ढाई साल पुरानी प्रदेश की मनोहरलाल खट्टर सरकार में किस्सा कुर्सी का शुरू : पार्टी एक, गुट अनेक

दिनेश भारद्वाज//‘पुरानी हरियाणवी कहावत है। ‘…बारात में, सारे ठाकुर। हुक्का-पानी कौन करे’! यह कहावत ढाई साल पुरानी प्रदेश की मनोहरलाल खट्टर सरकार पर अक्षरश: सही साबित होती है। राज्य में मुख्यमंत्री की कुर्सी एक है, लेकिन दावेदार एक दर्जन से ज्यादा। ऐसे में शपथ ग्रहण के दिन से ही ‘अंदरुनी कलह’ के ‘बीज’ पड़ गये थे। हरियाणा भाजपा में फिलहाल करीब एक दर्जन नेता ऐसे हैं, जो रोजाना मुख्यमंत्री की कुर्सी का ख्वाब लिए नयी अचकनें सिलवा रहे हैं। अभी तक खट्टर के ‘रंगीन वस्त्र’ इन सभी की महत्वाकांक्षाओं पर भारी पड़े हैं, लेकिन आने वाला समय न केवल उनके लिए, बल्कि पूरी हरियाणा भाजपा के लिए ‘पथरीली डगर’ साबित होने जा रहा है।

26 अक्तूबर, 2014। जी हां, यही वह ऐतिहासिक दिन था, जब पहली बार 47 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत वाली भाजपा सरकार का शपथ ग्रहण समारोह हुआ। बरसों बाद यह पहला मौका था, जब मुख्यमंत्री व मंत्रियों का शपथ ग्रहण समारोह राजभवन के बजाय पंचकूला के खुले मैदान में हुआ। पीएम नरेंद्र मोदी भी समारोह के गवाह बने। बनते भी क्यों नहीं, उनके ‘पसंदीदा’ मनोहरलाल राज्य के सीएम के रूप में शपथ जो ले रहे थे। हरियाणा से पुराना लगाव भी मोदी को यहां खींच लाया था। हरियाणा मामलों के प्रभारी होते हुए ही तो वे गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे।
2014 के लोकसभा चुनाव में जब भाजपा ने अपने हिस्से की 8 में से सात सीटों पर जीत हासिल की तो उसी दौरान प्रदेश भाजपा के एक दर्जन के करीब नेताओं ने मुख्यमंत्री के सपने लेने शुरू कर दिये थे। इनमें चौधरी बीरेंद्र सिंह और राव इंद्रजीत सिंह सरीखे वे नेता भी शामिल रहे, जो ताजा-ताजा ही ‘भगवा’ रंग में रंगे थे। मनोहरलाल खट्टर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनेंगे, यह उम्मीद तो शायद भाजपा के उन नेताओं को भी नहीं थी, जो प्रदेश में दशकों से भाजपा का झंडा उठाए हुए थे।
अक्तूबर-2014 में जब विधानसभा चुनावों के नतीजे आये तो मुख्यंमत्री के तथाकथित दावेदारों ने दिल्ली दरबार में लॉबिंग शुरू कर दी, लेकिन पार्टी नेतृत्व तो पहले ही मनोहरलाल के नाम पर मन बना चुका था। हालांकि बाद में यह बात भी आईने की तरह साफ हो गयी कि मनोहरलाल का मुख्यमंत्री पद के लिए चयन चुनाव से पहले ही हो चुका था। चूंकि जिस तरह से खट्टर को एकाएक करनाल से चुनावी मैदान में उतारा गया, वह सभी को हैरान करने वाला था। इससे पहले खट्टर बेशक संगठन में रहे हों, लेकिन हरियाणा में उनकी सक्रियता कभी नज़र नहीं आयी।
प्रदेश सरकार में कई विधायक तो ऐसे हैं, जिन्होंने चुनाव ही मुख्यमंत्री की दावेदारी के साथ जीता। इसमें भी कोई दो-राय नहीं हो कि केंद्रीय नेतृत्व ने भी इसे हवा देने में कसर नहीं छोड़ी। केंद्र के अलग-अलग नेताओं ने हरियाणा में अलग-अलग नेताओं को ‘अगला मुख्यमंत्री’ प्रोजेक्ट किया। इसी वजह से कई ऐसी सीटें भी भाजपा ने जीती, जो पूरी तरह से फंसी हुई थीं। अगर देखा जाए तो आमतौर पर यह फार्मूला कांग्रेस भी अपनाती रही है। जिन राज्यों में मुख्यमंत्री पद के अधिक दावेदार होते हैं, वहां मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित किए बिना ही चुनाव लड़े जाते रहे हैं। भाजपा द्वारा हरियाणा में अपनाया गया यह फार्मूला सही साबित हुआ।
विधायकों में नाराज़गी इसलिए
मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए अंदरखाने चलने वाली खींचतान के बीच सबसे बड़ा सवाल है उन 16 विधायकों की नाराज़गी का, जो अपनी ही सरकार के खिलाफ झंडा बुलंद किए हुए हैं। बातचीत में इनमें से एक भी विधायक नेतृत्व परिवर्तन के पक्ष में नहीं है, लेकिन सीएम की कार्यशैली किसी को पसंद नहीं है। अधिकारियों द्वारा सुनवाई नहीं करने और सरकार में काम नहीं होने से ये विधायक दुखी हैं। कुछ विधायकों में राजनीतिक एडजस्टमेंट को लेकर भी मलाल है। जातीय व क्षेत्रीय समीकरण भी बताए जा रहे हैं। अधिकारियों एवं कर्मचारियों के तबादलों में विधायकों की सुनवाई नहीं होना भी नाराज़गी का एक कारण है।

और भी रोचक पहलू

  • खट्टर सरकार के कई मंत्री जहां इस बात से नाखुश हैं कि सीएम उनकी नहीं सुनते। अधिकारियों द्वारा भी अनदेखी की जाती है।
  • विधायक इस बात को लेकर भी असंतुष्ट हैं कि मंत्री उनकी अनदेखी करते हैं। जिलों में दौरों के दौरान उन्हें सूचना तक नहीं दी जाती।
  • पार्टी नेता व कार्यकर्ता इस बात को लेकर नाराज़ हैं कि न तो उनकी एडजस्टमेंट हो रही है और न ही सरकार में उनकी सुनवाई होती है।

करें भी तो क्या करें
भाजपा विधायकों की नाराज़गी का एक बड़ा कारण यह भी है कि अब उन्हें अगले विधानसभा चुनाव नज़र आ रहे हैं। केंद्रीय नेतृत्व यह पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि लोकसभा के साथ ही हरियाणा के विधानसभा चुनाव होंगे। यानी लगभग छह महीने पहले राज्य में चुनाव होंगे। विधायकों का तर्क है कि वे चुनाव में लोगों के बीच क्या लेकर जाएंगे। जब उनकी ही सुनवाई नहीं होती तो वे लोगों का काम क्या करवाएंगे। इसी दुविधा और उधेड़बुन के बीच नाराज़गी और गहरी होती जा रही है।

सीएम मनोहरलाल खट्टर के प्लस प्वाइंट

  •  संघ का आशीर्वाद होने की वजह से सीएम कुर्सी तक पहुंचे।
  •  नरेंद्र मोदी के भी पसंदीदा नेताओं में होती है गिनती।
  •  साफ-सुथरी और ईमानदार छवि के चलते पड़े कइयों पर भारी।

माइनस प्वाइंट

  • अनुभव की कमी, किसी पर भरोसा नहीं। केवल अफसरों के सहारे।
  • जाट आंदोलन में सरकार का फेल होना, आग के हवाले हुआ प्रदेश।
  • कैबिनेट सहयोगियों व विधायकों के साथ तालमेल का अभाव।

दावेदार दिग्गज

चौधरी बीरेंद्र सिंह
biredner singh 24jnduch6जब से राजनीति में आये हैं, मुख्यमंत्री बनने का सपना मन में पाले हुए हैं। 38 वर्षों तक कांग्रेस में सक्रिय रहे, लेकिन वहां बात नहीं बनी। 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस छोड़ हाथों में थामा ‘कमल’, सपना फिर भी बरकरार। भाजपा में नये लोगों को कुर्सी सौंपने का रिवाज नहीं। मौजूदा सरकार और माहौल में जाट के सिर सेहरा बंधने की संभावनाएं न के बराबर। प्रदेश में सरकार से नाराज़ विधायकों में उनकी पत्नी व उचाना कलां से विधायक प्रेमलता भी शामिल हैं।
                                                                                      राव इंद्रजीत सिंह
 अहीरवाल के बड़े नेता हैं। कांग्रेस में रहते हुए मुख्यमंत्री पद के लिए लड़ते रहे। भूपेंद्र सिंह हुड्डा के सामने कांग्रेस में नहीं मिला भाव तो चुन ली नयी राह। भाजपा में शामिल हुए और गुरुग्राम से सांसद बने। मोदी सरकार ने केंद्र में राज्य मंत्री तो बनाया, लेकिन सीएम बनने का ख्वाब यहां भी पूरा नहीं हुआ। असंतुष्ट विधायकों में आधे से ज्यादा का नेतृत्व करते हैं। दक्षिण हरियाणा की चौधर का नारा देते रहे हैं। अब रामबिलास शर्मा से नजदीकियां बढ़ाई हुई हैं।
                            कृष्णपाल गुर्जर
मूल रूप से फरीदाबाद में सक्रिय राजनीति कर रहे कृष्णपाल गुर्जर के पास अनुभव की कोई कमी नहीं है। विधानसभा के दो बार सदस्य रहे हैं। केंद्र और प्रदेश की राजनीति में उनका अच्छा दखल माना जाता है। मोदी सरकार में राज्यमंत्री भी हैं, लेकिन दोनों हाथों में लड्डू रखने की रणनीति पड़ रही भारी। मोदी सरकार के शुरुआती दिनों में ही एक घटनाक्रम से आये चर्चाओं में। सड़क एवं राजमार्ग मंत्रालय लेकर सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय में भेजना इसी घटनाक्रम का नतीजा।
प्रो. रामबिलास शर्मा
rambilas sharma and rav inderjit singhभाजपा के अकेले ऐसे नेता हैं, जो पिछले करीब चालीस साल से पार्टी का झंडा उठाये हुए हैं। 2014 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव उन्हीं के नेतृत्व में लड़े गये। पार्टी प्रदेशाध्यक्ष भी रहे हैं और पहले भी दो बार कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं। खट्टर सरकार में दूसरे नंबर के मंत्री का दर्जा तो मिला है, लेकिन राजनीतिक आकांक्षाएं अभी तक पूरी नहीं हुईं। सीएम की दावेदारी में सबसे ऊपर होते थे, लेकिन बाजी मार ले गये खट्टर। प्रदेश की राजनीति में मास लीडर के रूप में जाने जाते हैं।
कैप्टन अभिमन्यु
Capt. Abhimanyuपहली बार विधायक बने हैं। पेशे से बिजनेसमैन हैं। नारनौंद से चुनाव लड़ा तो खुद को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार प्रोजेक्ट किया। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह भी चुनावी रैली में आये और उन्हें परोक्ष रूप से सीएम पद का दावेदार बताया। गैर-जाट की सरकार होने की वजह से इस जाट नेता की उम्मीदों पर पानी फिरा। उपमुख्यमंत्री के नाम की भी चर्चाएं हुई, कई मंत्रियों-विधायकों के विरोध के चलते यह मामला भी बीच में लटक गया। मनोहर कैबिनेट के सबसे हेवीवेट मंत्री हैं।
ओमप्रकाश धनखड़
Om Parkash Dhankhar 1-bhiwaniजाट समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे ओमप्रकाश धनखड़ ने भी चौधर की लड़ाई लड़ी है। उन्होंने पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा का गढ़ कहा जाने वाले जाटलैंड के बादली हलके में सेंध लगाई है। चुनाव लड़ते हुए कहा करते थे इलाके की ‘चौधर’ बरकरार रहेगी, लेकिन बात नहीं बनी। मोदी के करीबियों में गिने जाते हैं, लेकिन जाट को मुख्यमंत्री बनाना मौजूदा हालात में पार्टी नेतृत्व के लिए संभव नहीं। संघ भी यह ‘जोखिम’ उठाने के मूड़ में नहीं दिखता। अभिमन्यु के बाद दूसरे हेवीमेट मंत्री हैं।

             अनिल विज
Anil Vijकोई इन्हें ‘गब्बर’ कहता है तो कोई ‘दाढ़ी वाला बाबा’। गलत बात न तो अधिकारियों की बर्दाश्त करते हैं और न ही अपनी सरकार की। पांचवीं बार विधायक बने हैं। एक बार भाजपा को छोड़ भी चुके हैं और निर्दलीय भी चुनाव जीते हैं। इलाके के लोगों पर अच्छी पकड़ है। भाजपा का ‘एकला चलो’ के लिए मजबूर करने वाले भी अनिल विज ही हैं ।
कंवरपाल गुर्जर
Kanwarpalविधानसभा अध्यक्ष हैं। संघ में अच्छी पहुंच है। पार्टी के संकट के दौर के वरिष्ठ नेताओं में शामिल हैं। पहले भी विधायक रहे हैं। एसवाईएल की लड़ाई के दौरान इस्तीफा देने वाले भाजपा विधायकों में शामिल। सत्ता परिवर्तन की बयार में तेजी से नाम उभरा, लेकिन विधानसभा में भर्तियों पर लगे आरोपों ने छवि को नुकसान पहुंचाया।
           विपुल गोयल
vipul goel mlaफरीदाबाद से भाजपा विधायक हैं। खट्टर सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। मुख्यमंत्री बनने का उनका भी सपना है। अभी तक किसी विवाद से बेशक नाता नहीं है लेकिन उनके ही इलाके से सांसद और केंद्र में मंत्री कृष्णपाल गुर्जर खुद लॉबिंग में जुटे हैं।

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