इतनी भीड़ तो मैंने लखनऊ में किसी राजनेता के अस्पताल जाने पर भी नहीं देखी थी‘

BY: हरि शंकर व्यास//

मैं अधिकारियों पर लगभग नहीं लिखता हूं। हां, रोजमर्रा की रिपोर्टिंग के दिनों में जरूर दिल्ली गलियारों के अनुभव में विनोद पांडे, भूरेलाल, गोपी अरोड़ा, पीवीकेआर प्रसाद, मणिशंकर अय्यर जैसे अफसर आते-जाते रहे और उन पर जनसत्ता के गपशप कालम में अच्छा –बुरा लिखता रहा। प्रदेश के अफसरानों पर भी ज्यादा ध्यान नहीं बना। इसमें जयपुर, लखनऊ का मामला अपवाद रहा। जयपुर में अकेले जगदीश चंद्रा के कारण डीआर मेहता, वीबीएल माथुर से ले कर श्रीपद पांडे, तन्यम कुमार आदि के लंबे वक्त के अनुभव में समझ बनी कि हर राज्य की नौकरशाही उस राज्य का चरित्र लिए होती है। यूपी और लखनऊ की नौकरशाही का अपना नजरिया मोटे पर जनसत्ता के वक्त से हेमंत शर्मा की नौकरशाही पर वहां रही पकड़ के कारण रहा। उसी से नृपेंद्र मिश्रा, पंकज प्रियदर्शी, शशांक शेखर कई को जानने-समझने की प्रक्रिया में राजनैतिक नेतृत्व और अफसर के रिश्तों की बारीकी समझी। यूपी में नारायणदत्त तिवारी, कल्याणसिंह, मुलायमसिंह यादव से ले कर अखिलेश यादव आदि की लीडरशीप पर करीबी नजर रही तो उससे यह बूझ पड़ा कि नेता को सफल, असफल बनाने में उन अफसरों का क्या मतलब होता है जो नतीजे देने वाले होते हैं, जो डिलीवर करते हैं।

इसमें नंबर एक समकालीन प्रमाण नवनीत सहगल हैं। शुक्रवार की शाम नवनीत सहगल की सड़क दुर्घटना का एलर्ट सुना, पूरा ब्योरा जाने बिना तो दिमाग में पहला ख्याल था कि यदि रोड दुर्घटना है तो कहीं बन रहे आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे पर तो नहीं हुई? एक्सप्रेसवे का मतलब नवनीत सहगल। एक अफसर और उत्तर भारत के सबसे बड़े दो एक्सप्रेसवे। एक अफसर दो मुख्यमंत्री। मायावती के वक्त में उनके खास नवनीत सहगल तो अखिलेश यादव के वक्त भी उनके खास नवनीत सहगल। एक के वक्त दिल्ली-आगरा एक्सप्रेसवे का निर्माण तो दूसरे के वक्त आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे।

आप मानेंगे नहीं, लेकिन यूपी में रिकार्ड बन रहा है कि अखिलेश यादव ने नवनीत सहगल पर विश्वास कर आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे प्रोजेक्ट को चार साल (टेंडर के बाद तीन साल) के भीतर पूरा करवा दिया। इस एक्सप्रेस वे में गंगा पर पुल भी है। यह एक्सप्रेस वे उदघाटन के कगार पर है। अपना मानना था और है कि दिल्ली-आगरा एक्प्रेसवे और यह नया आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस सीएम स्तर की जिद्द की कम समय की पूरे भारत की उल्लेखनीय चमत्कारिक सफलता है। नवनीत सहगल का रोल दोनों में यह साबित करने वाला हुआ कि यदि लीडरशिप फैसला कर ले और डिलीवर करने वाला अफसर छांट ले तो विशाल प्रोजेक्ट भी चुटकियों में हो सकते हैं। पिछले चार सालों में ही इस प्रोजेक्ट के लिए लाखों एकड़ जमीन अधिग्रहित हुई। पर एक जगह किसान आंदोलन नहीं हुआ। अरबों के टेंडर हुए एक घपला नहीं

सुना। बिहार में गंगा पुल बनने में बीसियों साल लगते हैं वही चार साल में गंगा सहित कई नदियों पर पुल गए और छह लेन का पूरा एक्सप्रेसवे उदघाटन के कगार पर!

विडंबना कि उसी एक्सप्रेसवे पर ट्रायल देख कर लौटते नवनीत सहगल की कार दुर्घटना हुई। गनीमत ( हेमंत ने जो ब्योरा बताया है) जो पूजा-पाठ में भी चौबीसों घंटे लगे रहने वाले, शिव और हनुमान के इस भक्त की पुण्यता का कमाल रहा कि कार बुरी तरह दुर्घटनाग्रस्त, पूरे शरीऱ पर हर जगह चोट बावजूद इसके शरीर की हर जगह सूत भर बचे। अस्पताल से हेमंत ने सहगल की स्थिति को ले कर एसएमएस से यह ब्यौरा भेजा है- ‘ललाट से सिर तक पूरी चमड़ी टोपी की तरह खुली है। चश्मे ने नाक और आंख को घायल किया है। सरवाईकल की तीन हड्डियों में हेयर लाईन फैक्चर है। छाती की तीन पसली टूटी है। गाल और आंख के नीचे की हड्डी में फ्रैक्चर है। जांघ में फीमर बोन टूट कर एक दूसरे पर चढ़ी है। घूटने और एड़ी के बीच एक फैक्चर है। बावजूद इस सबके वे होश में हैं। आईसीयू में मुझे आवाज से ही पहचान कर बोले- पहले से बेहतर हूं। आप कब आए? आंखों में सूजन के कारण आंखे खुल नहीं रही हैं।

यह चमत्कार, हां, इतनी चोट लगने के बाद भी भगवान ने बाल-बाल बचाया है। लोगों की दुआएं और नवनीत की कमाई पुण्यायी आज दिखी। ट्रामा सेंटर और अस्पताल ठसाठस भरा था। बाहर सड़क जाम थी। मुंबई के उद्योगपति से ले कर मंदिर के पुजारी तक सब नवनीत का हाल पूछ रहे थे। इतनी भीड़ तो मैंने लखनऊ में किसी राजनेता के अस्पताल जाने पर भी नहीं देखी थी।‘

सोच सकते हैं हेमंत ने लखनऊ से यह सब बताया है और एक अफसर पर जब मैं इतना लिख रहा हूं, तो डिलीवर करने, सभी में अजातशत्रु बन कर रहने, हर किस्म के मीडिया के प्रिय रहने की इस शख्सियत की खूबियां कितने अर्थ लिए होंगी। बहरहाल, अपनी कामना कि वे जल्दी स्वस्थ हों और अस्पताल ( क्योंकि वे दिल्ली के मेदांता में शिफ्ट होने हैं) से छूटते ही उसी एक्सप्रेसवे से लखनऊ लौटें जिसे उन्होंने तीन साल में बनवाने का कमाल दिखाया।

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