ऋषि कुमार शुक्ला, जिन्हें MP के सीएम कमल नाथ ने DGP पद से हटाया; पीएम मोदी ने बनाया CBI चीफ

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मूलत: ग्वालियर के ऋषि कुमार शुक्ला ‘न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर’ वाले सिद्धांत पर चलने वाले अफसर माने जाते हैं। उन्हें इंटेलिजेंस में महारत हासिल रही है। वे दो बार केंद्र सरकार की आईबी में भी रहे हैं। आईबी में पोस्टिंग के दौरान एनएसए अजीत डोभाल से भी उनका नाता रहा है। यही कारण है कि सीबीआई चीफ की पोस्टिंग में डोभाल कनेक्शन की महत्वपूर्ण भूमिका बताई जा रही है। डोभाल आईबी के निदेशक रहे हैं। नए डायरेक्टर का कार्यकाल 1 फरवरी, 2019 से अगले 2 साल तक रहेगा।शुक्ला मूलत: ग्वालियर के रहने वाले हैं। उनकी शुरुआती पोस्टिंग CSP रायपुर हुई। वे दामोह, शिवपुरी और मंदसौर जिले के एसपी रहे हैं।

2009-12 तक शुक्ला एडीजी इंटेलिजेंस ब्यूरो भी रह चुके हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, प्राइमरी एजुकेशन के बाद शुक्ला आगे की पढ़ाई के लिए कोलकाता चले गए। IIT में कोर्स पूरा करने के बाद उन्होंने आईपीएस के लिए तैयारी शुरू की और यूपीएससी क्रैक किया। वे अभी तक मप्र के डीजीपी थे। चार दिन पहले ही कमल नाथ सरकार ने उन्हें पुलिस हाउसिंग कॉरपोरेशन का चेयरमैन बनाया था।

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नई दिल्ली: 

सीबीआई(CBI) के निदेशक पद पर ऋषि कुमार शुक्ला (Rishi Kumar Shukla) की नियुक्ति हुई है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली चयन समिति ने उन्हें देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी का मुखिया बनाने का फैसला किया. रेस में शामिल 1983, 1984 और 1985 बैच के आईपीएस अफसरों के बीच शुक्ला ने बाजी मारकर सबको चौंका दिया. वजह कि अन्य अफसरों की तुलना में उनका नाम मीडिया की सुर्खियों में नहीं था. टेनिस और बैडमिंटन खेलकर फिटनेस दुरुस्त रखने के शौकीन शुक्ला का चयन करने वाली सेलेक्ट कमेटी में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई और नेता विपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे भी शामिल रहे. खड़गे की आपत्ति के बावजूद कमेटी ने दो-एक से शुक्ला को डायरेक्टर बनाने का फैसला किया. इसी के साथ सेलेक्शन के आखिरी चरण तक पहुंचने के बावजूद आईपीएस जावीद अहमद, राजीव भटनागर, एपी माहेश्वरी और सुदीप लखटकिया पीछे छूट गए.

यह वही आईपीएस ऋषि कुमार शुक्ला हैं, जिन्हें अभी पांच दिन पहले ही मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार ने डीजीपी पद से हटा दिया था. यूं तो कांग्रेस की सरकार बनते के बाद ही उनकी विदाई की अटकलें लगने लगीं थीं, मगर मुख्यमंत्री कमलनाथ ने बीते 29 जनवरी को उन्हें डीजीपी पद से हटाकर जहां दोबारा पुलिस हाउसिंग बोर्ड में भेज दिया, वहीं उनकी जगह वीके सिंह को मध्य प्रदेश का नया डीजीपी बनाया था. शिवराज सरकार में डीजीपी बनने से पहले भी वह मप्र पुलिस हाउसिंड कार्पोरेशन के चेयरमैन रहे. नई सरकार बनने के बाद सियासी गलियारे में चर्चा रही कि कमलनाथ और डीजीपी शुक्ला के बीच पट नहीं रही थी. दूसरी प्रमुख बात थी कि शुक्ला को शिवराज सिंह चौहान का बेहद करीबी आईपीएस अफसर माना जाता है. ऐसे में कांग्रेस नेताओं के निशाने पर वह काफी पहले से थे. कमलनाथ सरकार ने अचानक उन्हें हटाकर उनसे एक साल जूनियर वीके सिंह को कमान सौंपी तो किसी को यह भनक नहीं थी कि शुक्ला को सीबीआई निदेशक सरीखे प्रतिष्ठापूर्ण पद की जिम्मेदारी दी जा सकती है। मीडिया में भी मध्यप्रदेश की आईपीएस रीना मित्रा का नाम जरूर सुर्खियों में था। मित्रा 31 जनवरी को सेवानिवृत्त हो गईं। सूत्र बताते हैं कि मध्यप्रदेश से शुक्ला के अलावा 1984 बैच के आईपीएस विवेक जौहरी का नाम भी विचाराधीन था। लेकिन शुक्ला को पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ काम करने का लाभ मिला। उनके विरोध का मुख्य तर्क यह था कि शुक्ला को भ्रष्टाचार के मामले की जांच का अनुभव नहीं है, जो कि इस पद पर नियुक्ति की एक शर्त है. यह ठीक है लेकिन इस पद के लिए अन्य जितनी भी शर्ते हैं, उन सब में शुक्ला किसी से कम नहीं हैं बल्कि ज्यादा ही हैं. म.प्र. में पुलिस महानिदेशक के तौर पर शुक्ला ने कई उल्लेखनीय कार्य किए हैं और वे वरिष्ठता में अन्य उम्मीदवारों से आगे हैं.

उनकी ईमानदारी और कर्मठता की भी सराहना होती रही है. उन्होंने कई भ्रष्ट पुलिस अफसरों को बर्खास्त किया है और कई के खिलाफ जांच भी बिठाई है. उन्होंने 2005 में अबू सलेम और मोनिका बेदी जैसे अपराधियों को विदेश से पकड़ कर भारत में लाने में भी अग्रणी भूमिका निभाई है. जहां तक भ्रष्टाचार की जांच के अनुभव का सवाल है, कौन-सा ऐसा एक भी पुलिस वाला देश में है, जिसका भ्रष्टाचार से पाला नहीं पड़ा है? क्या ही अच्छा होता कि यह नियुक्ति सर्वसम्मति से होती.

डीजीपी पद से क्यों हटाए गए थे शुक्ला!

हालांकि डीजीपी पद से शुक्ला की विदाई के पीछे कांग्रेस आइटी सेल से जुड़े एक युवक की गिरफ्तारी को भी वजह बताया जाता है. जब बीते 24 जनवरी को दिल्ली पुलिस ने मध्य प्रदेश पहुंचकर अभिषेक मिश्रा नामक युवक को गिरफ्तार कर लिया था. जिसके बाद कांग्रेस नेता भड़क उठे थे. खुद गृहमंत्रा बाला बच्चन ने इस पर हंगामा खड़ा करते हुए कहा था कि बगैर मध्य प्रदेश पुलिस को सूचित किए कैसे दिल्ली की पुलिस यहां आकर किसी को गिरफ्तार कर सकती है. सूत्र बताते हैं कि उस वक्त सीएम कमलनाथ इस बात पर नाराज हुए थे कि सूबे में दिल्ली पुलिस घुस रही है और कैसे मध्य प्रदेश पुलिस को रंचमात्र भनक भी नहीं लग रही. एमपी पुलिस के इंटेलीजेंस पर भी सवाल खड़े हुए थे. सूत्र बता रहे हैं कि इस घटना के बाद से कमलनाथ ने शुक्ला को हटाने का पूरा मन बना लिया. अभिषेक की गिरफ्तारी के बाद मध्य प्रदेश सरकार ने दिल्ली पुलिस को पत्र लिखकर गिरफ्तारी के तरीके को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन बताते हुए नाराजगी जताई थी.

1983 बैच के आईपीएस ऋषि कुमार शुक्ला मूलतः ग्वालियर स्थित लाला बाजार के रहने वाले हैं. काडर भी गृह प्रदेश का ही उन्हें 1983 में मिला था. सबसे चौंकाने वाली बात विधानसभा चुनाव के दौरान सामने आई थी, जब वह स्वास्थ्य कारणों से करीब डेढ़ महीने की लंबी छुट्टी पर चले गए थे. चुनाव के समय इतनी लंबी छुट्टी को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं थीं. उनके इस फैसले से हलकान हुए चुनाव आयोग को उनकी जगह 1984 बैच के आईपीएस वीके सिंह को कार्यवाहक डीजीपी बनाना पड़ा था. विधानसभा चुनाव के बाद जब कांग्रेस की सरकार बनी और सत्ता की बागडोर कमलनाथ के हाथों आई तो शुक्ला के डीजीपी पद से हटने की अटकलें लगने लगीं. पांच दिन पहले 29 जनवरी को कमलनाथ सरकार ने ऋषि शुक्ला को डीजीपी पद से हटाकर हाउसिंग बोर्ड का मुखिया बना दिया. डीजीपी जैसे पद से हटाकर हाउसिंग बोर्ड का अध्यक्ष बनाने का मतलब है सरकार की ओर से साइडलाइन किया जाना. उन्हें हटाए जाने के पीछे सरकार के सूत्रों ने कानून-व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त रखने का हवाला दिया था. 

शिवराज के माने जाते हैं करीबी

अगर मध्य प्रदेश में कमलनाथ की सरकार न बनती तो ऋषि कुमार शुक्ला के नाम एक रिकॉर्ड जुड़ता. यह रिकॉर्ड चार साल तक डीजीपी रहने का बनता. दरअसल, शुक्ला अगस्त 2020 में रिटायर होने वाले हैं. शिवराज सिंह चौहान सरकार ने उन्हें 18 जून 2016 को डीजीपी बनाया था. इस प्रकार अगर वह चार साल तक डीजीपी पद पर रह सकते थे. हालांकि सूबे में निजाम के बदलने पर उन्हें पद से हटना पड़ा. सीबीआई में उनकी नियुक्ति दो साल के लिए हुई है. मध्य प्रदेश में वह यह  डीजीपी सुरेंद्र सिंह के रिटायरमेंट के बाद पुलिस महानिदेशक बने थे. बताया जाता है कि बीजेपी की सरकार में वह इतने भरोसेमंद हैं कि डीजीपी बनने से पहले भी वह कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर शिवराज सिंह चौहान के सलाहकार की भूमिका निभाते थे. पुलिस हाउसिंग कारपोरेशन का चेयरमैन रहते हुए शुक्ला ने आवास की समस्या हल करने की दिशा में जोर दिया था. उनके बारे में कहा जाता है कि वह अपने मातहत अफसरों और कर्मियों के हितों के लिए नेताओं से भी टकराने से नहीं हिचकते. उनके अंडर में काम कर चुके अफसर उन्हें मीठी बोली में कड़ी नसीहत देने वाला पुलिस अफसर मानते हैं. शुक्ला ग्वालियर के रहने वाले हैं. आईपीएस बनने के बाद उनकी सबसे पहली पोस्टिंग पुलिस उपाधीक्षक के तौर पर रायपुर मे हुई थी. इसके बाद वह दमोह, शिवपुरी और मंदसौर में पुलिस अधीक्षक के पद पर भी रहे. वह 1992 से 1996 के बीच केंद्र की नियुक्ति पर और 2009 से 212 के बीच आईबी में अतिरिक्त महानिदेशक के पद पर भी काम कर चुके हैं. अमेरिका में उन्होंने 1995 में क्राइसिस मैनेजमेंट में और 2005 में होस्टेज निगोसिएशन उन्होंने ट्रेनिंग ली है. 2017 में और 2018 में बाईपास सर्जरी के लिए वह लंबी छुट्टी पर गए थे.शुक्ला सीबीआई डायेरेक्टर के तौर पर मध्य प्रदेश कैडर के पहले आईपीएस अधिकारी होंगे. 


दो मीटिंग बाद हो सका फैसला
आलोक वर्मा को पद से हटाए जाने के बाद सीबीआई चीफ का पद 10 जनवरी से खाली चल रहा था. सीबीआई में डायरेक्टर आलोक वर्मा और ज्वाइंट डायरेक्टर राकेश अस्थाना के बीच हुए विवाद के बाद सरकार ने उन्हें पद से हटा दिया था. जिसके बाद से नए सीबीआई डायरेक्टर की खोज शुरू हुई थी. 24 जनवरी की बैठक में मल्लिकार्जुन खड़गे की आपत्ति के चलते किसी नाम पर फैसला नहीं हो पाया था. जिसके बाद एक फरवरी को फिर बैठक हुई. इस बैठक के अगले दिन शुक्ला के सीबीआई डायरेक्टर बनने की सूचना जारी की गई. बता दें कि आलोक वर्मा के पद से हटने के बाद 1986 बैच के ओडिशा काडर के आइपीएस अधिकारी नागेश्वर राव  23 अक्टूबर, 2018 से सीबीआइ के अंतरिम निदेशक का पद संभाल रहे थे.

ये आईपीएस थे रेस में
सीबीआई का डायरेक्टर बनने की रेस में 1983, 1984 और 1985 बैच के कई प्रमुख आईपीएस अफसरों का नाम चल रहा था.  1983 बैच के अफसरों की बात करें तो गृह मंत्रालय में विशेष सचिव (आंतरिक सुरक्षा) रीना मित्रा, उत्तर प्रदेश के डीजीपी ओ.पी. सिंह , सीआरपीएफ के महानिदेशक राजीव राय भटनागर का नाम प्रमुख था. वहीं 1984 बैच के कुछ प्रमुख नामों में एनआईए प्रमुख मोदी, राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी) के महानिदेशक सुदीप लखटकिया, पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो के प्रमुख ए.पी. माहेश्वरी, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलोजी एंड फॉरेंसिक साइंस के निदेशक एस. जावीद अहमद, सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के महानिदेशक रजनीकांत मिश्रा और भारत-तिब्ब्त सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के प्रमुख एस.एस. देसवाल शामिल रहे. वहीं 1985 बैच के आईपीएस अधिकारी और मुंबई पुलिस आयुक्त सुबोध कुमार जायसवाल का नाम भी उछल रहा था.

सीबीआई के निदेशक पद पर  ऋषि कुमार शुक्ला की नियुक्ति  के बाद आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी शुरू हो गया है. एक तरफ जहां कहा जा रहा है कि सीबीआई निदेशक पद पर ऋषि कुमार शुक्ला के नाम पर हाई पावर कमेटी के सदस्य और नेता विपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे सहमत नहीं थे और फैसला सर्वसम्मति से नहीं हुआ. तो अब दूसरी तरफ, केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने दावा किया है कि मल्लिकार्जुन खड़गे ने अपने पसंदीदा अधिकारियों को तवज्जो देने की ‘‘गलत मंशा” से सीबीआई प्रमुख के चयन के मानदंडों में ‘‘हेरफेर” करने की कोशिश की थी. उन्होंने खड़गे पर आरोप लगाया कि वह चयन समिति में हुई चर्चा के बारे में मीडिया को सिर्फ अपने हिसाब से चीजें बता रहे हैं. केंद्रीय कार्मिक राज्य मंत्री सिंह ने कहा, ‘खड़गे ने सीबीआई निदेशक के चयन से संबंधित स्वतंत्र एवं निष्पक्ष मूल्यांकन पर आधारित उद्देश्यपरक मानदंडों में हेरफेर की कोशिश की….वह उम्मीदवारों की अंतिम सूची में अपने कुछ पसंदीदा अधिकारियों को शामिल करना चाह रहे थे’.  कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने ऐतराज जताते हुए पीएम मोदी को चिट्ठी लिखी है. … ऋषि कुमार शुक्ला को केंद्रीय जांच ब्यूरो का निदेशक बनाए जाने पर कांग्रेस ने सवाल खड़े किए हैं। राज्य की कमलनाथ  सरकार के मंत्री डॉ. गोविंद सिंह ने तो शुक्ला की क्षमताओं पर सवाल उठाते हुए उन्हें अक्षम अधिकारी बता दिया है।डॉ. सिंह ने पत्रकारों से बातचीत में कहा, ‘शुक्ला के काल में राज्य में दलितों की हत्याएं हुईं, अन्य वर्गों पर अत्याचार हुए। किसानों को प्रताड़ित किया गया। वह अक्षम थे इसीलिए राज्य सरकार ने उन्हें डीजीपी के पद से हटाकर पुलिस हाउसिंग का चेयरमैन बनाया था। केंद्र सरकार ने भ्रष्टाचार के मामलों को दबाने के लिए शुक्ला को सीबीआई का निदेशक बनाया है।’ मंत्री गोविंद सिंह ने राज्य के व्यापम घोटाले और ई-टेंडरिंग घोटाले का जिक्र करते हुए कहा कि केंद्र सरकार इन मामलों को दबाना चाहती है। वहीं, दूसरी ओर बीजेपी के प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल ने राज्य सरकार के मंत्री के बयान पर आपत्ति दर्ज कराई है। उन्होंने कहा, ‘सीबीआई निदेशक की नियुक्ति करने वाली समिति में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश भी होते हैं। इस तरह के सवाल उठाना और आरोप लगाना ठीक नहीं है।’ 
बता दें कि ऋषि कुमार शुक्ला को मध्य प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद 30 जनवरी को डीजीपी के पद से हटाकर पुलिस हाउसिंग का चेयरमैन बनाया गया था। अब उन्हें सीबीआई का निदेशक बनाया गया है। सोमवार को उन्होंने नई दिल्ली स्थित सीबीआई मुख्यालय पहुंचकर कार्यभार संभाल लिया। इससे पहले सीबीआई के पूर्व डायरेक्टर आलोक वर्मा का विवाद सुर्खियों में रहा है। 

मध्य प्रदेश के पूर्व डीजीपी ऋषि कुमार शुक्ला ने सीबीआई प्रमुख की जिम्मेदारी संभाली. हालांकि उनका पहला ही दिन काफी चुनौतियों से भरा रहा, क्योंकि पश्चिम बंगाल में कोलकाता के पुलिस कमिश्नर से पूछताछ करने गई सीबीआई की टीम को कोलकाता पुलिस ने रोक लिया और ममता बनर्जी इस मामले को लेकर तब से धरने पर बैठी हुई हैं. शुक्ला सीबीआई डायेरेक्टर के तौर पर मध्य प्रदेश कैडर के पहले आईपीएस अधिकारी होंगे. उम्मीद है कि शुक्ला के पद सम्हालने के बाद कोलकाता पुलिस और सीबीआई के बीच चल रही तनाव की स्थिति में कुछ सुधार आएगा.

सीबीआई के अनुसार 1989 बैच के आईपीएस अधिकारी राजीव कुमार से सीबीआई रोज़ वैली चिट फंड मामले में गायब हुई फाइलों और दस्तावेजों के बारे में पूछताछ करना चाहती थी, लेकिन उन्होंने इस मामले में सहयोग नहीं किया

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