अब्बदुल जब्बार त्रासदी /गैर-दलीय राजनीति के झंडाबरदार थे, जब्बारभाई

हमेशा के लिए विदा हो जाने के बाद हो रहीं उनकी खासियतों-खामियों की तमाम चर्चाओं के बीच यह जानना दिलचस्प हो सकता है कि आखिर वे, जिनको अब्दुल जब्बार से जब्बारभाई और फिर प्यार-आदर में घिसते-घिसाते सिर्फ भाई के नाम से पुकारा, मान दिया जाता था, क्या थे? करीब ढाई दशक पहले ‘बीबीसी’ के लिए काम कर रहे स्टीवन पर्सी ने दिल्ली में जब्बारभाई का एक लंबा इंटरव्यू‘ करने के बाद फुरसतिया गप्पों के बीच कहा था कि अब्दुल जब्बार दरअसल भोपाल में ‘गैर-दलीय राजनीति का शो-पीस’ हैं। राज्य के राजनीतिक, सांस्कृतिक और कमोबेश भौगोलिक केन्द्र में सक्रिय ‘भोपाल गैस पीडित महिला उद्योग संगठन’ के मुखिया पिछले करीब 35 साल से जिस तरह की राजनीति कर रहे थे उसे सत्तर-अस्सी के दशक में ख्यात समाजशास्त्री प्रोफेसर रजनी कोठारी ने ‘गैर-दलीय राजनीति’ की संज्ञा दी थी। प्रोफेसर कोठारी ने उस दौर में स्थानीय, लेकिन व्यापक महत्व के मुद्दों को लेकर राजनीति करने वाले ऐसे समूहों के बारे में अपनी कई किताबों में विस्तार से लिखा है। क्या थी यह राजनीति?
मोटे तौर पर आजादी के पहले और बाद में सक्रिय रहीं देश की राजनीतिक जमातें जिन सिद्धान्तों , रणनीतियों और गठन के पारदर्शी तौर-तरीकों को मानने का दावा करती हैं, चुनाव में हार-जीत के चलते उन्हीं मूल्यों के अमल में बेशर्म ढील देती रहती हैं। अधिकांश राजनैतिक दलों को आमतौर पर सत्ता की मार्फत सामाजिक-राजनीतिक बदलाव की प्रक्रिया पर भरोसा होता है और इसलिए वे चुनाव को अपने राजनीतिक कर्म का प्रमुख और कई बार एकमात्र पडाव मानती हैं। दूसरी तरफ, गैर-दलीय राजनीति सत्ता को दोयम दर्जे की हैसियत देते हुए उन्हीं मूल्यों को पूरी निष्ठा से लागू करने की कोशिश करती हैं। इस सिलसिले की शुरुआत आजादी के आंदोलन केे दौरान ही हुई थी और उन दिनों गांधी के प्रभाव में आम नागरिक समाज की सेवा के कामकाज में हाथ बंटाकर एक तरह की सामाजिक-राजनीतिक समझ विकसित करता था। अनुभवों और निष्ठाओं के सतत बदलाव के चलते धीरे-धीरे पहले सेवा का काम विकास की कोशिशों में बदला और फिर विकास की कोशिशें राजनीतिक समझ और प्रशिक्षण में परिवर्तित होती गईं। सब जानते हैं कि सेवा के काम की जरूरत तब तक लगातार बनी रहती है जब तक कि परिस्थितियों में कोई बुनियादी बदलाव नहीं किया जाता। इस बुनियादी बदलाव के लिए किया जाने वाला विकास भी तब ही कारगर हो पाता है जब वर्गों, जातियों, क्षेत्रों आदि में विभाजित समाज इसके लिए तैयार नहीं हो जाता। यह तैयारी राजनीतिक प्रशिक्षण और उसके नतीजे में खडे होने वाले राजनीतिक समूहों, जमावडों की मार्फत होती और कारगर की जाती है।
जब्बारभाई इसी वैकल्पिक कही जाने वाली राजनीति के प्रतिनिधि थे। कई बार संसद, विधानसभा के चुनाव लडने, लडवाने के बावजूद करीब 35 साल के उनके सार्वजनिक जीवन में सत्ता कभी केन्द्र में नहीं रही। उनका समूचा सफर मूल्यों, उनके लिए संघर्ष करने और नतीजे में जीतने-हारने का रहा। जिन्हेंं जब्बारभाई को करीबी से जानने का मौका रहा है वे जानते हैं कि चारों तरफ एक विपरीत वातावरण में रहने के बावजूद वे अपनी राह खुद बनाकर उस पर चलते रहे। सदा बदलती राजनीतिक सत्ताओं, प्रशासनिक कारिंदों, न्यायिक संस्थानों, यहां तक कि खुद उनके सहकर्मियों तक का विरोधी, असहमत आचरण उन्हें कभी अपनी निष्ठाओं से नहीं डिगा पाया। नतीजे में ऐसा कभी नहीं हुआ कि जब्बारभाई देश-प्रदेश में फैले अपने कतिपय सहधर्मी सामाजिक कार्यकर्ताओं की तरह पूरे निश्चिंत मन और धन-धान्य से सम्पन्न रह कर सत्ता के आसपास रहे हों। बाइस हजार से ज्यादा निरपराध लोगों को मारने और लाखों लोगों को प्रभावित, अपाहिज बनाकर तिल-तिलकर मरने के लिए छोडने वाली दुनिया की भीषणतम औद्योगिक गैस त्रासदी को भूलने और भुलाने की तमाम कोशिशें की गईं, लेकिन जब्बार अपनी हर शनिवार की मामूली-सी बैठक के जरिए तीन दशकों से अधिक तक उसे जिन्दा बनाए रखे। तीन दिसंबर 84 को हुई भयानक औद्योगिक त्रासदी को देश, प्रदेश की विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका ने बुनियादी विमर्श से बाहर रखने का पूरा प्रयास किया, कई बार उसे भुलाया भी, लेकिन एक मामूली से दफ्तर और बेहद सीमित संसाधनों के जरिए ‘भोपाल गैस पीडित महिला उद्योग संगठन’ त्रासदी के दुष्परिणामों से निपटता रहा।
इस लडाई में वे तमाम लोग भागीदार रहे जिन्हें आमतौर पर सामाजिक ढांचे में हाशिए पर ही माना जाता है। मसलन-गैस पीडितों की इस लडाई में जब्बार ने उन महिलाओं को कमान सौंपी जो अब तक केवल निम्न या निम्न-मध्यमवर्गीय घरों की चारदीवारी में अधिक-से-अधिक सुघड-गृहिणी की भूमिका निभाती रही थीं। संगठन की इन महिलाओं में भी जाति, वर्ग, रहन-सहन, शिक्षा आदि को लेकर कोई भेदभाव कभी नहीं माना गया। जहां संगठन के नेतृत्व में ऊषा शुक्ला, शांतिदेवी थीं, तो वहीं हमीदा आपा और सायरा भी। यह संगठन भले ही नाम से भोपाल गैस कांड के प्रभावितों को समर्पित दिखाई देता हो, लेकिन देश-प्रदेश में अन्याय, गैर-बराबरी और दमन के खिलाफ होने वाली किसी भी लडाई में इस संगठन की मौजूदगी हमेशा देखी जा सकती थी। सुदूर दक्षिण-एशिया के सीरिया में जारी गृहयुद्ध, म्यांमार के रोहिंग्या, फिलिस्तीन आदि से लगाकर नर्मदा बांधों के विस्थापित, छत्तीसगढ के मजदूर, महिलाओं की हैसियत, कुडाकुलम में परमाणु ऊर्जा संयंत्र, मॉब-लिंचिंग, साम्प्रदायिकता जैसे तमाम मुद्दे जब्बारभाई और उनकी मार्फत संगठन के सरोकारों में शामिल थे। संगठन की इतनी व्यापक रुचियां असल में शहरी निम्न, निम्न-मध्यमवर्ग के आम,वंचित लोगों को राजनीतिक चेतना सम्पन्न बनाने की पहल की तरह थीं। करीब तीन दशकों के इस लंबे राजनीतिक प्रशिक्षण ने आम, गरीब और कमजोर मानी जाने वाली महिलाओं को अपने और अपने जैसे लोगों के हकों और उन्हेंं हासिल कर पाने की राजनीतिक लडाई में पारंगत बना दिया था।
वैकल्पिक, गैर-दलीय राजनीति की एक खासियत उसके सामूहिक नेतृत्व की होती है। संगठन के रोजमर्रा के आम निर्णयों से लेकर विशिष्ट नीति-निर्धारक विषयों तक सभी में सामूहिकता का ध्यार रखा जाता है। सतही तौर पर देखें तो जब्बारभाई के प्रति आदर, स्नेह के कारण सब कुछ उन्हीं के निर्देश पर होता हुआ दिखाई देता था, लेकिन संगठन की साप्ता्हिक बैठकों और दूसरी बहसों में आम कार्यकर्ता की भागीदारी साफ देखी जा सकती थी। इसी तरह संगठन के कार्यकर्ताओं की आय और खर्च पर भी एक कठोर संयम रखा जाता था। यह तब ही संभव था जब संगठन के सभी वरिष्ठ और कनिष्ठ कार्यकर्ता सादा, सरल और संयमित जीवन जिएं। खुद जब्बार इस मामले में बडे अनुशासित थे।
स्थानीय और अपेक्षाकृत सीमित इलाकों को प्रभावित करने वाले मुद्दों को लेकर सत्तर और अस्सी के दशक में गैर-दलीय, वैकल्पिक राजनीति फली-फूली थी। अविभाजित मध्यंप्रदेश में भोपाल गैस कांड, नर्मदा पर बडे बांध और छत्तीसगढ के मजदूरों का आंदोलन ऐसे ही तीन वैकल्पिक राजनैतिक आंदोलन रहे हैं। तत्कालीन राजनीति के सत्तावाद और अर्थवाद से बेजार होकर कई मध्यमवर्गीय पढे-लिखे कार्यकर्ताओं ने स्थानीय महत्व के व्यापक मुद्दों को लेकर जगह-जगह आंदोलन छेडे थे। ‘भोपाल गैस पीडित महिला उद्योग संगठन’ इस मायने में इनसे भिन्न था कि उसका नेतृत्व ठेठ स्थानीय समाज और आर्थिक परिस्थितियों से उठकर खडा हुआ था। स्थानीय संसाधनों के बल पर उसे देशभर में स्थापित और विख्यात करने में जब्बारभाई की महती भूमिका थी। उनका सदा के लिए जाना इस वैकल्पिक, गैर-दलीय राजनीति के लिए भारी नुकसान है।
————————-राकेश दीवान।

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