तमाम क्षेत्रों में बदलाव ,हमारी नौकरशाही में परिवर्तन क्यों नहीं:उदित राज

उदित राज
भाजपा सांसद/पूर्व नौकरशाह  //न्यायपालिका, कार्यपालिकाएवं आर्थिक व्यवस्था आदि क्षेत्रों में तमाम बदलाव आए हैं, लेकिन देश की नौकरशाही में स्थिति लगभग वैसी ही है। उसमें कोई बदलाव दिखाई नहीं देता। इसका मुख्य कारण यह है कि जिस एक विशेष सरकारी सेवा का आधिपत्य है वह किसी भी हालत में मौजूदा स्वरूप बदलने नहीं देना चाहती है। सातवें वेतन आयोग ने अपने सिफारिश में बदलाव के सुझाव दिए हैं, लेकिन उसकी इन सिफारिशों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। वे बेअसर रहीं। वेतन आयोग ने वेतन पदोन्नति और डेप्यूटेशन में सभी सेवाओं को बराबर अवसर देने की बात कही है, जो दो अतिरिक्त क्रमोन्नतियां (इन्क्रीमेंट) भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के अधिकारियों को मिलते थे, उन्हें भी खत्म करने का सुझाव दिया गया है।

आईएएस ने सारी ताकत अपने अधीन रख ली

सभी सेवाओं में कैडर के ढांचे के कारण जो ठहराव और निराशा व्याप्त है उसे दूर करने के लिए कदम उसी विभाग के सचिव को उठाने हैं कि कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) के सचिव को। जिसका 17 वर्ष का सेवा काल पूरा हो गया हो, वह चाहे जिस सेवा का हो, संयुक्त सचिव पद के डेप्यूटेशन के लिए उपयुक्त माना जाएगा। वेतन आयोग के चेयरमैन ने अपना अनुभव रिपोर्ट में इस तरह से व्यक्त किया, ‘समय अंतराल के साथ आईएएस ने सारी ताकत अपने अधीन रख ली और दूसरी सेवाओं के लोगों को पीछे धकेल दिया। सभी जगह चाहे प्रशासनिक हो या तकनीकी पद, आईएएस अधिकारी बैठ गए हैं और यही दूसरी सेवा के अधिकारियों की समस्या का कारण है। अब समय गया है कि विभिन्न क्षेत्रों में सामान्य ज्ञान वालों की बजाय विशेषज्ञों को महत्व दिया जाए। यदि सबको समान और बराबर अवसर नहीं दिए गए तो भारतीय प्रशासनिक सेवा और अन्य सेवाओं के अधिकारियों के बीच दूरी बढ़ेगी और उससे अराजकता की स्थिति का जन्म होगा, जो देश की शासन-व्यवस्था के लिए उचित नहीं होगा।

अन्य सेवाओं के लोगों के साथ भेदभाव स्पष्ट
अभी तक यह व्यवस्था रही है कि वेतन आयोग की रिपोर्ट आने के बाद उसकी सिफारिशों को लागू करने के लिए एक समिति बनती थी, जिसे एम्पावर्ड ग्रुप ऑफ सेक्रेटरीज कहा जाता है। वेतन आयोग की सिफारिशों का अध्ययन करने के लिए 13 लोगों की ऐसी एक समिति बनाई गई, जिसमें आठ कार्यरत या सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी, एक वैज्ञानिक और अन्य सेवाओं के चार अधिकारी थे। समिति की इस रचना से अन्य सेवाओं के लोगों के साथ भेदभाव स्पष्ट हो जाता है। वेतन आयोग ने सिफारिश की है कि प्रत्येक विभाग के सचिव के द्वारा कैडर की पुनर्रचना की जाएगी कि कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) द्वारा। आयोग ने ऐसी सिफारिश इसलिए की थी कि डीओपीटी, जिसे प्रत्येक पांच वर्ष पर कैडर का पुनरीक्षण करना चाहिए, वह नहीं हो पा रहा था, जिससे दूसरी सेवा के अधिकारियों की हालत खराब होती जा रही है। इसके बावजूद एम्पावर्ड ग्रुप ऑफ सेक्रेटरीज की समिति ने अन्याय करते हुए फिर डीओपीटी को ही यह अधिकार दे दिया।

आईएएस में कोई बदलाव नहीं हुआ

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि दूसरे क्षेत्र में तमाम सारे बदलाव हुए हैं, लेकिन भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में कोई बदलाव नहीं हुआ। वेतन आयोग कि सिफारिशें लागू की जा सके इसके लिए इस बार चतुराई से एक टास्क फोर्स बनाने के लिए 22 अगस्त 2016 को ऑफिस मेमोरेंडम जारी किया गया, जिससे फिर दूसरी सेवाओं के मामले उसी चक्रव्यूह में फंस गए। इस ऑफिस मेमोरेंडम के दौरान फिर से डीओपीटी सेक्रेटरी को अधिकार दे दिए गए कि वही अन्य सेवाओं का पुनरीक्षण करेगा। एक टास्क फोर्स अतिरिक्त सचिव डीओपीटी टी.जैकब के नेतृत्व में बनाया गया, जो एचएजी श्रेणी के हैं। हास्यास्पद यह है कि वे अपने स्तर के ही नहीं, बल्कि उच्च स्तर के अधिकारियों की सेवाओं के बारे में भी फैसला करेंगे।

34 ग्रुप सर्विस के कैडर ढांचे के बारे में अध्ययन

टास्क फोर्स का मकसद यह था कि यह कैडर ढांचे का विस्तृत अध्ययन करेगा, लेकिन बड़ी चतुराई से अन्य अखिल भारतीय सेवाओं को अधिकार क्षेत्र से बाहर कर दिया गया और अब 34 ग्रुप सर्विस के कैडर ढांचे के बारे में अध्ययन होगा। इस ऑफिस मेमोरेंडम का मकसद एक विस्तृत अध्ययन करना था ताकि ग्रुप ‘ए’ सर्विसेज की सेवाओं का अध्ययन करके जो अनियमितताएं और विसंगतियां हैं उनका समाधान किया जा सके। अगर भारतीय प्रशासनिक सेवा कोे भी जांच-पड़ताल के दायरे में रखते तो उसकी बेस्ट प्रैक्टिसेस दूसरी सेवाओं में लागू होतीं, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। ह भी हास्यास्पद है कि कैडर कंट्रोलिंग अथॉरिटी से कहा गया कि वह 22 अगस्त 2016 को ऑफिस मेमोरेंडम जारी होने के 15 दिनों के भीतर सुझाव दे। छह दिन तो ऑफिस मेमोरेंडम जारी करने में ही लगा दिए गए। दूसरा ऑफिस मेमोरेंडम 1 सितंबर 2016 को जारी कर कहा गया कि सुझाव 6 सितंबर तक मिल जाने चाहिए, जिसमें केवल पांच दिन मिलते हैं और उसमें से दो दिन छुट्‌टी के निकल गए। क्या यह संभव है कि तीन दिन में विभाग अपनी सेवाओं से संबंधित समस्याओं का पता लगाकर उससे संबंधित सुझाव दे सकें जब टास्क फोर्स को तीन महीने मिले हैं तब क्यों नहीं विभिन्न सेवाओं के कैडर कंट्रोलिंग अथॉरिटीज और सर्विसेज संगठनों को सुझाव देने के लिए उतना ही समय दिया जाता।

सरकारी सेवाओं में तो प्रोफेशनलिज्म आना ही चाहिए

राजनीति में बड़ा परिवर्तन हो चुका है यूपीए ने तो एक अर्थशास्त्री को प्रधानमंत्री बनाया, क्योंकि नई आर्थिक चुनौतियां खड़ी हो गई थीं, जबकि ऐसी आवश्यकता नहीं थी। राजनीतिज्ञ को विशेषज्ञ होना जरूरी नहीं है, लेकिन फिर भी वहां प्रोफेशनलिज्म आता जा रहा है। ऐसे में सरकारी सेवाओं में तो प्रोफेशनलिज्म आना ही चाहिए।
मेरा आईएएस अधिकारियों से पूर्वग्रह नहीं है, लेकिन सभी सेवाओं से बेहतरीन अधिकारियों को सेवाएं देने का मौका मिलना चाहिए। एक समय था जब आईएएस को अतिरिक्त पेपर देना पड़ता था, लेकिन अब वह खत्म हो चुका है और जो भी इस समय सिविल सेवा से चुनकर रहे हैं, उनकी बौद्धिक क्षमता जांचने के मानक समान हैं। जो लोग यूपीएससी पास कर चुके हैं अगर उन्हें दोबारा परीक्षा में बैठाया जाए तो केवल मेरिट के क्रम में उथल-पुथल मच जाएगी बल्कि कई पास ही नहीं हो पाएंगे। जब आज राजनीति सहित सभी क्षेत्रों में परिवर्तन आता जा रहा है तो हमारी नौकरशाही में क्यों नहीं?
(येलेखक के अपने विचार हैं)
संदर्भ… सातवेंवेतन आयोग की सिफारिशें और अखिल भारतीय सेवाओं में पेशेवर अंदाज का अभाव
उदित राज
भाजपासांसद और चेयरमैन, अनुसूचित जाति-जन जाति संगठनों का अखिल भारतीय परिसंघ
dr.uditraj@gmail.com

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