छत्तीसगढ़ की राज्यपाल सुश्री अनुसुइया उइके ने बताया , कैसे पहुंचीं राज्यपाल के पद तक ?

रायपुर। अपने बारे में कहना ज़रा अजीब लगता है और वह भी तब जब आपसे कहा जाए कि महिला दिवस पर आपको कहना है। ख़ैर, एक महिला का जीवन संघर्ष की कहानी होता ही है। वह चाहे कोई राज्यपाल हो या घरेलू महिला। सबके अपने-अपने संघर्ष हैं। मैं बात शुरू करती हूं 1957 से। तब ऐसा कुछ नहीं था, जैसा आज दिखता है। न समाज, न दुनिया, न लोग और न ही परिवेश। छह साल की उम्र में पहली कक्षा में प्रवेश। मैं भाग्यशाली थी कि घर वाले समझते थे कि मुझे पढ़ना चाहिए, जबकि मैं बहुत शरारती थी।

चुनौतियां बचपन से आकर्षित करती थी। देखती थी, कि जो काम लड़के कर सकते हैं, वह लड़की क्यों नहीं करती। इसी कारण उन सभी खेलों में भाग लेती थी, जिनमें लड़के भी शामिल होते थे। कभी जीतती, कभी हारती, लेकिन मन में कसक कभी नहीं रहती कि मैं दौड़ में शामिल नहीं रही। कक्षा सात की बात है। पढ़ाई में कमज़ोर थी। एक शिक्षक से कुछ नाराज़गी हो गई। उन्होंने फेल कर दिया था। मैंने री-वेल्युएशन कराया। सप्लीमेंट्री आई। तय किया कि आगे मुझे कुछ अलग ही करना है। लिहाजा कक्षा आठवीं में मेरिट में आई। 8वीं पास करने के बाद जब 9वीं पढ़ने की बारी आई, तो घर वालों ने मना कर दिया क्योंकि तब बाहर जाना पड़ रहा था, लेकिन मुझे घर से लड़ना पड़ा। शायद यह पहला संघर्ष था। मैंने जिद की और छिंदवाड़ा के हॉस्टल आ गई। आप जब सही चीज़ के लिए संघर्ष करते हैं, तो शुरु में भले ही विरोध हो, पर बाद में साथ मिलता ही है। मैं गांव से निकली थी और अब शहर आ गई थी। दोनों के माहौल में ज़मीन आसमान का अंतर था। कई तरह के तंज कसे जाते थे मुझ पर।

मेरी ज़ुबान में मेरे गांव की झलक

मेरी ज़ुबान में मेरे गांव की झलक आ ही जाती थी, मेरी बोली का असर झलकता था, तो मजाक भी बनती थी, पर इन चीज़ों को दरकिनार किया। उन्हीं लोगों में से मेरा फ्रैंड सर्कल बना। ये दूसरी जीत थी कि जो आपको चिढ़ाना चाहते थे, मजाक समझते थे, वो आपके सबसे अच्छे दोस्त हुए। उस दौर में एक सक्सेना फैमिली ती, जिनसे काफी सपोर्ट मिला। आप सही होते हैं, तो धैर्य के साथ रहिए, सब अच्छा होता है। मेरे साथ भी हुआ। पिता आरआई के रूप में छिंदवाड़ा ही आ गए और मुझे फिर से परिवार का साथ मिल गया। इस तरह लड़ते-झगड़ते-खेलते बचपन बीता और 11वीं पास कर कॉलेज पहुंची और संघर्ष का एक नया दौर शुरु हुआ। मुझे लगता था कि अगर मैं कोई सही बात कह रही हूं, तो उसे सुना-समझा जाए, इसके लिए जरूरी था कि आप उस मंच पर खड़े हों, जहां से आपको सुना जाए।

राजनीति में महिलाओं के लिए रास्ता पथरीला है

मैंने स्टूडेंट लीडर का चुनाव लड़ने का फैसला किया। जीवन में सही वक़्त पर सही सोच का आना और उस पर अमल करना भी उतना ही अहम होता है। मैंने बस अरेंजमेंट सिस्टम के लिए वाइस प्रेसिडेंट का चुनाव लड़ा था, हार गई थी, लेकिन जीतने का रास्ता मिल गया था। आख़िरकार दूसरी और तीसरी बार चुनाव जीती। ये तमाम चीजें चलती रहीं और एक नया सफर, नया संघर्ष तब शुरू हुआ, जब मैंने छिंदवाड़ा जिले के एक कॉलेज में लैक्चरर के रूप में पढ़ाना शुरू किया। 1982 से 1985 तक पढ़ाया। सही चीज के लिए किसी से भी भिड़ जाने की मेरी जिद बहुत मशहूर हो गई थी और अब छिंदवाड़ा में आमतौर पर लोग मुझे अन्नू दीदी के नाम से पहचानने लगे थे। आत्मविश्वास इतना आ गया था कि लगता था कि अगर कोई गलत है, तो उसे गलत साबित करके छोड़ा जाए। यहां पढ़ाते हुए तामिया ब्लॉक में इंचार्ज प्रिंसिपल हो गई। मुझसे पहले मेरी पहचान वहां पहुंच चुकी थी। लोग बहुत खुश थे कि मैं वहां जा रही हूं। इस बात की जानकारी मुझे नहीं थी कि मेरे जाने से वहां कितनी खुशी है। तब महसूस हुआ कि खुद के लिए संघर्ष से नहीं, दूसरों के लिए संघर्ष से आपकी अलग पहचान बनती है।

उसी दौर में चुनाव आ गए। तामिया में मुझे लगभग सभी जानने लगे थे, तो मुझे टिकट मिल गई और 26 साल की उम्र में चुनाव जीतकर विधायक बन गई। यह मौका मुझे तबके सांसद और वर्तमान में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ जी ने दिया था। राजनीति में उतरने के बाद समझ में आया कि राजनीति में महिला होने के क्या मायने हैं? कितना ज्यादा पथरीली राहे हैं? निर्णय के स्तर पर आपको कई बार सिर्फ इस कारण नहीं चुना जाता क्योंकि आप एक महिला हैं। लेकिन जब आप ठान लें, कि आगे बढ़ना ही है, तो कोई रोक नहीं सकता। जिस जिस ने अपनी लकीर मुझसे बड़ी करने की कोशिश की, मैंने अपनी लकीर उससे इतनी बड़ी कर दी, कि उनकी सोच भी वहां तक न जा सके। यह संभव था मेरी निडरता के कारण। जाने क्यों मुझे डर नहीं लगता था। शायद इसलिए क्योंकि मैं सही होती थी। इन सभी चीजों को देखते हुए तबके मुख्यमंत्री स्व. अर्जुन सिंह जी ने मुझे 1988 में मंत्री बनाया। हाउस में जिस ढंग से मैंने प्रश्न उठाए, उसे देखते हुए मुझे जागरूक विधायक का अवार्ड मिला। राजनीति में ऐसे मोड़ आते हैं, जब आपको बदलावों को चुनना पड़ता है। 1990 और 1991 में राजनीतिक परिस्थितियां बदल चुकी थीं। मैंने भाजपा ज्वाइन कर ली। मुझे बहुत सम्मान मिला। संगठन में जगह मिली। 1993 और 1998 में चुनाव लड़ाया। चुनाव हार गई, पर हिम्मत नहीं। कोशिश की गई कि मेरी राजनीति खत्म कर दी जाए। संघर्ष को सिर्फ एक जज्बा मत बनाइए, उससे लड़कर जीतने की आदत बनाइए। मैंने आदत बना ली थी। 2000 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने मुझे राष्ट्रीय महिला आयोग का सदस्य बनाया। दो बार इसमें रही। मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जी ने एसटी आयोग का चेयरमेन बनाया। उन्होंने ही मुझे राज्यसभा में भेजा। 6 साल के कामकाज को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने मुझे राष्ट्रीय जनजाति आयोग का उपाध्यक्ष बनाया और इसके बाद मुझे छत्तीसगढ़ के गर्वनर के रूप में काम करने का मौका मिला।

जब हम महिला दिवस की बात करते हैं, तो हम यह मान चुके होते हैं कि महिलाओं की स्थिति ठीक नहीं है, इसलिए ही उन्हें प्रेरणा देने की बात हो रही है। दरअसल माइंडसेट चेंज करने की जरूरत है। जब आप कुछ करते हैं, उसके मायने तलाशिए। सिर्फ कुछ करना है, इसलिए मत कीजिए। सकारात्मक सोच जरूरी है। मैं हमेशा कहती हूं:-

मंजिल मिले ना मिले
इसका है गम नहीं मुझे
मंजिल की जुस्तजू में
मेरा कारवां तो है।

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