क्या मोहब्बतों के नर्म -गर्म मौसम लौटा सकेगा …नंगे बदन बच्चों का सत्याग्रह ….!

शमीम ज़हरा मध्यप्रदेश सरकार में वरिष्ठ अधिकारी रहीं है वे मप्र कैडर के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी शकील रजा साहब की धर्मपत्नी होने के साथ – साथ सामाजिक कार्यकर्ता और सम्वेदनशील लेखिका भी हैं .देश में मौजूदा हालातों से द्रवित होकर उन्होंने भारत की वसुधैव कुटुम्बकम् की तहज़ीब को नये संदर्भों से जोड़ते हुए बचपन के सांप्रदायिक सदभाव की बड़ी मार्मिक तस्वीर खीची है . शमीम ज़हरा जी ने CAB और NRC से उत्पन्न हो रहे वातावरण पर चिंता जताई है और उम्मीद की है की जैसा भयग्रस्त वातावरण बन रहा है वे विषैले बादल जल्दी ही छटेंगे . पढ़िए उनका भावुक कर देने वाला ये शब्दचित्र ..////

***डेढ़ बजा है, मोबाइल फ़ोन पर फ़ेसबुक की शेयरिंग और यू ट्यूब पर वीडियोज़ देख देख कर थक गई हूँ।आँखें बार बार धुन्धला जाती हैं, लेट जाती हूँ फिर नोटिफ़िकेशन की आवाज़ पर मोबाइल उठा लेती हूँ। CAA क़ानून बन चुका है, NRC आने को है।हर पल जैसे किसी अनहोनी की दहशत है। देश में तेज़ी से बदलते हुए हालात लगातार चिन्ता को बढ़ा रहे हैं। इतनी विचलित मैं कभी नहीं थी।

सोचती हूँ कि मैं जो प्रकृति की खूबसूरती की दीवानी हूँ कई दिन से मैं ने सुबह का उगता हुआ या शाम का ढलता सूरज नहीं देखा है। चाँद पूरा होकर अब घटने लगा होगा।चांदनी और दिसम्बर की सर्द हवा महसूस करने के लिए मैं अब छत पर भी नहीं ठहरती। बस सुबह से शाम तक जल्दी जल्दी मशीन की तरह ज़रूरी काम निपटाती हूँ और मोबाइल देखने लगती हूँ।
पलंग पर लेट कर आँखें बन्द करते ही कई मन्ज़र जैसे जीवन्त हो जाते हैं।

“चलो बीबी पूस का महीना है बहुत ठण्ड है कमरे में चलो” दादी ने चूल्हे से लकड़ी के अँगारे चिमटे से अँगीठी में भरते हुए कहा और हाथों में अँगीठी थामे दादी आगे और वह पीछे कमरे में आ गई हैं। कमरे में अँगीठी रखने से कुछ देर में ही कमरा गर्म होने लगता है।
1955-56 का ज़माना है। उसकी उम्र 5-6 साल है। दादी को वह अम्माजी कहती है ।उनके पास ही वह भी बिस्तर में घुस गई है।।कमरे में लालटेन की मद्धम रौशनी है।छोटे बहिन भाई रज़ाइयों में अम्मी के साथ सो गए हैं। दादी ने कल उसे अँग्रेज़ी महीनों के नाम याद कराए थे। उस ने पूछा “अम्मा जी ये पूस कौन सा महीना होता है? कल याद कराए गए महीनों में तो नहीं था।”
” वो अँग्रेज़ी महीने हैं। पूस का हमारा सरदी का महीना होता है बी बी। हमारे मुल्क के मौसमों से मेल खाने वाले ये हिन्दी महीने ही हैं। अगला महीना माघ का है गंगा नहान का महीना, फिर फागुन में होली होगी, हमारा साल चैत से शुरु होता है, चैत बैसाख जेठ असाढ़ सावन भादों……. ” और दादी ने धीरे धीरे अगले एक दो साल में ही हिन्दी महीनों के नाम बताने के साथ साथ साल भर में हर महीने में होने वाले हिन्दोस्तानी त्यौहार ,पतझड़, वसन्त, गरमी, बरखा, सरदी, फ़सलें धीमे धीमे ऐसे समझाईं कि हिन्दी महीनों के सारे रंगों से मन रंग गया। अपनी ज़मीन की खुशबू वजूद में बस गई।

वह देश के बटवारे के बाद पैदा हुई थी धीरे धीरे नगीना क़स्बे के मौहल्ला सरायमीर के मुस्लिम परिवार पाकिस्तान जा चुके थे या जा रहे थे। सबके कहने के बाद भी उसकी दादी और पिता ने हिन्दोस्तान में रहना पसन्द किया था, क्योंकि यह गाँधी और नहरू का मुल्क था यह उस तहज़ीब का मुल्क था जहाँ सारे मज़हब मिलजुलकर रहने वाले थे।

दीवाली पर सारे घर की सफ़ाई होती, अब्बामियाँ मिटटी के दिये, खिलौने, लोबान, क़न्दील, खीले बताशे और मिठाई के बने हाथी घोड़े आदि सब सामान लाते थे। वह देखती दीवाली की शाम दादी घर के कोने कोने में लोबान की धूनी देतीं और दिये जलाती थीं। दालान में रंगीन काग़ज़ों से बनी ख़ूबसूरत क़न्दील में दिया रख कर टांग दिया जाता और घर रंगीन रौशनी से भर जाता था। ताक़ों में रखे दिये झिलमिलाते थे। सब बच्चे मिठाई के बने हाथी घोड़े आदि खाते और खील-बताशों से अपने मिट्टी के खिलौना बरतन भर लेते और हफ़्ता भर तक खेलते थे।

मौहर्रम में घर में इमाम हुसैन अ. स. की मजलिसें होतीं तो मरदानी मजलिस में अब्बामियाँ के तमाम हिन्दू दोस्त आते थे। एक बार जब हज़रत अब्बास की शहादत की मजलिस में उनके एक हिन्दू दोस्त ने जोश में आकर ज़ोर ज़ोर से “जलदाता अब्बास की जय” के नारे लगाये थे तो सब हैरान हो गए थे।
ईद पर अब्बामियाँ के दोस्त बैठक में सिवैय्यां खाने आते। रक्षा बन्धन, जन्माष्टमी और रामनवमी भी उसी तरह त्यौहार थे जैसे ईद और बक़राईद । सब से ज़यादा ख़ास थी दशहरा के पहले से शुरू होने वाली रामलीला, जो दीवाली तक चलती थी। अब्बामियाँ रामलीला समिति के सेक्रेट्री रहते थे । पैट्रोमैक्स (तेज़ रौशनी वाली लालटैन) की रौशनी में राम-जन्म, राम वनवास, सीताहरण से ले कर सीता वन गमन तक सारे नाटक रामलीला बाग के पास मैदान में बने मंच पर खेले जाते थे जिनकी भाषा उर्दू होती थी। ये सब उस ने अब्बामियाँ के साथ जा जाकर सब से आगे दरी पर बैठ कर देखे।

क़ुरान और उर्दू उसने घर पर और मौहल्ले की उस्तानी से पढ़ ली थी। लड़कियों के इस्लामिया स्कूल में जब उसे कुछ बड़ी शरारती लड़कियों ने परेशान किया तो अब्बामियाँ ने उसे वैदिक कन्या पाठशाला में दाख़िल करा दिया। यह ज़बरदस्त फ़ैसला था।जिसने न सिर्फ़ उसके और उसकी बहिनों के लिए बल्कि क़स्बे की दूसरी मुस्लिम लड़कियों के लिए भी शिक्षा के दरवाज़े खोल दिए। वहाँ बेहद प्यार करने वाली शिक्षिकाएँ थीं, पाँचवीं तक टाट पट्टी पर बैठ कर पढ़ा फिर बैंच और डेस्क पर।

नौवीं कक्षा में संस्कृत और संगीत में एक विषय चुनना था। सभी लड़कियाँ संगीत में चली गईं तीन दिन तक लक्ष्मी बहिनजी ने समझाया लेकिन कोई लड़की संस्कृत लेने को तैयार न थी। उसने सहमति में हाथ उठाया तो नाम पूछने पर उन्हें उसका मुस्लिम होना ज्ञात हुआ। वे कुछ देर चुप रहीं फिर बोलीं “घर से अनुमति लाओगी तो ज़रूर पढ़ाऊँगी”
दादी को बताया तो उन्होंने अब्बामियाँ से अनुमतिपत्र लिख कर देने के लिए कहा और ये भी कहा कि ज़बान कोई भी हो जब मौक़ा मिले तब सीख लेनी चाहिए।
उसके बाद पाँच और लड़कियाँ भी इस विषय को पढ़ने के लिए कक्षा में शामिल हो गईं।
“लक्ष्मी बहिन जी” यह नाम भर ही उसके मन को प्रेम और सम्मान से भर देता है, वह शिक्षिका जिसने देवभाषा पढ़ाने के साथ ही शुद्ध आचार, विचार दिए और जीवन में सत्य और सादगी की नींव रख दी । उनके द्वारा स्नेहपूर्वक पढ़ाई गई भाषा हमेशा वरदान सिद्ध हुई ।

आह कहाँ गए मेरी दादी, मेरे पिता और मेरी शिक्षिका जैसे लोग !! कहाँ गुम हो गए इस देश इस धरती की तहज़ीब को बनाने और बचाने वाले!!

सुबह के तीन बज गए हैं रात गुज़रने को है, दिन भर देश के कोने कोने में कालिज, यूनिवर्सिटीज़ में बच्चों के प्रदर्शन और पुलिस की बर्बरता की ख़बरों से सोशल मीडिया भर गया है। हिंसा करने वाले शान्तिपूर्ण प्रदर्शनों को फ़ेल करने की साज़िश में संलग्न हैं। मान लें कि एक्ट वापिस हो जाए तो भी नफ़रत का जो ज़हर फैल चुका है उसका क्या होगा? और वापिस न हुआ तो इस देश का क्या होगा ओह कल्पना भी मुश्किल है।
सुबह होने को है बहुत ठण्ड है।मैंने बिस्तर छोड़ दिया है। कहीं दूर कुछ बच्चे नंगे बदन सत्याग्रह कर रहे हैं क्या उनका संघर्ष इस रात की सुबह ला सकेगा ????? क्या मौहब्बतों के नर्म गर्म मौसम लौटेंगे ?????
शमीम ज़हरा

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