क्या लोगों का संवैधानिक व्यवस्था और न्याय प्रणाली से भरोसा उठ गया ?

अजय बोकिल//अब पुलिस की गोली ही ‘न्याय की बोली’ क्यों लगने लगी है..?
ठीक हफ्ते भर पहले हुई हैदराबाद गैंग रेप की जघन्य घटना के बाद लोगों की गालियां सुन रही साइबराबाद पुलिस के लिए शुक्रवार की सुबह सुखद आश्चर्य से भरी रही होगी, क्योंकि गैंग रेप के जिन चार आरोपियों का उसने तड़के एनकाउंटर कर डाला, उसकी खबर मात्र से ‘पुलिस जिंदाबाद’ के नारे लगने लगे। खुशी में झूमते लोगों ने एनकाउंटर में शामिल पुलिस कर्मियों को कंधे पर उठा लिया, फूल बरसाए, कुछ ‍महिलाअों ने अपने ‘वीर’ भाइयों को राखी भी बांधी। टीवी चैनलों पर यह खबर चलते ही देश की सौ में से 99 महिलाअों की प्रतिक्रिया थी- अच्छा किया नरपिशाचों के साथ यही सलूक होना चाहिए। जब उन्हें कानून का डर नहीं तो कानून का पालन करवाने वालों को किसी का डर क्यों होना चाहिए? मामला संसद में भी गूंजा। जनप्रतिनिधियों में मोटे तौर पर बलात्कारियों को सजा- ए- मौत देने पर एका दिखा। कुछ ने तो तेलंगाना पुलिस के कारनामे को नजीर बताया। कुछ अल्पसंख्यक स्वर भी थे, जिन्हें पुलिस के कानून के ताबेदार और मुंसिफ एक साथ बनने पर एतराज था। दुआअों के सैलाब के बीच ये सुर इस ‘त्वरित न्याय’ के मनमर्जी में तब्दील होने के डर से शंकित थे। दूसरी तरफ यह सवाल गुबार की तरह उभर रहा है कि क्या अब लोगों का संवैधानिक व्यवस्था और न्याय प्रणाली पर से भरोसा उठ गया है? क्या इसलिए किसी भी अपराधी को ( अपराध सिद्ध होने से पहले ही) गोली मार कर ढेर करना आम आदमी की छाती ठंडी होने का सबब बन गया है? क्या लोग अब कानूनी पेचीदगियों और इंसाफ में देरी को भी ‘अपराधी के बचाव’ के रूप में देखने लगे हैं? और अगर यही ‍रवैया चलना है तो अपराधकर्ता को जड़ से ही क्यों न खत्म कर दिया जाए? इन गंभीर सवालों का विश्लेषण करते वक्त हमे दिल और दिमाग की एप्रोच भर भी ध्यान देना होगा।
हैदराबाद की युवा डाॅक्टर दिशा (परिवर्तित नाम) के सामूहिक बलात्कार और जिंदा जला देने की घटना से पूरा देश उद्वेलित था। इसमें पुलिस की शुरूआती लापरवाही भी सामने आई थी। हालांकि बाद पुलिस चार आरोपियों को पकड़कर जांच शुरू कर दी थी। पुलिस की कहानी के मुताबिक शुक्रवार को घटना के रिक्रिएशन के लिए आरोपियों को अपराधस्थल पर ले जाया गया था। इसी दौरान आरोपियों ने भागने की कोशिश की। पुलिस ने उन्हें चेतावनी दी। वे नहीं रूके तो पुलिस ने उन्हें वहीं ढेर दिया। यानी कि हिसाब चुकता। दिशा के और दिल्ली की निर्भया के परिजनों के राहत की सांस ली। मोटे तौर सभी ने इसे पुलिस का सामयिक और उचित एक्शन बताया। हालांकि पुलिस के इस एनकाउंटर का मानवाधिकार आयोग व मानवाधिकारवादियो ने भी नोटिस लिया है। यह सवाल भी उठ रहे हैं कि यह एनकाउंटर था या सुनियोजित हत्याकांड था, वगैरह।


इस सवाल का जवाब या तो देर से ‍िमलेगा, या कभी नहीं मिलेगा कि पुलिस ने चारों आरोपियों को मारने की पहले से योजना बना रखी थी या फिर यह तत्काल बुद्धि से उठाया गया कदम था? आरोपी सचमुच भाग रहे थे या ‍िफर उन्हें मारने के बाद आत्म रक्षा में एनकाउंटर किया गया? आरोपियों ने पुलिस से हथियार छीनने की कोशिश की थी अथवा आरोपियों का काम तमाम करने के बाद पुलिस ने एक्शन को जायज ठहराने के लिए प्रतिप्रश्न पहले से तैयार कर लिए थे, कहना मुश्किल है। इतना तय है कि अगर इस एनकाउंटर की जांच हुई तो भी उसमें कुछ खास साबित नहीं होना है, क्योंकि यहां पुलिस कर्ता भी है और कर्म भी।
बड़ा सवाल यह है कि आज देश में ऐसे हालात क्यों बन गए हैं कि पुलिस की गोली ही न्याय की बोली महसूस हो रही है। महिलाअों पर बलात्कार और ज्यादती की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। इसके कई कारण हैं। लेकिन उससे भी चिंताजनक अपराधियों को जुर्म साबित होने के बाद भी समय पर सजा न मिलना है। निर्भया केस के बाद पाॅक्सो एक्ट बना। मामले की जल्द सुनवाई और फैसले के लिए फास्ट ट्रैक अदालतें बनीं। इन अदालतों ने भी जिम्मेदारी से काम किया। लेकिन हमारी न्याय प्रक्रिया में सूंड से बड़ी हाथी की पूंछ होती है। फास्ट ट्रैक कोर्ट के फैसले पर अपील हाई कोर्टों में होती है। वहां सभी मामले एक निश्चित प्रक्रिया के तहत ही चलते हैं। यानी सजा सुनाए जाने के बाद अंतिम रूप से सजा पर अमल में इतने ‘किन्तु परंतु’ हैं कि पीडि़त का धैर्य चुकने लगता है। ऊंची अदालतों में इंसाफ में देरी का एक बड़ा कारण न्यायाधीशों की कमी और काम का दबाव है। केन्द्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने पिछले साल लोकसभा में बताया था कि देश में प्रति 10 लाख की आबादी पर मात्र 19 जज हैं। देश में निचली न्यायपालिका को मिलाकर जजों के कुल 6 हजार पद खाली पड़े हैं, लेकिन सरकार इन्हें समय पर नहीं भर पा रही। अगर जज हैं भी तो भी अपील, दलील और दया याचना की सरगम बहुत लंबी है। उदाहरण के लिए निर्भया के नृशंस हत्यारों को सुप्रीम कोर्ट दो साल पहले सजा-ए-मौत सुनिश्चित कर चुका, लेकिन दया याचिका अब राष्ट्रपति तक पहुंची है। क्योंकि न्याय प्रक्रिया के ‍िलए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है। कम से कम सुप्रीम कोर्ट द्वारा सजा कन्फर्म कर दिए जाने के बाद तो पूरा मामला ज्यादा से ज्यादा तीन माह में निपट जाना चाहिए। जो बाध्यता फास्ट ट्रैक कोर्ट पर है, वैसी ही प्राथमिकता महिला अत्याचार के मामलों में ऊपरी कोर्ट पर क्यों नहीं होनी चाहिए? ताकि पीडि़त को न्याय मिलने का अहसास हो। इसी संदर्भ में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का यह सुझाव मार्के का है कि बलात्कार जैसे घृणित अपराधों में दया याचिका का औचित्य क्या है? क्या सजा पर सुप्रीम कोर्ट की मोहर अंतिम नहीं होनी चाहिए? जिसने दुर्भावनावश किसी महिला की आबरू और जिंदगी छीनी, उसे ज्यादा से ज्यादा जीने की मोहलत क्यों देनी चाहिए? क्या उसकी जिंदगी का बढ़ता एक-एक दिन उसी अनुपात में इंसाफ पर घटते भरोसे का परिचायक नहीं है?
यह सही है कि कानून जज्बात की पटरी पर नहीं चलता। वह तथ्योंन और प्रमाणों के राजमार्ग पर चलता है। मंशा यही है कि मुजरिम को सजा के चक्कर में कोई निरपराध सूली पर न चढ़ जाए। कानून की दृष्टि से हैदराबाद कांड के आरोपियों पर भी आरोप अभी सिद्ध होना था। इसकी प्रक्रिया भी वैसे ही शुरू हुई थी, जैसे कि उन्नाव बलात्कार पीडि़ता के मामले में चल रही है। दूसरी तरफ महिलाअों और आम लोगों में संदेश यही जा रहा था कि इस देश में स्त्री की आबरू भी कानून की जमानत पर ही टिकी है। यहां तक कहा गया कि जो लोग अपराधियों के मानवाधिकार तथा ऐसे आरोपियों के एनकाउंटरो को असंवैधानिक बता रहे हैं, वो जरा उन पीडि़ताअों के मां-बाप का क्रंदन भी सुनें, जो न्याय की आस में रोज खून के आंसू पी रहे हैं। हालांकि आंसू उन आरोपियों के परिजनों के भी हैं। हैदराबाद एनकाउंटर में मारे गए आरोपी चेन्नाकवुलू की पत्नी रेणुका दहाड़े मार कर यही कह रही है कि मुझे भी उसी जगह गोली से उड़ा दो, जहां मेरे पति को मार दिया गया। एक और आरोपी जोलू शिवा के पिता का सवाल है ‍कि आरोप साबित होने के पहले ही मेरे जवान बेटे को क्यों मार दिया गया?
ये बड़ी विरोधाभासी तस्वीर है। जहां लगभग पूरा देश आरोपियों को अपराधी मानकर उनके तत्काल एनकाउंटर पर गदगद है, वहीं आरोपी वास्तव में अपराधी थे या नहीं, इस पर संशय भी है। लेकिन ये सवाल तो शायद हमेशा रहेंगे, क्योंकि न्याय भी अंतत: एक सापेक्ष शब्द है। कई बार सवालों में ही जवाब भी छिपे रहते हैं। हैदराबाद और उन्नाव की घटनाअो को मिलाकर देखें तो कानून तो क्या पूरी व्यवस्था का विरोधाभास बेपरदा हो जाता है। क्योंकि उन्नाव बलात्कार कांड में भी आरोपी तय कानूनी प्रक्रिया से ही गुजर रहे थे। उन्हें जमानत भी मिल गई थी। लेकिन जमानत से छूटते ही उन्होंने पीडि़ता को जिंदा जला देने का नारकीय कृत्य किया। जबकि हैदराबाद कांड में कानूनी प्रक्रिया शुरू होने के पहले ही पीडि़ता को खत्म कर दिया गया। इसका सीधा अर्थ यह है कि कानून का पालन भी पीडि़ता के जिंदा रहने की गारंटी नहीं है। नरपिशाचों का दुस्साहस कानून की बेडि़यों पर भारी है। मुमकिन है कि उन्नाव कांड के आरोपियों को बाद में सजा-ए-मौत मिले, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी और शायद अब समाज यही नहीं चाहता। अगर कानून के रास्ते से चलना भी न्याय पाने तक जीवित रहने की गारंटी नहीं है तो आखिर गारंटी है किस बात की और यह कौन देगा ? यही वह यक्ष प्रश्न है, जो हैदराबाद एनकाउंटर करने वाले पुलिस कर्मियों को ‘हीरो’ बना रहा है। बेशक इससे पुलिस के निरंकुश होने और नए किस्म की अराजकता फैलने का खतरा है। लेकिन हमे यह भी याद रखना होगा कि आखिर कानून जनता के लिए है, उसे मानने वालों के लिए है ? जो कानून जनभावना को संतुष्ट न कर पाए, उसके होने का भी क्या मतलब है?
वरिष्ठ संपादक

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