। सन 2007 में मध्यप्रदेश सरकार ने यह योजना पूरे प्रदेश में लागू कर दी। बाद में कई प्रदेशों ने इसे अंगीकृत किया।

इन प्रदेशों में पी. नरहरि का गृह प्रदेश आंध्र भी शामिल था, जहां इसे बंगारू थाली के नाम से लागू किया गया। केंद्र सरकार की “बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ योजना का खाका भी लाड़ली लक्ष्मी योजना के आधार पर बनाया गया था। नरहरि की सक्रिय ट्रेकर योजना, जिसका उद्देश्य कन्या भ्रूण हत्या उन्मूलन था, ई. स्वास्थ्य श्रेणी के तहत “मंथन” पुरष्कार मिला। ग्वालियर में कलेक्टर रहते हुए उनके एक और काम की राष्ट्रीय स्तर पर सराहना हुई वह थी विकलांग, वरिष्ठ नागरिक और गर्भवती स्त्रियों की सुविधा को ध्यान में रखकर सार्वजनिक स्थलों पर रैंप और रेलिंग का निर्माण। इस प्रयास के लिए सन् 2013 में भारत के राष्ट्रपति ने पुरष्कृत किया। नरहरि का कहना है कि विकलांगता का क्षेत्र विशेष रूप से उनके काफी करीब रहा है। वे इसके लिए 200 लोगों की ऐसी टीम बनाना चाहते हैं जो प्रशिक्षण लेकर काम कर सके।

बॉलीवुड अभिनेता आमिरखान द्वारा निर्मित लोकप्रिय टेलीवीजन शो सत्यमेव जयते जो देश में सामाजिक मुद्दों के समाधान के लिए एक मंच बन गया था। नरहरि के प्रयासों पर एक विशेष एपिसोड प्रस्तुत कियाग्वालियर और उसके आसपास 1.35 लाख पौधे रोपित करना नरहरि की हरियाली के प्रति नैसर्गिक प्रेम को दर्शाता है। अपने इन्हीं कामों के कारण नरहरि, तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन की पसंद बने और वे मुख्यमंत्री से आग्रह करके नरहरि को इंदौर ले गईं जहां पुराने शहर को स्मार्ट सिटी में बदलने की विशाल चुनौती उनके सामने खड़ी थी।

पी. नरहरि ने दो किताबें भी लिखी हैं “हू ओन्स महू’ और “मेकिंग ऑफ लाड़ली लक्ष्मी योजना”। उनके लिखे “हो हल्ला” गीत को लोकप्रिय पार्श्व गायक शान ने स्वर दिया है। सन् 2001 में भारतीय प्रशासनिक सेवा ज्वाइन करने के बाद छिंदवाड़ा, ग्वालियर जैसे अनेक शहरों में प्रारंभिक पदों पर भी रहे। 2007 अगस्त में वे सिवनी के कलेक्टर बने । इंदौर में जिला कलेक्टर के रूप में उन्होंने स्वास्थ्य, शिक्षा और स्वच्छता पर ध्यान केंद्रित किया। उनके अथक प्रयासों का ही नतीजा था कि स्वच्छ भारत अभियान के तहत इंदौर भारत का सबसे स्वच्छ शहर बन पाया। दस साल के इस कलेक्टरी के काल में नरहरि इन कामों के दौरान अपना बचपन और किशोर काल कभी नहीं भूलते।

शुरू कर दिया है। डिजिटल मीडिया में आज कंटेंट सबसे ज्यादा देखा जा रहा है। बेहतर कंटेंट वे दसवीं कक्षा के दिनों में करीम नगर के तत्कालीन कलेक्टर बनवारी लाल द्वारा चलाए जाने वाले वयस्क साक्षरता कार्यक्रम को नहीं भूलते जो अक्षरा उगावला के नाम से निरक्षर बुजुर्गों के लिए प्रारंभ किया गया था। इस योजना की खास बात यह थी कि नरहरि और उनके सहपाठी कक्षा के घंटों के बाद सरकारी स्कूलों में बुजुर्गों को इकट्ठा करके उन्हें बुनियादी साक्षरता कौशल सिखाते थे। नरहरि इस घटना को याद करते हुए बताना नहीं भूलते कि ‘यह एक बड़ी पहल थी जिसे कलेक्टर ने अपने लेबल पर करने की ठानी थी मुझे लगा कि यह कुछ ऐसा था जिसे अगर मैं प्रशासनिक सेवा में गया तो करना चाहता था।


सोशल मीडिया पर राय नरहरि को आम आदमी की मुश्किलों तक पहुंचने के लिये किसी भी स्थापित माध्यम की आवश्यकता नहीं वे जन-समस्याओं के लिये सीधे लोगों से जुड़े रहने के के लिये फेसबुक एवं ट्विटर के इस्तेमाल में कोई गुरेज़ नहीं रखते। उनका कहना है आज के युग में जब हर आदमी एंड्रायड नेट वाला मोबाईल इस्तेमाल कर रहा है और फेसबुक, व्हाट्सऐप, हाईक जैसे एप्स का आदी है तो शासन की योजनाओ को उस तक पहुँचाने के लिए सोशल मीडिया के साधनों का इस्तेमाल जरूरी है और इन माध्यमों से आम नागरिक जो मुझ तक नहीं पहुँच पाता वो भी अपनी बात मुझ तक पहुंचा कर समस्या का निदान पा सकता है। फेक न्यूज़ पर नजर देश में तकनीक के विकास के साथ डिजिटल मीडिया का प्रभाव बढ़ा है। आज 10 फीसदी लोग सोशल मीडिया और डिजिटल पर निर्भर हैं। इसमें से 30 फीसदी लोग न्यूज़ और एंटरटेनमेंट के लिए डिजिटल पर निर्भर हो चुके हैं। नए यूज़र्स पर न्यूज़ अग्रिगरेटर्स का काफी प्रभाव है। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को इस दौर में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखना होगा। सरकार ने भी अब सोशल मीडिया डिपार्टमेंट शुरू कर दिया है। डिजिटल मीडिया में आज वीडियो कंटेंट सबसे ज्यादा देखा जा रहा है। बेहतर कंटेंट के साथ उनके लिए रीच भी जरूरी है। सोशल मीडिया के जरिये फेक और छिपी हुई चीजें ज्यादा सामने आ रही हैं और उन्हें पसंद भी किया जा रहा है।

आईएएस की दरियादिली देख दंग रह गए लोग

यह घटना ग्वालियर की है जहाँ कभी नरहरि कलेक्टर रहे थे। शिवपुरी करैरा निवासी 19 वर्षीय रश्मि पुत्री स्व. हरदयाल लोधी नरहरि को भूल नहीं सकतीं। रश्मि ,ऑनलाइन आरक्षक भर्ती परीक्षा देने ग्वालियर आई थी। उसका पेपर दोपहर की पाली में रतवाई रोड स्थित एलएनसीटी कॉलेज में था। छात्रा ऑटो में सवार होकर चेतकपुरी से मुरार की ओर जा रही थी। तभी एजी ऑफिस पुल पर छात्रा की ऑटो को कार ने टक्कर मार दी। टक्कर लगने से छात्रा के पैर व कमर में चोट लगी। घटना के बाद एजी ऑफिस पुल पर काफी भीड़ लग गई। सारे लोग तमाशबीन बने हुए थे कोई भी छात्रा को अस्पताल तक ले जाने की पहल नहीं कर रहा था। तभी वहां से सचिव राजस्व विभाग नरहरि का निकलना हुआ।

उन्हें दो बजे मोतीमहल में मुख्य सचिव द्वारा ली जाने वाली बैठक में शामिल होना था। पी. नरहरि ने कार चालक को गाड़ी साइड में रोकने के लिए कहा। गाड़ी रुकने के बाद आईएएस अफसर कार से उतरे और उन्होंने छात्रा से उसका हाल चाल पूछा। जब उन्हें पता लगा कि छात्रा एग्जाम देने आई है और घायल हैउसके बाद उन्होंने बिना देर किए अपने सुरक्षाकर्मी को आदेश दिया कि छात्रा को जेएएच लेकर जाएं और भर्ती कराने के बाद ही लौटें। छात्रा को अपनी कार से अस्पताल भेजने के बाद आईएएस अफसर ने खुद कार के लौटने का इंतजार नहीं किया।

एक बाइक सवार को रोककर लिफ्ट मांगी। इसके बाद वह मोती महल पहुंचे और यहां बैठक में शामिल हुए और कुछ देर बाद उनकी गाड़ी लेकर सुरक्षाकर्मी भी वहां पहुंच गया घटना के बाद मौके पर खड़े लोग पी. नरहरि की दरियादिली देखकर दंग रह गए। पी. नरहरि का नाम लोगों के लिए अनजान नहीं था, क्योंकि वह ग्वालियर के कलेक्टर भी रहे तब भी वह गरीब और बेसहारा लोगो की मदद के लिए जाने जाते थे

ग्वालियर और सिवनी जिलों में विकलांग (शारीरिक विकलांग) व्यक्तियों के लिए बाधा रहित वातावरण बनाने में नरहरि के काम ने उन्हें तीन राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा है, जिनमें विकलांग व्यक्तियों के सशक्तीकरण के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार, 2014, ‘सृजन में काम’ के लिए शामिल हैं। ग्वालियर जिले में विकलांग व्यक्तियों के लिए बैरियर-मुक्त वातावरण। सार्वजनिक रूप से बुनियादी ढाँचा तैयार करना पर्याप्त नहीं होगा क्योंकि योजनाओं और पहलों के अस्तित्व के बारे में, विशेष रूप से विकलांग लोगों के बीच सार्वजनिक जागरूकता पैदा करने की आवश्यकता है। ग्वालियर में एक डीसी के रूप में अपने समय के दौरान, , वे कहते हैं, नेत्रहीन विकलांग व्यक्तियों (जैसा कि उनके पास उच्च संवेदनशीलता है) के लिए एक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया था जिसमें पांच प्रकार की गतिविधियाँ थीं, जैसे मालिश, एक्यूपंक्चर। जॉब फेयर और एक कॉल सेंटर भी स्थापित किया गया था।

जो लोग विकलांग हैं और जिनके पास हल्के एमआर हैं, उन्हें सरकारी योजनाओं के तहत नियोजित किया जा सकता है। यद्यपि शारीरिक विकलांगता या एमआर की सीमा के लिए कोई कट-ऑफ नहीं है, वह कहते हैं कि नियोक्ता को यह निर्धारित करने का विशेषाधिकार है कि कौन किस ,भूमिका फिट बैठता है। नरहरि कहते हैं कि कार्यक्रमों से ऐसे लोगों को बहुत फायदा हुआ है जो कमाई के मामले में बेहतर हो सकते हैं। उन्होंने कहा, ऐसे लोगों की आय 1000-2000 रुपये प्रति माह से बढ़कर 3000-4000 रुपये प्रति दिन हो गई। नरहरि के मुताबिक, हमारे पास बिल्डिंग कोड हैं जो यह निर्दिष्ट करते हैं कि दिव्यांगों के लिए अवरोध मुक्त वातावरण हो, यह सुनिश्चित करने के लिए की किस तरह के बुनियादी ढांचे की आवश्यकता है। हम संगठनों, विशेष रूप से सरकारी एजेंसियों को बुलाते हैं, जिन्हें हम प्रशिक्षित करते हैं और आवश्यक विनिर्देशों के बारे में शिक्षित करते हैं।

विजयः आप लोगों की शिक्षा कहां से हुई?

पी. नरहरिः तेलंगाना के करीम नगर में मेरी स्कूलिंग हुई, हैदराबाद से मैने इंजीनियरिंग कीगीताः मेरे पिता नेवल आफीसर रहे हैं। उनकी पोस्टिंग ज्यादातर मुंबई और विशाखापट्टनम में रही है। मेरी स्कूलिंग केंद्रीय विद्यालय विशाखापट्टनम की रही है। मैंने उस्मानिया यूनिवर्सिटी से साइकोलाजी में पीजी – किया। शादी के बाद बरकतउगा यूनिवर्सिटी से पीएचडी की। फ्रीलांसर हूं, साइकोलाजी के सेशन लेती हूं।

विजयः आपकी पहली मुलाकात कैसे हुई?

पी. नरहरिः मैं यूपीएससी की तैयारी कर रहा था। ये मेरी कोचिंग में बतौर मॉक इंटरव्यू एक्सपर्ट आई थीं। विजयः किन चीजों पर तैयारी करवाती थीं? गीताः बॉडी लैग्वेज, कम्यूनिकेशन स्किल, पर्सनैलिटी ग्रूमिंग।

विजयः इसके बाद क्या हुआ?

पी. नरहरिः कुछ नहीं… हम मिलते रहेविजयः फिर अगली मुलाकात कहाँ हुई?

गीताः ये तो प्रश्न का हिस्सा ही नहीं थाविजयः पर मुझे जानने की इच्छा है। गीताः दूसरी-तीसरी सभी मुलाकातें कोचिंग में।

विजयः मैम, आपने कभी सिविल सर्विसेज के बारे में नहीं सोचा? गीताः यूपीएससी अटेम्पट किया था, पर हुआ नहीं क्योंकि मेरी जनरल नॉलेज अच्छी नहीं थी। मैं सब्जेक्ट एक्सपर्ट रही हूं।

विजयः आप दोनों के बीच डिस्कशन का कॉमन टॉपिक क्या रहता है? गीताः बच्चे और फिल्में। बगों का बर्ताव कैसा हो, उनकी कम्यूनिकेशन स्किल कैसे अच्छी हो, रीडिंग टाइम कैसे बढ़ाएं।

विजयः कैसी किताबें पढ़ते हैं आप लोग? गीताः मुझे हू मूड माय चीज पसंद हैनरहरिः मुझे ऑटोबायोग्राफी, बायोग्राफी, रिलीजन, सिविलाइजेशन, इंटरनेशनल रिलेशन्स पर पढ़ना अच्छा लगता है।

विजयः फेवरेट हॉलीडे डेस्टीनेशन क्या है?

नरहरिः हमारा फोकस रहता है कि हम बगों को कौन-कौन सी जगह घुमाना चाहते हैं, ताकि उन्हें अच्छा एक्सपोजर मिले। हमारा अगला प्लान यमन रहेगा। इसके बाद फुटबॉल वर्ल्ड कप।

विजयः आप लोग आंध्रा से हैं. फड के मामले में क्या अपने नेटिव प्लेस को मिस नहीं करते?

गीता: मैं एक यूट्यूब चैनल देखती रहती हूं ‘वाह रे वाह डॉट कॉम बॉय वाह शेफ’। मैं कुकिंग में एक्सपेरीमेंट करती हूं। घर पर ही खाना बनाती हूं। बिना ये सोचे कि वो कैसा बन रहा है। मैं सभी गेस्ट्स का शुक्रिया अदा करना चाहती हूं कि उन्होंने मेरी कुकिंग के साथ धैर्य रखा और पॉजिटिव फीडबैक दिया।

विजय : बच्चों की पढ़ाई को लेकर आप लोगों की क्या सोच है? उनसे क्या अपेक्षाएं हैं?

नरहरिः हमने उन्हें पढ़ाई को लेकर बहुत फ्रीडम दी है… जैसे मेरे पिता ने मुझे दी थी।

गीताः हां, ये बच्चों से कहते हैं कि 100 में से बस 35 ले आना। बच्चे कहते हैं, कि कौन से पापा इस तरह से कहते हैं, अपने बच्चों से…

नरहरिः मेरा प्वाइंट यही है कि बगों को अपने गोल खुद बनाने चाहिए। उनकी यह क्षमता होनी चाहिए कि कोई और उन्हें डिटेक्ट न कर सके।

गीताः वैसे मैं बहुत खुश हूं क्योंकि मेरी बेटी कहती है कि उसे भी साइकोलॉजिस्ट बनना है। अभी हमारे घर में चार साइकोलॉजिस्ट हैं। एक डिग्री वाला और तीन बिना डिग्री वाले। जैसे मेरी बेटी अपने दोस्तों के लिए ‘एग्री आंट’ है। बेटा अपनी क्लास के दोस्तों और जूनियर्स के लिए गुरू है। (हंसते हुए) मुझे तो कभी लगता है कि मेरा पेट डॉग भी चार इमली के बाकी पेट्स को साइकोलॉजिकल सेशन्स देता होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि मैं जब भी कोई नई रिसर्च या केस पढ़ती हूं तोसबके साथ डिस्कस करती हूं।

नरहरिः बेटा बड़ा होकर शेफ बनना चाहता है। हम दोनों उसे प्रोत्साहित भी कर रहे हैं, कि वह होटल मैनेजमेंट का प्रॉपर कोर्स करे। वैसे दोनों बगो स्कूल में अच्छा ही कर रहे हैं। बेटी ने साइंस में और बेटे ने मैथ्स में टॉप किया है। अब तो वो हम दोनों को डांटते हैं, और कहते हैं कि आप हमें अंडरएस्टीमेट मत किया करो।

गीताः हम बच्चों से कुछ भी अपेक्षा नहीं रख रहे तो वह अपने मन से अच्छा परफार्म कर रहे हैं, हमें सरप्राइज देने के लिए। हमसे कहते भी हैं कि आपको हमसे अपेक्षाएं रखनी चाहिए।

विजयः आप बगाों की जिंदगी के अलग-अलग पहलुओं… स्पोर्टस, कल्चर, रिलीजन से कैसे एक्सपोजर करा रहे हैं?

गीताः बच्चों का एक रुटीन बनाया है, जैसे उन्हें अभी तेलगू भाषा सिखा रहे हैं। अगर टीवी देखना है तो तेलगू का एक शब्द बोलना और लिखना पड़ेगा।

नरहरि बच्चों  को बेड टाइम स्टोरी सुनाते हैं, जिसमें ये गवर्नमेंट पालिसीज और उनके एग्जीक्यूशन के बारे में बताते हैं।

नरहरिः इन चीजों का मकसद है उन्हें जिंदगी के लिए तैयार करना और वो रेफरेंस प्वाइंट देना जिन्हें वो आगे अपनी जिंदगी में रेफर कर सकें। माता-पिता की परवरिश ही हर व्यक्ति के लिए रेफरेंस प्वाइंट का काम करती है।

विजयः एक साइकोलॉजिस्ट होने के नाते आप सक्सेस को कैसे डिफाइन करती है? गीताः आपके पास जो कुछ भी है, उसमें अगर आप खुश हो तो आप सक्सेसफुल हो।

नरहरिः मेरे लिए जो हम कर रहे हैं, उसकी ग्रास हैप्पीनेस ही सक्सेस है।

विजयः आप अपने चेहरे पर हमेशा मुस्कराहट कैसे बनाए रखती हैं?

गीताः मैने वार विडोज को देखा है, जिनके पति या बगो जंग में शहीद हो जाते हैं… जब वो उनका मेडल लेने आती हैं तो बाकी सबकी आंखें तो नम होती हैं, लेकिन उनके चेहरे पर एक अलग ही शौर्य का तेज रहता है। तो जब इस तरह अपना सब कुछ हार कर भी जिंदगी जीने का विश्वास उनमें है तो हम तो बहुत अच्छी परिस्थिति में हैं।

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