अाप्रवासियों पर सख्ती से सिलिकॉन वैली ही नहीं, बिगड़ सकता है पूरे अमेरिका का कारोबारी संतुलन

फरहादमन्जू और डेविड स्ट्रेटफेल्ड //इंटेलऔरएपल उन चुनिंदा कंपनियों में शामिल हैं, जिन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के ‘मुस्लिम देशों के शरणार्थियों पर पाबंदी’ वाले फैसले पर खुलकर कुछ नहीं कहा है। जबकि सिलिकॉन वैली की 130 कंपनियां ऐसी हैं, जिन्होंने इस फैसले का कानूनन विरोध किया है। सिलिकॉन वैली की टेक कंपनियां दुनियाभर से जुड़ी हुई हैं। वहां काम करने वाले लाखों लोग अलग-अलग देशों के नागरिक हैं। उनमें खुद के भविष्य को लेकर कई तरह की शंकाएं हैं। हालांकि, यह स्पष्ट है कि अगर सभी अाप्रवासियों पर सख्ती की जाती है तो सिलिकॉन वैली ही नहीं, पूरे अमेरिका का कारोबारी संतुलन बिगड़ जाएगा।
सिलिकॉन वैली की जिन कंपनियों ने ट्रम्प के फैसले का ‘मौन समर्थन’ किया है, उसका कारण सिर्फ और सिर्फ वह कॉर्पोरेट टैक्स और रेगुलेशन्स हैं, जिसे कम करने की घोषणा ट्रम्प ने की है। अमेरिका भी उन देशों से अलग नहीं है, जहां अपना कारोबार चलाने के लिए सरकार के साथ संतुलन बनाकर चलना पड़ता है। शायद इसी कारण इंटेल के चीफ एग्जीक्यूटिव ब्रायन कजानिक को एरिजोना में नई फैक्टरी की घोषणा करने के लिए व्हाइट हाउस आना पड़ा।
ट्रम्प के साथ मुलाकात के बाद कजानिक ने कहा कि वे 475 अरब रुपए फैक्टरी में लगाएंगे, जिससे 3,000 लोगों को रोजगार मिलेगा। कजानिक उन लोगों में शामिल हैं, जिन्होंने ट्रम्प के चुनाव प्रचार के लिए चंदा देने की घोषणा के बाद इंकार कर दिया था। ट्रम्प के फैसले के बाद कजानिक ने ट्वीट में कहा कि एक शरणार्थी एवं कंपनी का सह-संस्थापक होने के नाते मैं कानूनी मान्यता वाली आप्रवासन नीति का समर्थन करता हूं। इंटेल के शुरुआती दौर के तीसरे कर्मचारी एवं लंबे समय तक एग्जीक्यूटिव रहे एंड्रयू एस ग्रूव वर्ष 1956 में सोवियत आक्रमण के बाद हंगरी से अमेरिका गए थे। उसके बाद से उन्होंने अमेरिका में ही रहकर खुद को स्थापित किया।
सिलिकॉन वैली में काम करने वाले इंजीनियर, विशेषज्ञ, तकनीशियन एवं अन्य लोग बहुत पढ़े-लिखे हैं, समृद्ध हैं और समूह में वे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों को देखें, तो सिलिकॉन वैली में काम करने वाले लोग ही उनके निशाने पर नहीं हैं। ऐसे कई लोग, जिन्होंने दिग्गज टेक कंपनियों को आबाद किया है, वे भी खुश हो सकते हैं अगर अफोर्डेबल केयर एक्ट (ओबामा केयर का नया नाम) के लिए उन्हें बाध्य किया जाए तो। इनमें ज्यादातर ऐसे लोग भी हैं, जो मैक्सिको सीमा पर प्रस्तावित दीवार के लिए सहमत नहीं हैं। टेक कंपनियों में काम करने वाले सभी लोग ट्रम्प के कार्यकाल का अप्रत्याशित लाभ ले सकते हैं। वे बच्चों की देखभाल के लिए टैक्स में छूट ले सकते हैं, उनकी कंपनियां मुनाफे के रूप में उन्हें घर भेजने की सुविधा के तौर पर दे सकती है। इसके अतिरिक्त टैक्स में मिलने वाली छूट के तौर पर एक या दो लग्ज़री छुटि्टयों के पैकेज मिल सकते हैं। इन बातों को अलग-अलग तरह से समझ सकते हैं- पहला यह कि पिछले दो सप्ताह से सिलिकॉन वैली और सिएटल में ट्रम्प के फैसले के खिलाफ जो विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, उसका उद्‌देश्य कम अवधि के वित्तीय लाभ हासिल करना ही नहीं है। अगर कोई यह जानना चाहता है कि क्यों सिलिकॉन वैली के लोग ट्रम्प के आदेश का विरोध कर रहे हैं। इसके लिए जरूरी है कि पहले वे अमेरिका की ‘ओपन इमिग्रेशन पॉलिसी’ के लाभ समझ लें। उसी के कारण सिलिकॉन वैली और अमेरिका की पूरी टेक इंडस्ट्री दुनियाभर में शीर्ष पर है। इसमें सबसे बड़ी एवं महत्वपूर्ण भूमिका ओपन इमिग्रेशन पॉलिसी की है। उसे अगर बंद कर दिया गया तो अमेरिका के आईटी उद्योग समेत कई तरह के कारोबार पर गहरा असर पड़ेगा।
सिलिकॉन वैली में काम करने वाले विशेषज्ञ, आईटी के जानकार यहमानकर चल रहे हैं कि ट्रम्प का एग्जीक्यूटिव ऑर्डर और वो फैसले, जिनके होने की आशंका है, वे प्रलय के समान होंगे। अगर ऐसा हुआ तो अमेरिका दुनिया को श्रेष्ठ आविष्कारक देने वाला दीपस्तंभ नहीं रह जाएगा। सेन फ्रांसिस्को स्थित पेमेंट स्टार्टअप स्ट्रिप के सह-संस्थापक जॉन कॉलिसन कहते हैं- दुनियाभर में टैलेंट कहीं भी हो, अमेरिका उसका इस्तेमाल करना जानता है। कोई भी व्यक्ति वैश्विक स्तर की टेक कंपनियों से अमेरिका की टेक कंपनियों की तुलना करके खुद यह बात समझ सकता है। यह सामान्य बात बिल्कुल नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि सिलिकॉन वैली पिछले कुछ दशकों में ऐसा इंजन बनाने में बहुत सफल रही है, जहां दुनियाभर का टैलेंट आना चाहता है। लेकिन, वर्तमान परिदृश्य में मुझे यह सब नाजुक नजर आता है। अगर राष्ट्रपति ट्रम्प की इमिग्रेशन नीति में बदलाव नहीं हुआ, तो अमेरिका की टेक इंडस्ट्री बर्बाद हो जाएगी।
पिछले वर्ष थिंक टैंक नेशनल फाउंडेशन फॉर अमेरिकन पॉलिसी ने रिसर्च की थी, जिसमें पता चला था कि 87 निजी अमेरिकन स्टार्टअप ऐसी हैं, जिनकी कीमत 68 अरब रुपए या उससे अधिक है। रिसर्च में इससे भी अधिक चौंकाने वाली जानकारी सामने आई थी। वह यह कि उनमें आधे से अधिक स्टार्टअप ऐसे हैं, जिनकी स्थापना करने वाले एक या उससे अधिक लोग प्रवासी थे। उनमें 71 फीसदी प्रवासी एग्जीक्यूटिव पद पर नियुक्त थे।

{ संयुक्त रूप से ये कंपनियां उबर, टेस्ला, प्लेन्टिर आदि हैं। इन्होंने हजारों जॉब तैयार किए हैं और पिछले दशक में इन्होंने केवल अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मंदी से निकालने में बड़ी भूमिका निभाई, बल्कि खरबों डॉलर कमाई करके उसे मजबूत भी बनाया। ये वही कंपनियां हैं, जिनके संस्थापक दुनिया के अलग-अलग देशों के नागरिक हैं। वे भारत, ब्रिटेन, कनाडा, इजरायल और चीन आदि देशों से वास्ता रखते हैं।

{ वर्ष 2011 में अाप्रवासन सुधार समूह ‘पार्टनरशिप फॉर न्यू अमेरिकन इकोनॉमी’ ने पाया कि फॉर्च्य्ून-500 की सूची में शामिल कंपनियों में 40 फीसदी की स्थापना या तो अाप्रवासियों ने की या उनके बच्चों ने। अाप्रवासन सुधार समूह का मानना है कि अगर फॉर्च्यून-500 कंपनियों की ताज़ा सूची देखी जाए, तो उसमें कई कंपनियां ऐसी हैं, जिनके संस्थापकों में अाप्रवासियों की संख्या अधिक है।

 

{ऐसी कई बातें हैं, जो बाहरी लोगों को भी परेशान कर सकती हैं, क्योंकि सिलिकॉन वैली को उसके खुलेपन की नीति, विविधता और सामाजिक समावेश के लिए जाना जाता है। महिलाएं और गैर-एशियाई लोग भी कर्मचारियों के रूप में इस इंडस्ट्री के अंश हैं। यहां तक की इस इंडस्ट्री के एग्जीक्यूटिव का एक हिस्सा और वेंचर कैपिटलिस्ट भी उन्हीं में से है।

 

{कहा जा सकता है कि ज्यादातर कंपनियों के मालिक वे हैं, जो अपने यहां आने वाली प्रतिभाओं की पहचान उनके रंग से नहीं करते। अगर यहां की आईटी इंडस्ट्री का अब तक का इतिहास लिखा जाए, तो उसमें पता चलेगा कि प्रवासियों ने उसमें कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

 

{इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि आप भी ऐसी किसी कंपनी से जुड़े होंगे या उसे कुछ दशकों से जानते होंगे, जिसके संस्थापक अाप्रवासी हों। उदाहरण के लिए गूगल के एक संस्थापक (सर्गी ब्रिन, रूस) को ही लीजिए। वे रूस से आए थे और उसके वर्तमान चीफ एग्जीक्यूटिव (सुंदर पिचाई) भारतीय अप्रवासी हैं।

{माइक्रोसॉफ्ट के चीफ एग्जीक्यूटिव (सत्या नडेला) भी भारत से हैं। ईबे और याहू की शुरुआत भी अाप्रवासियों ने मिलकर की थी। फेसबुक की बड़ी सहायक कंपनी इंस्टाग्राम और वॉट्सएप की स्थापना भी अाप्रवासियों ने की थी। जबकि, एपल की स्थापना अाप्रवासी नागरिक के बच्चे ने की थी।

{ सेन फ्रांसिस्को स्थित पेमेंट स्टार्टअप स्ट्रिप के सह-संस्थापक जॉन कॉलिसन छह साल पहले आयरलैंड से अमेरिका आकर बसे हैं। वे कहते हैं- सिलिकॉन वैली कोई घटना या पहले से निश्चित दुनिया का कोई राज्य नहीं है। इसकी गरिमा, इसके गौरव और इसकी उपलब्धियों का एकमात्र और सबसे बड़ा कारण यह है कि यहां सीमाओं से परे दूर देशों में रहने वाले सभी लोगों का स्वागत किया जाता है। सिलिकॉन वैली किसी तरह की सीमा नहीं मानती। मैंने कई देशों की यात्रा करके, लोगों से बात करके पूछा कि क्या सिलिकॉन वैली की प्रतिकृति किसी अन्य देश या शहर में बनाई जा सकती है- लंदन, पेरिस, सिंगापुर या ऑस्ट्रेलिया? इसका सीधा-सा उदाहरण यह है कि इन सभी जगहों पर सिलिकॉन वैली जैसे अपने अलग टेक हब हैं। यही कारण है कि आज भी दुनिया का हर वो शख्स जो आईटी टेक्नोलॉजी जानता है, वह सिलिकॉन वैली आना चाहता है।

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