आईटीबीपी में आईजी के 50 फीसदी पदों को डेपुटेशन से भरने पर रोक

आईपीएस और केंद्रीय सुरक्षा बलों के कॉडर अधिकारियों के बीच चल रहा विवाद अब और ज्यादा गहरा गया है। पिछले माह 23 अक्तूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में आईटीबीपी के कॉडर रिव्यू को अंतिम रूप दिया गया था। इस बैठक के बाद उसी दिन शाम को बल में नए पदों के सृजन का आदेश जारी कर दिया गया।कॉडर रिव्यू के तहत आईटीबीपी में एडिशनल डीजी के दो, आईजी के 10, डीआईजी के 10, कमांडेंट के 13, टू-आईसी के 16 और डिप्टी कमांडेंट के नौ पदों के सृजन को मंजूरी दे दी गई।इनके अलावा नॉन जीडी कॉडर में भी आईजी के दो पदों को स्वीकृति मिली। कॉडर अफसरों के मुताबिक, ऑर्गेनाइज्ड सर्विस कैडर की मौजूदा पॉलिसी के सभी नियमों के तहत नए सर्विस रूल बनाकर बल का कॉडर रिव्यू होना था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
नतीजा, बल के कुछ अधिकारी हाईकोर्ट पहुंच गए। हाईकोर्ट ने सोमवार को आईजी के पचास फीसदी नए सृजित पदों को डेपुटेशन के जरिए भरने पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने कहा कि अगले आदेश तक आईटीबीपी में प्रशासनिक ग्रेड पर कोई भी नियुक्ति डेपुटेशन से नहीं की जानी चाहिए।

आईपीएस और कॉडर अफसरों के बीच लम्बे समय से चल रहा है यह विवाद

दिल्ली हाईकोर्ट में जस्टिस एस. मुरलीधर और तलवंत सिंह की डिवीजन बेंच ने आईटीबीपी अधिकारियों की याचिका पर सुनवाई की है। बता दें कि पिछले पांच-छह सालों से केंद्रीय सुरक्षा बलों के कॉडर अफसरों और आईपीएस अधिकारियों के बीच अपने हितों को लेकर विवाद चल रहा है। यह विवाद पहले हाईकोर्ट पहुंचा था और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने दोनों ही जगह पर कॉडर अफसरों के हित में फैसला सुनाया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी में कॉडर अफसरों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा था कि केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को ग्रुप-ए की संगठित सेवाओं का दर्जा देकर वहां तत्काल प्रभाव से एनएफएफयू (नॉन फंक्शनल फाइनेंसियल अपग्रेडेशन) लागू किया जाए।

सभी बलों के कॉडर अधिकारियों को संगठित सेवा कॉडर का हिस्सा बनाकर नए नियमों के तहत इन्हें सर्विस के सभी फायदे दिए जाएं। यानी एक तय समय सीमा के बाद इन अधिकारियों को अगला रैंक (किसी वजह से जैसे सीट खाली नहीं है या कोई दूसरी दिक्कत है) नहीं मिलता है तो उस रैंक के सभी वित्तिय फायदे संबंधित अधिकारी को दें।

इसके खिलाफ आईपीएस एसोसिएशन भी सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गई। बल के अधिकारियों का आरोप है कि केंद्र सरकार ने कथित तौर पर आईपीएस एसोसिएशन का पक्ष लेते हुए सुप्रीम कोर्ट में इस मामले का हल करने के लिए एक कमेटी गठित करने की बात कह दी। इसके लिए 17 जुलाई तक का समय ले लिया गया। इसके बाद सरकार ने नवंबर तक का समय मांगा।

हालांकि अभी तक एनएफएफयू के बाबत कोई भी अंतिम फैसला नहीं हो सका है। अब वह समय अवधि 30 नवम्बर कर दी गई है। केंद्र सरकार सभी बलों में एक साथ सुप्रीम कोर्ट का फैसला लागू नहीं कर रही है। जैसे आईटीबीपी के लिए अलग से कॉडर रिव्यू कर सभी लाभ देने की बात कह दी गई।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सभी केंद्रीय अर्धसैनिक बल ऑर्गेनाइज्ड कॉडर का हिस्सा 

सुप्रीम कोर्ट के पांच फरवरी 2019 के फैसले के अनुसार सभी केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को ऑर्गेनाइज्ड कॉडर का हिस्सा माना गया था। इसके बाद 23 अक्तूबर 2019 को केंद्रीय कैबिनेट ने आईटीबीपी का कॉडर रिव्यू मंजूर किया था। इसमें कहा गया कि आईटीबीपी को ऑर्गेनाइज्ड कॉडर मानकर इसके सभी अफसरों को सेवा लाभ दिए जा रहे हैं।

आईटीबीपी के स्थापना दिवस पर हुई एक प्रेसवार्ता में खुद डीजी एसएस देशवाल ने यह बात कही थी कि कॉडर अफसरों को सभी फायदे दे दिए गए हैं। उन्होंने अपने दोनों तरफ बैठे कॉडर अफसरों की ओर देखकर कहा कि क्या आपको इनके चेहरे देखकर लगता है कि इन्हें कोई दिक्कत है।ये सभी बहुत खुश हैं।कुछ ही घंटे बाद बल का कॉडर रिव्यू जारी कर दिया गया।बल के अधिकारियों का कहना था कि यह रिव्यू पुराने नियमों के तहत हुआ है। नए सर्विस रूल नहीं बनाए गए हैं। पुराने सर्विस रूल्स के अनुसार, डेपुटेशन की व्यवस्था जारी रखी जा रही है।

दूसरी ओर आर्गेनाइज्ड सर्विस कॉडर में यह बात कही गई है कि किसी भी बल में आईजी रैंक तक के सभी पदों को सिर्फ कॉडर सेवा के अधिकारियों की प्रमोशन द्वारा ही भरे जाना आवश्यक है। आईटीबीपी के कॉडर अधिकारी इस नीति के विरोध में दिल्ली हाईकोर्ट चले गए। हाईकोर्ट ने अंतरिम आदेश जारी करते हुए आईटीबीपी में आईजी रैंक पर किसी भी तरह के डेपुटेशन से होने वाली नियुक्ति पर रोक लगा दी।

अब कभी भी जारी हो सकता है सीआरपीएफ का कॉडर रिव्यू

दुनिया के सबसे बड़े अर्धसैनिक बल ‘सीआरपीएफ’ का कॉडर रिव्यू अब कभी भी जारी हो सकता है। इसके लिए तमाम औपचारिकताएं पूरी कर ली गई हैं। हालांकि बल के कॉडर अधिकारी बताते हैं कि केंद्र सरकार ने उन्हें लेकर जो नीति बनाई है, वह ठीक नहीं है। आईपीएस बनाम कॉडर अफसर विवाद को ख़त्म करने के लिए जो कमेटी बनी है, उसमें कॉडर का कोई भी अफसर शामिल नहीं है। कमेटी में या तो आईएएस हैं या फिर आईपीएस।

सीआरपीएफ के सेवानिवृत आईजी वीपीएस पवार का कहना है, अगर  सरकार का मन साफ है तो वह बार बार सुप्रीम कोर्ट में समय क्यों मांग रही है। एक तरफ सरकार कहती है कि हम सभी फायदे देने को तैयार हैं तो दूसरी ओर नए सर्विस रूल फ्रेम नहीं किए जा रहे हैं। जब तक नए रूल फ्रेम नहीं होंगे, तब तक सरकार की घोषणा का कोई फायदा नहीं होगा। वजह, वर्तमान सर्विस रूल में सभी कमांडर असंगठित कॉडर के अंतर्गत आते हैं।इसमें सरकार की मनमर्जी चलेगी और कॉडर अफसरों को कोई फायदा नहीं होगा। यदि नए सर्विस रूल फ्रेम होते हैं तो अपने आप सभी कमांडर संगठित कॉडर में आ जाएंगे। संगठित कॉडर का दर्जा मिलने के बाद इन अफसरों को एनएफएफयू और एनएफएसयू के सभी फायदे खुद ब खुद मिल जाएंगे। नियम तो यह कहता है कि सरकार 1986 से सुप्रीम कोर्ट का फैसला लागू करे। अगर यह नहीं होता है तो कम से कम 2006 से सभी लाभ मिलें।

पवार के मुताबिक, फिलहाल सरकार का ऐसा कोई रवैया नहीं दिखता, जिससे कॉडर अफसर राहत महसूस कर सकें। ये अफसर अपना कॉडर रिव्यू जारी होने का इंतजार कर रहे हैं। यदि इन पर भी नियमों से परे हटकर कॉडर रिव्यू के मनमर्जी वाले फायदे थोपे जाते हैं तो ये अफसर भी आईटीबीपी की भांति हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने में देर नहीं लगाएंगे।

सरकार नहीं चाहती कि सभी अफसरों को कॉडर रिव्यू का फायदा मिले! 

सीआरपीएफ, बीएसएफ और आईटीबीपी के कॉडर अधिकारियों का आरोप है कि सरकार जानबूझकर सभी अफसरों को कॉडर रिव्यू का फायदा नहीं देना चाहती। अगर सरकार नए सर्विस रूल फ्रेम किए बिना एनएफएफयू देती है तो उसका फायदा बल के केवल बीस फीसदी अफसरों को मिलेगा। बाकी के कॉडर अफसर इससे वंचित रह जाएंगे। प्रोमोशन कोर्स की शर्त लगाई जा सकती है।

सरकार कहेगी, जिन्होंने ये कोर्स नहीं किया है, उन्हें फायदे नहीं मिलेंगे। कॉडर अफसरों को नए सर्विस रूल के तहत उक्त फायदा दिया जाए। यदि ऐसा होता है तो ही सभी अफसरों के साथ न्याय हो सकेगा। इस साल फरवरी में सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में माना था कि सीएपीएफ के ग्रुप-ए के अधिकारियों को छठे वेतन आयोग के संदर्भ में 2006 से एनएफएफयू सहित सभी लाभ दिए जाने चाहिएं। शीर्ष अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट के दो फैसलों को सही ठहराया था, जिनमें इन बलों को ‘संगठित सेवा’ का दर्जा दिया गया था।

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