एक खुशनुमा पुलिस अफसर रोहिणी काले जिन्होंने पाई मेहनत से मंजिल

 रिपोर्ट : के .रवि ( दादा  ) ,,//
सुबह के 8  बजकर 35 मिनिट पर महाराष्ट्र  के पुणे  के अस्पताल में रोहिणी जी का जन्म हुआ .जब उनका जन्म हुआ तब उनके परिवार में माता पिता , एक सगा  भाई , एक चचेरा भाई और बहन से भरा बड़ा सा परिवार था .जो के पुणे के पिंपरी चिंचवड़ के हिन्दुस्थान एंटीबायोटिक्स कंपनी की कॉलनी मेे रहते थे .  जिनके छत्र छाया में रोहिणी जी बड़ी हुईं . उनके पिता हिंदुस्थान एंटीबायोटिक्स   कंपनी मेे अफसर के ओहदे  पर काम कर रहे थे .जब रोहणी जी चार साल की थीं तब से उनकी माता हिंदुस्थान एंटीबायोटिक्स के स्कूल में शिक्षिका की नौकरी कर रही थी . उनके बड़े भाई मेे और उनमें ढाई साल की  उम्र का फासला है . वर्तमान में भाई पुणे के दीपक फेर्टिलिझर  कंपनी मेे बड़े पोस्ट पर विराजमान हैं . जिन्होंने agri .b .tech 
तक  की पढ़ाई  की है . वैसे खाते पीते सुखी परिवार में रोहिणी जी का जन्म हुआ .वे अपने पिता की लाडली है , पिता उनका कोई भी लब्ज़ गिरने नहीं देते .जो मांगा वह हाजिर हुआ करता था . पिता जी घर के बरामदे में सब्जियों उगाते थे . रोहिणी जी के चाहत की सब्जी भी  पिता स्वयं बनाकर उन्हें खिलाते थे . मसलन यह भगवान की मेहरबानी हैै के उनके जीवन में कभी कोई कठोरता नहीं  दिखाई .वक़्त के साथ साथ बड़ी होती रोहिणी जी की पढ़ाई  वहीं हिंदुस्थान एंटीबायोटिक्स के अंग्रेजी मिडियम  में हुआ . उनका वह स्कूल काफी खूबसूरत था .उन दिनों में भी उन्हें स्कूल के जरिए  भारतीय संस्कृति के महाभारत , रामायण का विषय पढ़ाई मेे पहली और दुसरी कक्षा में कहानी के स्वरूप में  सिखाई  जाती थी .खेल , पढाई  की किताबें , उसे लिए जरूरी ग्रंथालय  , बढ़िया सिखाने वाले शिक्षक , साथ ही स्कूल छूटने  के बाद स्तोत्र  , ऐसे  सर्वांगीण  पढाई करके ली जाती थी . स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद रोहिणी जिनके कॉलेज की पढ़ाई पुणे के ही बृहन महाराष्ट्र कॉलेज ऑफ कॉमर्स मेे पूरी हुईं . पुणे युनिवर्सिटी से एम कॉम की 
उपाधि हासिल की .उसके बाद रोहणी जी एक स्कूल  में पहली के विद्यर्थियो को पढ़ाया  करती थी .फिर उन्होंने एलआयसी मेे कुछ  माह तक काम किया .उसी बीच एमपीएस का विज्ञापन रोहिणी जी ने देखा .और सब इंस्पेक्टर की परीक्षा देने का उन्होंने निर्णय लिया .और वह निर्णय सिन्धु उनके लिए इतना सही निकला उनके सारे खनादान में  पहली महिला पुलिस सब इंस्पेक्टर बनी . उनके लिए पुलिस विभाग एक नया महकमा था .हा वैसे कुछ लोग परिवार से उनके इस कदम की खिलाफ थे ,कारण उनकी चिंता थी पुलिस विभाग की  पथरीली जिंदगी वह झेल लेगी क्या . रोहिणी जी को पुरी जिंदगी में कोई तकलीफ़ न पहुंचे ऎसी जो हर माता पिता की सोच होती हैं , वहीं रोहिणी को लेकर उनके  परिजनों की थी  रोहणी जी ने भी परिवार के सभी को आश्वस्त किया और  पुलिस की नौकरी स्वीकारी . उन्होंने अपना घर पहली मर्तबा उस नौकरी के किए छोडा  था .वह भी उस परिवार की इकलौती बेटी होने बावजूद . उसी दरमियान कुदरतन उनकी माता का दिल के दौरे से  देहांत हो गया .अब रोहणी जी बड़ी ही चुकी थी ,अब उनमें जा बचपना खत्म हो रहा था . समय आगे चलते रहा  माता की मौत के बाद रिवाजोनुसार  एक साल के अंदर शादी करनी पड़ती हैं .बड़ा भाई घर में होने के कारण 
उन्हे घोड़ीपर बिठाया गया . साथ ही रोहिणी जी भी विवाह बंधन में बंध गई .अब जिंदगी नए रास्ते से चलने लगी . शादी से पहले उनकी ड्यूटी मुंबई  शहर  में होने के कारण वे मुंबई ने ही रहने लगी . वैसे उनका मायका  जुन्नर और ससुराल घोड़ेगाव पुणे का ही था . फिर भी संसार मुंबई से सटे ठाणे जिला के कल्याण तहसील के डोंबिवली शहर मेे रोहिणी जी ने बसाया . जिंदगी में जो नहीं देखा था वह मुंबई से डोंबीवली  का लोकल ट्रेन का पहला  पथरीला सफ़र रोहणी का शुरू हुआ . मायके में छोटा सा चौखुटा  , परिवार तो ससुराल बड़े 
खटियो  का घर . मायके के लोग वैसे खेत खलिहान वाले , पर माता पिता पुणे जैसे पिंपरी  शहर में नौकरी करते रहने के कारण रोहिणी जी का पालन पोषण शहरी वातावरण  मेे हुआ .माता पिता ने दोनों भाई बहन  को कभी कोई परेशनी  महसूस होने नहीं दिया . एक तरह  से माता पिता उन दोनों भाई बहन के दोस्त ही थे.वे किसी भी विषय पर माता पिता से खुलकर बातें कर सकते थे .एक दूसरे पर गुस्सा भी करते तो प्यार भी उतना ही करते थे .वह सभी जों  दोस्तो में होता हैं वैसे  वे दोनों भाई बहन एक दूसरे से हर बात शेयर  करते थे . रोहिणी जी की माता 1990 मेे चली गई . तो  पिता 2012 मेे . वे पूरी तरह  पितृहीन हो चुकी हैं .
उन्हे अब भी रोहिणी जी  खूब याद करती रहती हैं . रोहिणी जी के सास ससुर भी काफी प्यारे है . जितना सगी   मा ने नहीं किया , उतना  रोहिणी के लिए उनकी सास ने किया  .पर दुर्भाग्यवश  वे भी ईश्वर को प्यारी हो गई . रोहिणी जी का ससुराल वैसे पूरी तरह खेती वाला .जब रोहिणी जी शादी करके ससुराल पहुंची तब उस घर  मेे करीबन 70 एक लोग इकठ्ठा रहते थे .वहीं उनके लिए नया पन था .फिर भी उन्हें बहुत मज़ा आती थी .उनके ससुराल ने कोई प्रोफेसर ,तो कोई डॉक्टर , तो कोई नौकरी पेशे मेे , तो कोई बिजनेस मैंन , तो कोई खेती करने वाले ऎसे  विभिन्न व्यवसाई एक ही घर में मसलन पुलिस उप अधीक्षिका रोहिणी काले जी के ससुराल में .पर पिछले पांच सालों में यही परिवार कुछ  ज्यादा ही बड़ा हो जाने के कारण अब उनमें से कुछ  अलग हुए हैं . रोहिणी जी के पति लक्ष्मण काले जी पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट थे . उनकी खुद की कार्यप्रणाली  थी . रोहिणी जी को दो लड़के हैै .एक 
विराज जों एमबीबीएस डॉक्टर हैै , तो छोटा लड़का रोहित भी पिता की तरह ही चार्टर्ड एकाउंटेंट की परीक्षा दे रहा  है  . उनके दिनो बच्चो की पढ़ाई  कल्याण और डोंबिवली के स्कूल , कॉलेज में  हुई है .
रोहिणी लक्ष्मण काले जी साल 1989 मेे पुलिस ने सब इंस्पेक्टर बनी .पुलिस की इस नौकरी ने उन्हें काफी कुछ सिखाया . इंसान की परख करना , राजा और रंक की जिंदगी भी नजदीक से देखना , इंसान भावनावो में बहकर जिंदगी को कैसे  देता हैं वहीं भी सिखाया  , साल 2001 मेे रोहिणी जी को पदोन्नति मिली .वे अब एपीहो चुकी थी .फिर साल 2008 मेे वे पुलिस इंस्पेक्टर बनी . और सबसे ख़ास के साल 2019 में उन्हें पुलिस उप अधीक्षिका की  पदोन्नति मिली .वर्तमान में रोहिणी काले जी महाराष्ट्र के वर्धा जिला में जात जांच  विभाग  मेे विराजमान हैं . शुरुवात के सोला साल पुलिस की नौकरी में , और दी साल मुंबई में रोहिणी जी ने नौकरी की .पर उनके अनुसार मुंबई का जीवन काफी धगधग वाला, फुरसत     नसवार  की छाया पुलिस की नोकरी मेे  ना आए तो कैसे  ? 
पर उतनाही  काम को सीखने वाला वक़्त भी उनका   बी ता . उस कारण उन्हें अपने परिवार को कम समय ही देना पड़ा . जिसपर परिवार के सदस्यों की निहित शिकायत रहने की .उनकी कुल नौकरी का ज्यादातर समय  मुंबई हवाई अड्डा सुरक्षा विभाग , राज्य गुप्त वार्ता विभाग , और मुंबई रेल्वे मेे बिता . वहां के हर विभाग के काम काज  अनुभव काफी  अलग हैै . उनमें से खास कर राज्य गुप्त वार्ता विभाग ने नौकरी करने का  रोहिणी जी का अनुभव उन्हें काफी आनंद दे गया . आप पुलिस विभाग से संबन्धित रहे विभाग के साथ और आम जनता की समस्याएं , उनके सवाल ,डाली हुईं  तकलीफें एवम् घटनावो  का  अनुकरण  करके जीवन में खरी उतरी यह बड़ी बात है .

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