कभी सोचा नहीं था कि मैं परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में इतने लंबे समय तक काम करूंगा:अनिल आनंद

अनिल आनंद /पूर्व डायरेक्टर, रिएक्टर प्रोजेक्ट्स ग्रुप, भाभा परमाणु शोध केंद्र (बीएआरसी)-आपबीती

जिंदगी पर पीछे मुड़कर निगाह डालता हूं तो संतोष के साथ फख्र महसूस होता है कि देश के परमाणु कार्यक्रम की विकास-यात्रा में मेरा भी कुछ योगदान रहा है। मेरा इंजीनियरिंग में जाना तो तय था, लेकिन कभी सोचा नहीं था कि मैं परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में इतने लंबे समय तक काम करूंगा। मैंने 1961 में परमाणु ऊर्जा विभाग ज्वॉइन किया और 2001 में विदाई ली। कई बार मैं सोचता हूं कि अमेरिका, फ्रांस अथवा थाईलैंड से आकर्षक प्रस्ताव मिलने के बाद भी में देश में ही क्यों बना रहा? एक ही जवाब मुझे मिला काम का असाधारण संतोष, हर वक्त रोमांचक चीजें करने का मौका और कदम-कदम पर इनोवेशन की जरूरत।
1955 में पंजाब यूनिवर्सिटी से मेट्रिक्यूलेशन के बाद बनारस में रह रहे मेरे अंकल ने मुझे वहां आकर इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में प्रवेश लेने की सलाह दी। वहां मैकेनिकल इंजीनियरिंग के बाद मैंने न जाने क्या सोचकर परमाणु ऊर्जा विभाग में जाने का निर्णय किया। पहला साल तो छात्र जीवन का ही विस्तार था। क्लासेस, लेबोरेटरी सेशन्स अौर खेल व सांस्कृतिक गतिविधियां। वार्षिकोत्सव समारोह में चीफ गेस्ट थे डॉ. होमी जहांगीर भाभा। उनकी मौजूदगी ने ही अनोखी प्रेरणा से भर दिया। ट्रॉम्बे के ऑटोमिक एनर्जी एस्टाब्लिशमेंट (बाद में इसका नाम भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र रखा गया) में ट्रेनिंग पूरा हुआ तो तारापुर में अमेरिका की जनरल इलेक्ट्रिकल्स की मदद से बॉयलिंग वाटर रिएक्टर स्थापित करने की चर्चा थी, लेकिन फैसला हुआ नहीं था। कनाडा, फ्रांस और ब्रिटेन में क्रमश: भारी पानी, गैस और भांप के कुलंट वाले रिएक्टर थे। तीनों देशों में ट्रेनी भेजे जाते थे। मुझे फ्रांस भेजा गया। जल्द ही फैसला हो गया कि देश के लिए प्राकृतिक यूरेनियम व भारी पानी का रास्ता ठीक रहेगा। इस तरह कनाडा की मदद से राजस्थान की दो इकाइयों का काम शुरू हुआ। फ्रांस में मुझे सूचना मिली की एक विमान दुर्घटना में भाभा नहीं रहे। हम सारे प्रशिक्षु शोक में डूब गए। कुछ दिनों बाद हमें एक कमरे में इकट्‌ठा कर बताया गया कि बार्क के ‘नए चीफ’ फ्रांस यात्रा पर हैं। हमें मालूम नहीं था कि नए चीफ कौन है। जब मुलाकात शुरू हुई तो वे हाथ मिलाते हुए मुझ तक आए। मैंने कहा,’ सर, रिएक्टर इंजीनियरिंग से एके आनंद।’ उन्होंने हाथ आगे बढ़ाया और कहा, मैं ‘विक्रम साराभाई।’ उनकी सादगी, सरलता, विनम्रता और मुस्कान ने मुझ पर अमिट छाप छोड़ी।
मेरे सामने पहला चुनौतीपूर्ण कार्य 1970 में आया। तारापुर के लिए अमेरिका के सेन जोस स्थित जीई के प्लांट पर काम चल रहा था। मुझे छह माह के लिए ‘री-लोड फ्यूल डिज़ाइन’ प्रोजेक्ट में भाग लेने भेजा गया। लौटकर मैंने न्यूक्लियर फ्यूल कॉम्प्लेक्स स्थापित करने में मदद की। यह काम चल ही रहा था कि कई फ्यूल रॉड समयपूर्व ही नाकाम होने लगीं। हम यह समस्या दूर करने में ही लगे थे कि भारत ने 1974 में शांति पूर्ण परमाणु विस्फोट कर दिया। अंतरराष्ट्रीय समुदाय खासतौर पर अमेरिका बहुत नाराज हो गया और हमें परमाणु टेक्नोलॉजी से वंचित करने का दौर शुरू हो गया। हमने प्लूटोनियम से रिएक्टर चलाने का फैसला किया। हम इस्तेमाल ईंधन से आवश्यक प्यूटोनियम निकाल सकते थे। दबाव ज्यादा बढ़ा तो तब के बार्क चेयरमैन होमी सेठना ने अमेरिका से कहा कि वह अपना परमाणु ईंधन ले जाए। इसके लिए लेड के आवरण वाले भारी फ्लास्क जरूरी होते हैं, जो जहाज दुर्घटनाग्रस्त होने पर समुद्र में तैर सकें। 300 टन की तैरने वाली क्रेन भी जरूरी थी। अमेरिका को यह विचार छोड़ना पड़ा।
चुनौती से संकल्प और मजबूत हो गया। बार्क ने तब के सबसे बड़े रिएक्टरों में से एक 100 मेगावॉट के थर्मल रिएक्टर ‘ध्रुव’ को पूरी तरह स्वदेश में निर्मित करने की घोषणा कर दी। जाहिर है मुझे ‘फ्यूल डिज़ाइन’ टीम का लीडर बनाया गया। कई बाधाओं के बावजूद हमने रिएक्टर तैयार कर शुरू कर दिया तो कंपन महसूस हुए। पता चला कि रिएक्टर की रॉड एक-दूसरे से रगड़ खा रही हैं। मुझे हर कोई री-डिज़इन की सलाह देने लगा। मुझे बहुत दु:ख हुआ और मैं विचलित हो गया। यह अफवाह भी उड़ी कि मैं इस्तीफा देकर देश छोड़कर चला गया हूं। दूसरे सबसे महत्वपूर्ण ग्रुप लीडर थे डॉ. अनिल काकोड़कर। वे रिएक्टर के सारे आंतरिक हिस्सों की डिज़ाइन चेक कर रहे थे। हम दोनों चिंतित थे, क्योंकि हमारी प्रतिष्ठा के साथ देश के परमाणु कार्यक्रम का भविष्य भी दांव पर लगा था। मैंने कंपन कहां से आ रहे हैं, इसका पता लगाना शुरू किया, जबकि काकोड़कर की टीम सारे उपकरणों की प्राकृतिक फ्रिक्वेंसियों का पता लगाने लगी कि कहीं रिजोनन्स तो नहीं हो रहा। दोनों ही लगभग एक ही समय पर नतीजे पर पहुंचे। समस्या सुलझा ली गई। उसके बाद मुझे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण दायित्व सौंपा गया। तब पेरिस स्थित भारतीय दूतावास में साइंस काउंसलर का पद खाली था। सोचा इसके लिए अप्लाई कर दूं। मुझे संदेश मिला कि मैं इसके लिए आवेदन नहीं करूं, क्योंकि मुझे कलपक्कम के प्लूटोन रिएक्टर के लिए प्रोजेक्ट मैनेजर बनाया जा रहा है, जो भारत की भावी परमाणु पनडुब्बी के कार्यक्रम से जुड़ा था। डॉ. रमन्ना ने अपने मित्र वॉइस एडमिरल व कमांडर इन चीफ, ईस्ट एमके राय के साथ मिलकर जगह चुन ली थी। राय रिटायर होने के बाद एटीवी (एडवान्स्ड टेक्नोलॉजी वेसल) के डायरेक्टर बने। पहला काम प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाने का था। बार्क के तीन और नौसेना के चार लोग कलपक्कम स्थित परमाणु ऊर्जा विभाग के गेस्ट हाउस में दो हफ्ते ठहरे और उपलब्ध डेटा, अनुमान और इंट्यूशन के आधार पर रिपोर्ट तैयार की। नौसेना, रक्षा शोध संगठन और परमाणु ऊर्जा विभाग से और लोग लाए गए। परमाणु पनडुब्बी कार्यक्रम के िलए एटीवी कोड नेम था। मुंबई व कलपक्कम में कई सुविधाएं जोड़ी गईं, जबकि एटीवी ने हैदराबाद व विशाखापट्‌टनम में सुविधाएं खड़ी कीं। इसके लिए नया ‘रिएक्टर प्रोजेक्ट डिवीजन तैयार किया गया’और मुझे मुखिया बनाया गया।
काम बहुत बड़ा था और सॉफ्टवेयर व हार्डवेयर कम्प्यूटर इंजीनियरिंग से लेकर वििवध क्षेत्रों के असंख्य इंजीनियर, शोधकर्ता व वैज्ञानिकों ने इसमें कड़ी मेहनत की। जब मैं रिटायर होने वाला था तो सारे उपकरण लगाकर उन्हें शुरू किया जा चुका था, लेकिन वांछित संख्या में फ्यूल असेंबली वहां पहुंचाई नहीं गई थी। हालांकि मेरे रिटायर होने के कुछ ही दिनों बाद कलपक्कम से मुझे फोन आया कि रिएक्टर ‘क्रििटकल’ हो गया है। मैं खुशी से उछल पड़ा!

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