जाँबाज अफसर की पूरी कहानी -गुनाहगारों के लिए खौफ  राजेश साहनी  ने खुद क्यों ले ली अपनी जान

लखनऊ से यूपी ब्यूरो प्रमुख//‘चार दिना दा मेला दुनिया, फिर मिट्टी दी बन गई ढेरी…,’हम जिन्होंने युद्ध नहीं किया, तुम्हारे शरीफ बेटे नहीं हैं जिंदगी…।’ सोशल मीडिया पर अपनी प्रोफाइल में इन पंक्तियों के साथ जीने वाले उत्तर प्रदेश के एटीएस हेडक्वॉर्टर में एएसपी राजेश साहनी ने खुद को गोली मार ली, इस बात पर कोई भी विश्वास करने को तैयार नहीं था। 29 मई की दोपहर जैसे ही यह खबर फैली हर कोई बोला कि कह दो यह झूठ है। वह खुदकुशी नहीं कर सकते हैं। सोशल मीडिया पर उनकी मौत पर दुख जताने के साथ ही सवाल उठाए जाने लगे।
जिस दौरान एएसपी राजेश साहनी की मौत हुई उस समय आईजी एटीएस असीम अरुण और एसएसपी जोगिन्दर कुमार वहीं मौजूद थे। आईजी एटीएस का कहना है कि उन्हें जानकारी नहीं थी कि राजेश ऑफिस आए हैं। वह 12 दिन की छुट्टी पर थे। उनका चालक मनोज उन्हें ढूंढता हुआ फर्स्ट फ्लोर पर स्थित उनके केबिन में गया था, लेकिन वह वहां नहीं मौजूद थे। वह उन्हें ढूंढता हुआ उनके नीचे वाले कमरे में आया। कमरा एक तरफ से अंदर से लॉक था। उसने आकर मुझे और एसएसपी एटीएस को बताया तब जाकर दरवाजा खोला गया। अंदर राजेश फर्श पर लहूलुहान पड़े थे। राजेश साहनी कुर्सी के पास फर्श पर खून से लथपथ पड़े थे. उनके दाहिने हाथ में पिस्टल थी. गोली दाहिनी कनपटी से घुसकर बाईं कनपटी से पार निकल गई थी. मौत से पहले उन्होंने अपनी पत्नी से फोन पर बात की थी और सामान्य थे.एडिशनल एसपी राजेश सहानी की मौत की खबर जिसने भी सुनी वह अवाक रह गया। उनके साथ काम करने वाले हर कर्मचारी और अधिकारी मौत की खबर पाकर एटीएस दफ्तर पहुंच गए। लोग इस बात का यकीन नहीं कर पा रहे थे कि राजेश साहनी जैसा बहादुर और शांत मिजाज का इंसान आत्महत्या कर सकता है। कुछ लोगों तो यह कह बैठे कि अगर राजेश साहनी जैसा इंसान टूट सकता है तो फिर कोई भी इंसान आत्महत्या कर सकता है।

पत्रकारिता छोड़कर आए थे पुलिस में
पटना के पूर्वी पटेल नगर के रहने वाले राजेश साहनी पुलिस सेवा में आने से पहले मीडिया से जुड़े थे। वह दिल्ली में दो निजी चैनल में कार्यरत रहे। बाद में वर्ष 1992 में उनका चयन प्रांतीय पुलिस सेवा में हो गया। उनकी मौत की खबर फैलते ही पत्रकारिता से जुड़े कई अहम लोगों ने उनके करीबियों से संपर्क किया। उत्तर प्रदेश पुलिस में राजेश साहनी की गिनती काबिल अफसरों में होती है। वे 23 मई को आईएसआई एजेंट को उत्तराखंड से गिरफ्तार करने वाले ऑपरेशन में शामिल थे। इसके अलावा एटीएस में रहते हुए साहनी ने कई बड़े ऑपरेशन को अंजाम दिया था।राजेश साहनी 2013 में अपर पुलिस अधीक्षक बने थे। वह मूलतः बिहार के पटना के शास्त्रीनगर थाना क्षेत्र के पूर्वी पटेल नगर के निवासी थे। लखनऊ में वह अपनी पत्नी और बेटी के साथ रहते थे। उनकी शिक्षा भी पटना में ही हुई थी।|
1969 में जन्मे राजेश साहनी ने एमए राजनीति शास्त्र से किया था। राजेश साहनी ने बीते सप्ताह आईएसआई एजेंट की गिरफ्तारी समेत कई बड़े ऑपरेशन को अंजाम दिया था।

राजेश साहनी के चर्चित केस

उत्तर प्रदेश पुलिस के काबिल अधिकारियों राजेश साहनी की गिनती होती है। बीते सप्ताह आईएसआई एजेंट की गिरफ्तारी समेत कई बड़े ऑपरेशन को राजेश साहनी ने अजाम दिया था

– 23 मई, 2018 में साहनी ने उत्तराखंड मिलिट्री इंटेलिजेंस और उत्तराखंड पुलिस के साथ मिलकर आईएसआई एजेंट रमेश सिंह को गिरफ्तार किया था।

– साहनी लंबे वक्त से आतंकी संगठनों के स्लीपर मॉड्यूल के खिलाफ काम कर रहे थे। मार्च, 2016 में लखनऊ में मारे गए आतंकी के ऑपरेशन को उन्होंने लीड किया था।

ह बतौर सीओ जहां-जहां तैनात रहे, लोगों का दिल जीतते रहे। लोग उनके सरल और शांत स्वभाव की मिसाल देते नहीं थकते। बहराइच सीओ सिटी पद से जब उनका तबादला हुआ तो बहराइच की जनता तबादला रोकने की मांग पर अड़ गई थी। इसके बाद लखनऊ में वह बतौर सीओ कैसरबाग और सीओ चौक तैनात रहे थे।

दंगा भड़का तो अहम भूमिका निभाई
कैसरबाग में तैनाती के समय दंगा भड़क गया था। इसमें उन्होंने अहम भूमिका निभाते हुये दोनों पक्षों को न सिर्फ शांत कराया था बल्कि दूसरे दिन ही सबको अपने सामने गले तक मिलवा दिया था। वर्ष 2013 में उनका एडिशनल एसपी के पद पर प्रमोशन हुआ। इसके बाद उन्होंने करीब दो वर्ष तक एनआईए में सवाएं दी और जुलाई 2014 में यूपी एटीएस में जिम्मेदारी संभाली।

अधिकतर ऑपरेशन खुद किए लीड 
राजेश साहनी स्वभाव से जितने सरल और शांत थे। उतने ही बहादुर और निडर अधिकारी भी थे। 7 मार्च 2017 को उन्होंने काकोरी की हाजी कालोनी में खुरासान माड्यूल से जुड़े सैफउल्ला को कई घंटे चले ऑपरेशन के बाद मार गिराया था। एनकाउंटर के दौरान मौजूद एक अधिकारी ने बताया कि जिस वक्त एटीएस और सैफउल्ला के बीच मुठभेड़ चल रही थी।  राजेश साहनी बिना बुलेट प्रूफ जैकेट के सबसे आगे खड़े थे। इसके अलावा वह एटीएस के अधिकतर ऑपरेशन को खुद लीड करते थे।

याद किए जाएंगे जांबाजी के ये किस्से 

राजेश साहनी को करीब से जानने वाले बताते हैं कि वह व्यक्तिगत जीवन में जितने सौम्य थे, अपराधियों के लिए उतने ही कड़े मिजाज. उनकी कहानियां आज यूपी पुलिस की गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई हैं. साल 2006 की बात है. शाम का समय था. उस वक्त सहारागंज की ओर से एक जीप तेजी से आती हुई दिखी. उस पर एक पार्टी का झंडा लगा था.

राजेश साहनी की हिम्मत की कहानी

दैनिक जागरण में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, उस जीप के बोनट के निचले हिस्से में राजेश साहनी लटके हुए रोकने के लिए चिल्ला रहे थे. कुछ दूर घूमने के बाद जीप सवार उसे लेकर एसएसपी ऑफिस के अंदर दाखिल हो गए. बताया गया कि सत्ताधारी दल से जुड़े 5 दबंग नेताओं ने डालीगंज चौराहे पर चेकिंग के दौरान पुलिसकर्मियों को कुचलकर भागने का प्रयास किया.तभी राजेश साहनी कूदकर बोनट पर चढ़ गए. जीप को रोकने लगे. जीप की रफ्तार बढ़ी तो साहनी नीचे की ओर गिरने लगे बोनट के आगे का हिस्सा पकड़ लिया. दबंग नेता अपनी जीप कई किलोमीटर घुमाने के बाद सप्रू मार्ग स्थित एसएसपी कार्यालय के अंदर घुस गए. इसके बाद पुलिस की टीम ने उन सबको घेर लिया. उनके खिलाफ केस दर्ज कराया गया.

दबंग नेताओं को दिलाई थी सजा

पुलिस ने इस मामले में तेजी दिखाई और सत्ताधारी पार्टी का करीब बताने वाले पांचों आरोपियों पृथ्वी राज, नरायन राज, उदय प्रताप, हर्ष, राज्यवर्धन को कम समय में 10-10 साल की सजा दिलाने में कामयाबी हासिल की थी. सत्ताधारी पार्टी के रसूख की परवाह किए बिना कानून की हिफाजत राजेश साहनी जैसा ही अफसर ही कर सकता था.

मई 2018: इस्लामाबाद के भारतीय उच्चआयोग के अधिकारी के घर दो साल रहकर आईएसआई के लिए जासूसी करने वाले रमेश सिंह को पिथारौगढ़ से गिरफ्तार किया।

सितम्बर 2017: कई बंग्लादेशी घुसपैठियों की धरपकड़ करके अहम खुलासे किए। जिनका सम्बंध बंग्लादेश के आतंकवादी संगठन अंसारउल्ला बंग्ला टीम से था।

अगस्त 2017: बब्बर खालसा से जुड़े उग्रवादी जसवंत सिंह काला को उन्नाव के एक फार्म हाउस से गिरफ्तार किया।

मई 2017: फैजाबाद से आईएसआई एजेंट आफताब को पकड़ा। आफताब की गिरफ्तारी से आईएसआई के कई स्लीपिंग माड्यूल का खुलासा हुआ था।

वर्ष 2013: एनआईए (नेशनल इंवेस्टीगेशन एजेंसी) में तैनाती के दौरान असलहा तस्करों के गैंग की कमर तोड़ने में अहम भूमिका निभाई। इस कार्रवाई से नक्सलियों को होने वाली असलहे की आपूर्ति बाधित हो गई।

मेरे पति के पास पिस्टल नहीं थी, फिर कहां से आई?’
राजेश साहनी की मौत की खबर पाकर एटीएस मुख्यालय पहुंची उनकी पत्नी सोनी ने गोली मार लेने की बात पर कहा कि उनके पास पिस्टल थी ही नहीं, फिर कैसे गोली मार ली। इस पर उनका आमना-सामना चालक मनोज से करवाया गया। उसने उन्हें बताया कि साहब ने शस्त्रागार से पिस्टल निकलवाई थी। जानकारी के मुताबिक राजेश साहनी की सर्विस पिस्टल घर पर ही थी। उन्होंने अपने लिए दूसरी पिस्टल इश्यू करवाई। पुलिस सूत्रों ने बताया कि साहनी करीब 11.30 बजे दफ्तर आए थे। उन्होंने ड्राइवर से पिस्तौल मंगाई और गोली में मार ली। उन्होंने जान देने का फैसला क्यों लिया, इसे लेकर अभी कोई सुराग नहीं मिला है। आईजी एटीएस असीम अरुण ने बताया कि राजेश साहनी ने अपने ड्राइवर से सर्विस पिस्टल मंगाई थी. वह अपने साथ पिस्टल लेकर नहीं चलते थे. मौक पड़ने पर उसे साथ लेकर जाते थे. उन्होंने ड्राइवर से बोला कि वह किसी ऑपरेशन में जा रहे हैं. उनको पिस्टल देने के बाद ड्राइवर उनके कमरे से बाहर चला गया था. कुछ देर बाद वह कमरे में दिखाई नहीं दिए.

छुट्टी पर थे, क्यों आए ऑफिस?
राजेश साहनी की मौत के बाद एक ही सवाल सबकी जुबां पर था कि आखिर छुट्टी पर होने के बाद भी वह ऑफिस क्यों आए। दरअसल, राजेश साहनी 28 मई से 12 दिन की छुट्टी पर थे। उन्हें बेटी सौम्या का मुंबई के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में एडमिशन करवाने जाना था। इसके बावजूद वह सोमवार को भी दफ्तर आए थे और मंगलवार को भी।

आईजी एटीएस असीम अरुण का कहना है कि उन्हें जानकारी नहीं थी कि राजेश साहनी दफ्तर आए हुए हैं। सोमवार को उनके ऑफिस आने के बारे में उनका कहना है कि हाल ही में आईएसआई एजेंट रमेश सिंह की गिरफ्तारी राजेश साहनी की टीम ने ही की थी। सोमवार को उसके 164 के बयान दर्ज होने थे, इसलिए उन्होंने खुद राजेश साहनी को वहां मौजूद रहने के लिए कहा था। उनका कहना है कि उन्हें याद नहीं रहा कि वह छुट्टी पर हैं।

अस्पताल क्यों नहीं ले गए?
मौके पर मौजूद लोग इस बात की भी चर्चा कर रहे थे कि आखिर राजेश साहनी को गोली लगने के बाद अस्पताल क्यों नहीं ले जाया गया? सहारा हॉस्पिटल से डॉक्टरों की जो टीम बुलाई गई वह सूचना के करीब एक घंटे बाद दो बजे एटीएस मुख्यालय पहुंची। सोशल मीडिया पर भी कई लोगों ने इस पर सवाल उठाए हैं।

ड्यूटी और प्रमोशन को लेकर दबाव?
एएसपी राजेश साहनी की मौत के बाद यह चर्चा होती रही कि क्या वह काम या प्रमोशन को लेकर किसी तरह के तनाव में थे। छुट्टी के दौरान भी उन्हें ऑफिस बुलाया गया क्या इसको लेकर वह नाराज थे। हालांकि, डीआईजी कानून एवं व्यवस्था प्रवीण कुमार का कहना है कि मंगलवार को राजेश साहनी को किसी ने दफ्तर नहीं बुलाया था। वह अपनी मर्जी से आए थे।

व्यक्तिगत कारणों से की खुदकुशी
कुछ पुलिस अफसरों का कहना है कि राजेश साहनी ने व्यक्तिगत कारणों से खुदकुशी की है। हालांकि, यह व्यक्तिगत कारण क्या हैं अब तक सामने नहीं आए हैं। डीआईजी कानून एवं व्यवस्था प्रवीण कुमार का कहना है कि अभी तक की फरेंसिक जांच और शुरुआती पड़ताल में यह बात स्पष्ट है कि यह खुदकुशी है। मौके से मिले उनके मोबाइल फोन, डायरी व अन्य सामान की फरेंसिक जांच करवाई जा रही है। खुदकुशी की वजह पता करने के लिए सहयोगी और परिवार के लोगों से बात की जाएगी। अभी कोई बयान देने की स्थिति में नहीं है।

34 हजार के लिए टाला था ऑपरेशन 
राजेश साहनी की मौत के बाद उनके परिचित सकते में आ गए। पोस्टमार्टम हाउस पर पहुंचे उनके करीबियों ने बताया कि जब वह सीओ कैसरबाग के पद पर तैनात थे तो उन्होंने अपना एक ऑपरेशन कराया था। उनका चेकअप करने वाले निजी डॉक्टर ने उन्हें ऑपरेशन की सलाह दी थी। इस ऑपरेशन में करीब 34 हजार रुपये खर्च आना था। रुपये सुनकर वह ऑपरेशन की बात को टाल गए। डॉक्टर के काफी कहने पर राजेश साहनी ने अपना ऑपरेशन कराया और तीन महीने में तीन किश्तों में उन्होंने डॉक्टर के रुपये अदा किए।
कई अहम ऑपरेशन दिए अंजाम
राजेश साहनी और उनकी टीम ने 22 मई को उत्तराखंड से आईएसआई एजेंट रमेश सिंह को गिरफ्तार किया था। राजेश जुलाई 2014 में एटीएस में आए थे। इससे पहले वह करीब दो साल तक एनआईए में तैनात रहे। विधानसभा चुनाव से पहले काकोरी में खोरासान माड्यूल के सैफुल्लाह का एनकाउंटर करने वाली टीम का वह अहम हिस्सा रहे। राजेश साहनी का मुस्कराता चेहरा उनकी पहचान था। मृदुभाषी राजेश साहनी को महकमे के लोगों के साथ ही दूसरे भी काफी पसंद करते थे।

अमिताभ ठाकुर (आईजी नागरिक सुरक्षा) ने बताया, ‘आईआईएम लखनऊ में किए गए अपने शोध में मैंने पाया था कि यूपी पुलिस में अन्य प्रोफेशन की तुलना में कई गुणा ज्यादा तनाव की स्थिति है। राजेश साहनी जी की आत्महत्या से मुझे न चाहते हुए उस शोध के परिणाम की याद आ गए। समय आ गया है जब हमें यूपी पुलिस में तनाव के तथ्यों को और अधिक गंभीरता से देखना चाहिए।’

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