पहली कलेक्टरी का  अनुभव सुखद होता है-तन्वी सुन्द्रियाल

पढऩे-लिखने खेलने की शौकीन रतलाम कलेक्टर सुन्द्रियाल से आरती शर्माकी बातचीत

भोपाल. भारतीय प्रशासनिक सेवा में यह कहावत है कि अधिकारी चाहे जिस पद पर पहुंच जाए, लेकिन अपना कलेक्टरी वाला दौर कभी नहीं भूलता। हो भी क्यों न, आखिर जनता से सीधे जुड़कर काम करने का आनंद जो कलेक्टरी में मिलता है, वह सर्वाधिक याद करने वाला होता है। कुछ अधिकारी इस कार्यकाल को अपने नवाचार के लिए जाने जाते हैं तो कुछ ऐसे भी अधिकारी हैं जो सिस्टम को बिना छेड़े उन्हें दुरूस्त करने में अपनी प्राथमिकताएं रखते हैं। ऐसी ही एक कलेक्टर हैं वर्ष 2010 बैच की भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी तन्वी सुन्द्रियाल। पढऩे-लिखने की शौकीन तन्वी को स्पोर्ट्स में भी बेहद रूचि है। फिटनेस उनकी जिन्दगी से जुड़ा है। उन्हें रतलाम जिले की पहली कलेक्टरी मिली है। पहली कलेक्टरी को लेकर उनके अनुभव, प्राथमिकताएं और चुनौतियों पर पेश है उनसे बातचीत के कुछ अंश:
जिले में पहली बार कलेक्टर बनने का अनुभव कैसा है?
हमें ट्रेनिंग के दौरान ही जनता से जुड़कर उनके लिए काम करना सिखाया जाता है। निश्चित ही ऐसे में पहली बार कलेक्टर बनना सुखद अनुभव होता है। रतलाम में इससे पूर्व भी महिला कलेक्टर रही हैं, ऐसे में लोगों का पूरा सहयोग और समर्थन मुझे मिल रहा है।
किस तरह की चुनौतियां आपके समक्ष आई हैं?
चुनौतियां ऐसी खास नहीं है, लेकिन सिस्टम में कुछ खामियां हैं, जिन्हें दूर करना है। मसलन यहां विभागीय समन्वय का अभाव देखा है। जिसका असर शासकीय योजनाओं पर पड़ता है। अधिकारियों और कर्मचारियों में यदि सामंजस्य हो, स्वयं निर्णय लेने की क्षमता हो, तो बहुत कुछ समस्याएं हल हो सकती हैं। उन पर वर्कआउट जारी है।
रतलाम जिले में आपकी प्राथमिकताएं क्या हैं?
जिले में शासन की योजनाओं का क्रियान्वयन सफलतापूर्वक होता रहे, लोगों से जुड़े शिक्षा, स्वास्थ्य, राजस्व, सड़क, बिजली, पानी आदि मूलभूत मामलों से जुड़े मुद्दों पर तत्काल कार्रवाई हो। चूंकि रतलाम कृषक प्रधान जिला है, इसलिए किसानों से जुड़ी समस्याओं का तत्काल समाधान हो, यही प्राथमिकता है। शासन की योजनाओं पर आम आदमी की पहुंच सरल और सहज हो जाए, इसके प्रयास किए जा रहे हैं।
आपकी प्राथमिकताओं की सूची में प्रथम क्या है?
मैंने सबसे पहले क्षेत्र में चिकित्सा पर कार्य शुरू किया है। रोगी कल्याण समिति और जनभागीदारी से अस्पताल की चरमराई व्यवस्थाओं को सुधारा है। आम आदमी को त्वरित उपचार की व्यवस्था हो, उसके प्रयास किए जा रहे हैं। जिलों में अस्पतालों तो ब्लॉक और तहसील स्तर पर डिस्पेंसरी के उन्नयन पर काम किया जा रहा है, ताकि दूर-दराज के लोगों को चिकित्सकीय लाभ मिल सके।
आप अल सुबह क्षेत्र निरीक्षण पर पहुंच जाती हैं?
जी हां, यदि योजनाओं की वास्तविक हकीकत मालूम करनी है तो यह आवश्यक कदम है। नगर-निगम की योजनाएं लोगों तक पहुंच पा रही हैं या नहीं, इसके लिए कभी-कभी तो सुबह 6 बजे बस्तियों में पहुंच जाती हूं। इसका प्रभाव देखा गया है। नगर-निगम का अमला सक्रिय हो गया है। लोगों की छोटी-मोटी शिकायतें फील्ड पर जाने से तुरंत दूर हो रही हैं। लोगों का शासन-प्रशासन पर विश्वास बढ़ा है। अगला काम राजस्व प्रकरणों के निपटान का है, ताकि किसानों की लंबे समय से चल रही परेशानियों को दूर किया जा सके।
आपने पर्यटन विकास निगम में बतौर एमडी रहते हुए काफी नवाचार किए थे, क्या जिले में कोई नवाचार अपनाया गया है?
पर्यटन विकास निगम में योजनाओं का एक रोडमैप बनाकर उस पर काम करना आसान था। वहां बनाया गया फार्मेट लंबे समय तक रहता है। अपने सीनियर्स से सीखा है कि सिस्टम को दुरूस्त रखो। वह ठीक रहेगा तो काम तीव्र गति से बढ़ेगा। जिले में बतौर कलेक्टर अभी आए कम वक्त ही हुआ है, इसलिए नवाचार से महत्वपूर्ण है पहले सिस्टम की खामियों को सुधारा जाए। यदि विभागीय कॉर्डिनेशन ही सहीं नहीं होगा तो आप चाहे जितना काम कर लें, सफल क्रियान्वयन में दिक्कतें होंगी।
सुनने में आया आप अधिकारियों की क्लास लेती है? बकायदा ब्लैक बोर्ड पर उन्हें योजनाएं समझाती है?
हंसते हुए, जी हां, ब्लैक बोर्ड पर समझा जरूर देती हूं, लेकिन वह क्लास नहीं कहलाएगी। किसी भी शासकीय योजनाओं का रोडमैप जो मेरे दिमाग में होता है, उसे एक-एक विभाग के अधिकारी को अलग-अलग समझाने के बजाय सबको एकसाथ बताया जाता है, ताकि कंफ्यूजन न रहें। योजनाओं का खाका सबके पास समान रूप से पहुंचे।

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